मध्यप्रदेश में खाली कुर्सियों पर टिकी व्यवस्था: इमारतें खड़ी, लेकिन कर्मचारियों की कमी से हांफ रहा सरकारी तंत्र
News In Short
मध्यप्रदेश में डेढ़ लाख से ज्यादा पद खाली पड़े हैं।
कई विभागों में 30-40% तक स्टाफ की कमी है।
नए सरकारी भवन बने, लेकिन संसाधनों की कमी बनी है।
वन विभाग में आईएफएस और अन्य पदों की भारी कमी है।
स्वास्थ्य विभाग में विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी है।
News In Detail
मध्यप्रदेश में सरकारी ढांचा तेजी से फैल रहा है। नई योजनाएं, नई इमारतें और करोड़ों की परियोजनाएं शुरू हो रही हैं। लेकिन जमीन पर हालात अलग कहानी बताते हैं।
कई विभागों में अधिकारी और कर्मचारियों की भारी कमी के कारण सरकारी मशीनरी धीमी पड़ गई है। न योजनाएं समय पर लागू हो पा रही हैं और न ही आम लोगों को सेवाएं समय पर मिल रही हैं।
खाली पदों ने बढ़ाई प्रशासन की मुश्किलें
प्रदेश में आबादी लगातार बढ़ रही है और उसी अनुपात में सरकारी जिम्मेदारियां भी बढ़ती जा रही हैं। इसके बावजूद अधिकांश विभागों में लंबे समय से कर्मचारियों की कमी बनी हुई है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार करीब डेढ़ लाख से ज्यादा पद खाली पड़े हैं। इनमें उच्च प्रशासनिक पदों से लेकर चतुर्थ श्रेणी तक के कर्मचारी शामिल हैं।
इस कमी का सीधा असर सरकारी सेवाओं पर पड़ रहा है। कई विभागों में कामकाज की रफ्तार धीमी है और लोगों को छोटे-छोटे कामों के लिए भी लंबा इंतजार करना पड़ता है।
हालात समझिए इन प्रमुख बिंदुओं में...
- प्रदेश के 54 से अधिक सरकारी विभागों में पद रिक्त हैं।
- कई विभागों में 30 से 40 प्रतिशत तक स्टाफ की कमी है।
- लगभग डेढ़ लाख पद सालों से खाली पड़े हुए हैं।
- अस्पतालों में डॉक्टर और पैरामेडिकल स्टाफ की भारी कमी है।
- कई जगह अधिकारियों की जगह प्रभारियों से काम चल रहा है।
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इमारतें नई, लेकिन काम करने वाले नहीं
प्रदेश में नए सरकारी भवन, दफ्तर और परियोजनाएं तेजी से तैयार हो रही हैं। कई विभागों में आधुनिक मशीनें और उपकरण भी खरीदे जा रहे हैं, लेकिन इन संसाधनों को चलाने के लिए पर्याप्त मानव संसाधन नहीं है। परिणाम यह है कि कई जगह नई सुविधाएं होने के बावजूद उनका पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा।
वन विभाग में भी अमले की कमी
वनों की सुरक्षा और वन्यजीवों के संरक्षण को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीन पर स्थिति अलग है। वन विभाग में स्वीकृत पदों के मुकाबले काफी कम अधिकारी और कर्मचारी कार्यरत हैं।
स्थिति कुछ इस तरह है...
- आईएफएस कैडर के 296 पदों में से 185 ही कार्यरत।
- राज्य वन सेवा के 359 पदों में से 142 ही भरे।
- वनरक्षक, वनपाल, डिप्टी रेंजर और रेंजर के 20,676 पदों में से 5,452 खाली।
यह स्थिति तब है जब प्रदेश को “टाइगर स्टेट” कहा जाता है और पिछले पांच वर्षों में 147 बाघों की मौत दर्ज की जा चुकी है।
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भर्ती के बाद भी है कमी
पिछले वर्ष राज्य सरकार ने लगभग 70 हजार पदों पर भर्ती की थी। इसके बावजूद रिक्त पदों की संख्या अभी भी डेढ़ लाख से अधिक बनी हुई है।
इसके पीछे कई कारण बताए जाते हैं। आरक्षण से जुड़े मामलों के कारण करीब 10 हजार पदों पर नियुक्तियां अटकी हुई हैं। कई विभागों में पदोन्नति से जुड़े मामले लंबित हैं।
कई क्षेत्रों में वर्षों से नए पद नहीं
स्वास्थ्य विभाग में स्थिति ज्यादा गंभीर स्वास्थ्य सेवाओं में कर्मचारियों की कमी सबसे ज्यादा दिखाई देती है। जिला अस्पतालों से लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों तक विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी है। यहां सालों से नए पद नहीं निकाले गए हैं।
मुख्य आंकड़े देखें...
- विशेषज्ञ डॉक्टरों के 5,443 पद स्वीकृत, लेकिन सिर्फ 1,495 पदस्थ यानी 3,948 पद खाली
- चिकित्सा अधिकारियों के 6,513 पदों में से 2,689 रिक्त
- इसका असर यह है कि प्रदेश के कई अस्पतालों में जरूरी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं।
- सीजर डिलीवरी की सुविधा अभी भी केवल लगभग 140 सरकारी अस्पतालों में ही मिल पा रही है।
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बढ़ती आबादी, लेकिन पद वही पुराने
विशेषज्ञों का कहना है कि कई विभागों में वर्षों से नए पद ही नहीं बनाए गए हैं। उदाहरण के तौर पर स्वास्थ्य विभाग में मेडिकल ऑफिसर और विशेषज्ञों के नए पद 2011 के बाद नहीं बढ़े, जबकि तब से अब तक प्रदेश की आबादी में करीब डेढ़ करोड़ की वृद्धि हो चुकी है।
पुलिस बल भी जूझ रहा कमी से
कानून व्यवस्था संभालने वाली पुलिस भी स्टाफ की कमी से जूझ रही है। पुलिस विभाग में लगभग 20 प्रतिशत पद खाली हैं। आरक्षकों के 1.26 लाख पद स्वीकृत है, लेकिन इनमें करीब एक लाख ही पदस्थ हैं। बल की कमी के कारण कई क्षेत्रों में जरूरत के अनुसार नए थाने और चौकियां भी नहीं खुल पा रही हैं।
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निष्कर्ष:
प्रदेश में सरकारी योजनाओं और परियोजनाओं का विस्तार तेजी से हो रहा है, लेकिन कर्मचारियों की कमी प्रशासनिक व्यवस्था के सामने बड़ी चुनौती बनती जा रही है। जब तक खाली पदों को भरने और जरूरत के मुताबिक नए पद सृजित करने की ठोस पहल नहीं होती, तब तक सरकारी सेवाओं की रफ्तार पर सवाल बने रहेंगे।