वसुंधरा राजे कथित फर्जी पत्र मामला: हाईकोर्ट के भोपाल पुलिस की FIR जांच जारी रखने के निर्देश

Neel Tiwari | Jul 09, 2026, 22:17 IST
Photograph: (THESOOTR)
JABALPUR. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने वसुंधरा राजे कथित फर्जी पत्र मामले में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं खत्म कीं। भोपाल पुलिस की एफआईआर जांच और विभागीय जांच जारी रहेगी।

ऐसे समझें क्या है पूरा मामला...

  • हाई कोर्ट ने तीनों बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं का किया निराकरण।
  • भोपाल पुलिस को दर्ज एफआईआर की जांच कानून के अनुसार जारी रखने के निर्देश।
  • राजस्थान पुलिस अधिकारी सज्जन सिंह के खिलाफ विभागीय जांच पूरी करने का आदेश।
  • तीनों कांग्रेसी कार्यकर्ता चाहे तो मुआवजा और अन्य वैधानिक राहत के लिए अलग से अदालत जा सकते है।
  • इस आदेश का असर एफआईआर जांच या विभागीय जांच के मेरिट पर नहीं पड़ेगा।

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया के नाम से वायरल कथित फर्जी पत्र और एमपी कांग्रेस आईटी सेल के तीन कार्यकर्ताओं की कथित अवैध हिरासत से जुड़े मामले में महत्वपूर्ण आदेश सुनाया है।



एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिविजनल बेंच ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं का निराकरण करते हुए भोपाल पुलिस को दर्ज एफआईआर की जांच निष्कर्ष निकलने तक जारी रखने और राजस्थान पुलिस अधिकारी सज्जन सिंह के खिलाफ विभागीय जांच पूरी करने के निर्देश दिए हैं।



बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं पर फैसला

जबलपुर हाईकोर्ट की एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की डिविजनल बेंच ने वसुंधरा राजे सिंधिया के नाम से वायरल कथित फर्जी पत्र मामले में दायर तीन बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं पर संयुक्त फैसला सुनाया।



यह मामला एमपी कांग्रेस आईटी सेल के सदस्य बिलाल खान, निखिल प्रजापति उर्फ अतुल प्रजापति और इनाम अहमद की कथित अवैध हिरासत से जुड़ा था।



याचिकाओं में आरोप लगाया गया था कि तीनों को भोपाल में बिना गिरफ्तारी मेमो और बिना मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए हिरासत में रखकर बाद में राजस्थान पुलिस को सौंप दिया गया।



कोर्ट ने पहले ही दिए थे जांच के निर्देश

पहले हुई सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने तीनों युवकों के बयान मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट से दर्ज कराने और संबंधित सीसीटीवी फुटेज मंगाने के निर्देश दिए थे।



दर्ज बयानों का अवलोकन करने के बाद अदालत ने प्रथम दृष्टया कथित अवैध हिरासत का मामला सामने आने की बात कहते हुए 12 मई 2026 को पुलिस कमिश्नर भोपाल को निर्देश दिया था।



निर्देश में कहा था कि इन बयानों को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत शिकायत मानकर उचित कार्रवाई की जाए। इसी आदेश के पालन में एफआईआर दर्ज हुई, जिसकी जांच फिलहाल जारी है।



हाईकोर्ट ने क्यों खत्म की याचिकाएं

इस मामले की सुनवाई 7 जुलाई को हुई थी और इसका आदेश आज 9 जुलाई को अपलोड हुआ है। कोर्ट ने अपने अंतिम आदेश में कहा कि बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका का उद्देश्य किसी व्यक्ति को अवैध हिरासत से मुक्त कराना होता है।



चूंकि तीनों व्यक्तियों को जयपुर में विधिवत गिरफ्तार कर सक्षम न्यायालय के समक्ष पेश किया गया, बाद में उन्हें जमानत भी मिल गई, इसलिए इन याचिकाओं का उद्देश्य पूरा हो चुका है। इसी आधार पर तीनों याचिकाओं का निराकरण कर दिया गया।



भोपाल पुलिस की जांच जारी रहेगी

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भोपाल पुलिस के खिलाफ कथित अवैध हिरासत के आरोपों को लेकर पहले से शुरू की गई एफआईआर की जांच कानून के अनुसार स्वतंत्र रूप से अपने तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचेगी।



अदालत ने यह भी कहा कि इस आदेश में की गई कोई भी टिप्पणी उस जांच के मेरिट को प्रभावित नहीं करेगी। यानी अब जांच एजेंसी उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई करेगी।



राजस्थान पुलिस अधिकारी की विभागीय जांच होगी पूरी

अदालत ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि राजस्थान पुलिस के कांस्टेबल सज्जन सिंह के खिलाफ 20 मई 2026 से लंबित विभागीय जांच भी कानून के अनुसार निष्कर्ष तक पहुंचाई जाएगी। कोर्ट ने कहा कि इस फैसले को विभागीय जांच के गुण-दोष पर किसी राय के रूप में नहीं माना जाएगा।



मुआवजे के लिए अलग से जा सकते हैं कोर्ट

हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि यदि तीनों प्रभावित व्यक्ति कथित अवैध हिरासत के आधार पर मुआवजा या अन्य वैधानिक राहत चाहते हैं तो वे सक्षम न्यायालय में अलग से याचिका दायर करने के लिए स्वतंत्र हैं। इस आदेश से उनके ऐसे कानूनी अधिकार प्रभावित नहीं होंगे।



मामले में याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता हरजस सिंह छाबड़ा ने पैरवी की। अदालत ने स्पष्ट किया कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं के निपटारे का अर्थ यह नहीं है कि कथित अवैध हिरासत या विभागीय जांच से जुड़े अन्य कानूनी प्रश्न समाप्त हो गए हैं। उन सभी मामलों का फैसला संबंधित सक्षम प्राधिकारी और न्यायालय कानून के अनुसार करेंगे।



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