10 करोड़ का बजट, फिर भी मेडिकल में हिंदी बेअसर, एक भी छात्र ने नहीं दी हिंदी में परीक्षा!
Amresh Kushwaha | Sept 14, 2026, 08:14 IST
मेडिकल में हिंदी का हाल बेहाल
मध्यप्रदेश में 10 करोड़ के बजट के बाद भी एमबीबीएस हिंदी माध्यम बेअसर साबित हो रहा है। तीन साल में एक भी छात्रों ने हिंदी में परीक्षा नहीं दी। वहीं, अब एनएमसी ने विस्तृत रिपोर्ट मांगी है।
समझें क्या है पूरा मामला...
- मध्यप्रदेश में तीन साल पहले हिंदी में एमबीबीएस पढ़ाई शुरू हुई थी।
- सरकार ने 10 करोड़ रुपए खर्च कर 50 हजार किताबें छपवाईं।
- मेडिकल कॉलेजों में मंदार केंद्र बनाकर अनुवाद कार्य भी हुआ।
- वहीं, तीन साल में एक भी छात्र ने हिंदी में परीक्षा नहीं दी।
- अब नेशनल मेडिकल कमीशन ने राज्य सरकार से पूरी रिपोर्ट मांगी है।
मंदार केंद्रों में ताले
मध्य प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में हिंदी माध्यम की पढ़ाई के लिए मंदार केंद्र बनाए गए थे। यहां छात्रों को हिंदी में पढ़ाई में मदद मिलनी थी, लेकिन ग्राउंड रिपोर्ट कुछ और ही तस्वीर दिखाती है। कई मंदार केंद्रों पर अब ताले लटके हैं। भोपाल के जीएमसी यानी गांधी मेडिकल कॉलेज में भी यही हाल है। यहां मंदार केंद्र पर ताला लगा मिला। किताबें स्टोर रूम में पड़ी धूल खा रही हैं। एक साल से कार्यसमिति की कोई बैठक भी नहीं हुई। हिंदी प्रकोष्ठ के पास अपना बजट तक नहीं बचा है।
10 करोड़ का खर्च बेकार
16 विषयों की 16 किताबों का अनुवाद हुआ। इस काम में 300 से ज्यादा डॉक्टरों की टीम जुटी थी। टीम ने दिन रात मेहनत कर अनुवाद पूरा किया। पहले हर छात्र के हिसाब से किताबें छापी जाती थीं। लेकिन अब मांग घट गई है। नए संस्करण में सिर्फ 25 से 30 प्रतिशत किताबें ही छपेंगी। यह मांग के आधार पर तय होगा।
छात्र क्यों घबराते हैं
इंदौर में किताबें बंद
शुरुआती जोश हुआ ठंडा
एनएमसी ने मांगी जानकारी
इंजीनियरिंग में भी यही हाल
एआईसीटीई के ई-कुंभ पोर्टल पर बीटेक की किताबें हिंदी में अपलोड भी हो चुकी हैं। इस अनुवाद काम की नोडल एजेंसी खुद आरजीपीवी ही है। फिर भी सिर्फ परीक्षा के प्रश्नपत्र द्विभाषी दिए जा रहे हैं। हिंदी माध्यम से पढ़ाई की कोई ठोस व्यवस्था अब तक नहीं बनी। प्रदेश में अभी सिर्फ 4 कॉलेजों के पास ही हिंदी बीटेक की मंजूरी है। इन कॉलेजों में भी सीटें पूरी तरह नहीं भर पाईं। कुल सीटों में से सिर्फ 53 प्रतिशत सीटें ही भर सकीं।
आरजीपीवी के कुलगुरु प्रो. आलोक शर्मा ने इस पर अपना पक्ष रखा है। उनका कहना है कि यूआईटी यानी यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में हिंदी इंजीनियरिंग पढ़ाई के लिए प्रयास जारी हैं। एआईसीटीई से अतिरिक्त सीटें और अनुमति लेने की कोशिश की जा रही है। यह बयान दिखाता है कि विश्वविद्यालय स्तर पर अब हरकत शुरू हुई है।
कुल मिलाकर तस्वीर साफ है। सरकार ने बड़े दावे और बड़े बजट के साथ योजना शुरू की थी, लेकिन जमीन पर व्यवस्था और भरोसा दोनों कमजोर रह गए। अब देखना होगा कि एनएमसी की रिपोर्ट के बाद राज्य सरकार क्या कदम उठाती है।
यह खबर क्यों जरूरी है
यह पारदर्शिता और जवाबदेही का सवाल भी है। गरीब और ग्रामीण छात्र अक्सर अंग्रेजी में कमजोर होते हैं। उनके लिए हिंदी माध्यम एक बड़ा सहारा हो सकता था। योजना का सही क्रियान्वयन न होना उनके हक पर असर डालता है। ऐसी खबरें सरकारी योजनाओं की निगरानी में मदद करती हैं। यह जनता के पैसे के सही इस्तेमाल की मांग भी उठाती है।
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