MP में अफसरों की भारी कमी: 85 हजार पद खाली, जनता बेहाल और सिस्टम बेदम

मध्यप्रदेश में सरकारी विभागों में अफसरों की कमी से सिस्टम पर दबाव बढ़ गया है। खाली पड़े पदों की वजह से काम का बोझ बढ़ा है, जिससे जनता को समय पर सेवाएं नहीं मिल पा रही हैं। प्रशासनिक निर्णय धीमे हो गए हैं और कर्मचारियों पर अतिरिक्त काम का दबाव है।

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Ramanand Tiwari
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There is a huge shortage of officers in MP

Photograph: (the sootr)

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BHOPAL. मध्यप्रदेश में सरकारी विभागों की कार्यप्रणाली इन दिनों गंभीर दबाव में है। वजह है हजारों स्वीकृत पदों का लंबे समय से खाली पड़ा होना। इससे बचे हुए कर्मचारियों पर अतिरिक्त काम का बोझ बढ़ गया है। आम लोगों को समय पर सेवाएं नहीं मिल पा रही हैं।

सबसे ज्यादा असर वरिष्ठ स्तर के पदों के खाली होने से देखने को मिल रहा है। मंत्रालय से लेकर जिला कार्यालयों तक निर्णय प्रक्रिया धीमी हो गई है, जिससे प्रशासनिक कार्यों की रफ्तार प्रभावित हो रही है।            

आधे से ज्यादा पद खाली, प्रशासनिक संतुलन बिगड़ा

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में ग्रेड-1 और ग्रेड-2 के स्वीकृत पदों में से 42 प्रतिशत से ज्यादा पद खाली हैं। ये दोनों श्रेणियां राजपत्रित अधिकारियों की होती हैं, जो नीतिगत और प्रशासनिक फैसलों की रीढ़ मानी जाती हैं। 

ग्रेड-1 और ग्रेड-2 के कुल 1.48 लाख पद स्वीकृत हैं, जिनमें से करीब 85 हजार पद फिलहाल रिक्त हैं। यह स्थिति अब तक के उच्चतम स्तर पर पहुंच चुकी है।

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कौन-से पद सबसे ज्यादा खाली?

आंकड़ों में समझिए प्रशासन की परेशानी सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार—ग्रेड-1 के करीब 8,410 पद खाली हैं। ग्रेड-2 के लगभग 76,639 पद रिक्त पड़े हैं।

ग्रेड-1 में संयुक्त कलेक्टर और अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट जैसे वरिष्ठ अधिकारी शामिल होते हैं। जबकि ग्रेड-2 में डिप्टी कलेक्टर और समकक्ष रैंक के अधिकारी आते हैं। इन पदों में आईएएस अधिकारी शामिल नहीं होते, क्योंकि वे भारत सरकार के कैडर नियमों के तहत आते हैं।

वरिष्ठ पद खाली, फैसले अटके

दफ्तर चल रहे हैं, लेकिन रफ्तार थमी वरिष्ठ अधिकारियों की कमी का सीधा असर फाइलों के निपटारे, योजनाओं की समीक्षा और प्रशासनिक समन्वय पर पड़ रहा है।

कई विभागों में एक अधिकारी को दो या तीन जिम्मेदारियां निभानी पड़ रही हैं, जिससे गुणवत्ता और समय-दोनों प्रभावित हो रहे हैं। मंत्रालय स्तर पर भी माना जा रहा है कि शीर्ष पदों की रिक्तता ने पूरे सिस्टम का संतुलन बिगाड़ दिया है।

पदोन्नति रुकी, बिगड़ा पूरा गणित

अस्थायी प्रभार बना स्थायी समस्या प्रदेश में वर्ष 2016 से पदोन्नति प्रक्रिया ठप होने के कारण सरकार को अस्थायी समाधान अपनाना पड़ा। कनिष्ठ अधिकारियों को वरिष्ठ पदों का अतिरिक्त प्रभार दिया गया, लेकिन वे अपने मूल पदों पर ही बने रहे।

इस व्यवस्था का नतीजा यह हुआ कि कागजों में पद खाली नहीं माने गए और नई भर्तियों का रास्ता भी बंद हो गया।सिस्टम भीतर ही भीतर जाम होता चला गया।

4 लाख कर्मचारी इंतजार में

प्रदेश में पदोन्नति के पात्र कर्मचारियों की संख्या 4 लाख से ज्यादा है। अगर समय पर पदोन्नति होती, तो करीब 2 लाख नए पद खाली होते और नई भर्तियों का बड़ा अवसर बनता।

पिछले साढ़े नौ साल में एक लाख से अधिक कर्मचारी बिना पदोन्नति के ही रिटायर हो चुके हैं। जिससे कर्मचारियों में असंतोष और निराशा बढ़ी है।

एमपी सरकार ने खोला पदोन्नति का रास्ता

नए नियमों से हालात सुधरने की उम्मीद अधिकारी-कर्मचारियों की नाराजगी को देखते हुए मुख्यमंत्री डॉ.मोहन यादव की अगुवाई वाली कैबिनेट ने 17 जून को मध्यप्रदेश लोक सेवा पदोन्नति नियम-2025 को मंजूरी दी।

इसके बाद 19 जून को नए नियमों का गजट नोटिफिकेशन भी जारी कर दिया गया। सरकार को उम्मीद है कि पदोन्नति प्रक्रिया शुरू होने से न सिर्फ प्रशासनिक ढांचा मजबूत होगा, बल्कि सेवाओं की गति भी सुधरेगी।

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सिस्टम को सांस लेने का मौका

अगर पदोन्नति प्रक्रिया समयबद्ध तरीके से लागू होती है, तो वरिष्ठ पदों की रिक्तता कम होगी। इससे नए पद खुलेंगे, भर्ती का रास्ता बनेगा और आम जनता को बेहतर और तेज सेवाएं मिल सकेंगी। अब निगाहें इस बात पर हैं कि नियमों के बाद जमीन पर अमल कितनी तेजी से होता है।

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