MP में ओबीसी आरक्षण विवाद फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, फैसले में सुधार की मांग; 17 मार्च को ओपन कोर्ट में होगी सुनवाई
News in Short
- सुप्रीम कोर्ट ने 17 फरवरी 2026 को OBC आरक्षण से जुड़े सभी मामले वापस एमपी हाईकोर्ट भेज दिए थे।
- सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट में विशेष बेंच गठित कर 3 महीने के भीतर मामलों का निपटारा करने को कहा था।
- आदेश में तकनीकी त्रुटियों का हवाला देते हुए ओबीसी एडवोकेट्स वेलफेयर एसोसिएशन ने रिव्यू याचिका दायर की है।
- 10 मार्च को कोर्ट नंबर 6 में सुनवाई सूचीबद्ध थी लेकिन समय के अभाव में नहीं हो सकी।
- अब 17 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट में ओपन कोर्ट में रिव्यू याचिका पर सुनवाई होगी।
News in Detail
मध्यप्रदेश में 27 प्रतिशत OBC आरक्षण को लेकर चल रहा कानूनी विवाद एक बार फिर नए मोड़ पर पहुंच गया है। सुप्रीम कोर्ट के 17 फरवरी 2026 के फैसले में सुधार की मांग को लेकर दायर रिव्यू याचिका अब ओपन कोर्ट में सुनी जाएगी। 10 मार्च को सूचीबद्ध सुनवाई समय के अभाव में नहीं हो सकी, जिसके बाद अब यह मामला 17 मार्च को फिर सुप्रीम कोर्ट में लिस्ट किया गया है।
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OBC आरक्षण विवाद की पृष्ठभूमि
मध्य प्रदेश में OBC आरक्षण को लेकर पिछले कई वर्षों से कानूनी विवाद चल रहा है। 27 प्रतिशत OBC आरक्षण को लागू करने और उससे जुड़े भर्ती व प्रवेश प्रक्रियाओं को लेकर बड़ी संख्या में याचिकाएं पहले मध्य प्रदेश के जबलपुर हाईकोर्ट में लंबित थीं। बाद में राज्य सरकार ने इन मामलों को सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर कराया, जहां इन्हें छत्तीसगढ़ में आरक्षण से जुड़े मामलों के साथ जोड़ा गया था। लंबी सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 17 फरवरी 2026 को एक महत्वपूर्ण आदेश पारित किया। अदालत ने सभी मामलों को फिर से मध्य प्रदेश हाईकोर्ट को वापस भेज दिया। निर्देश दिया कि हाईकोर्ट विशेष बेंच गठित कर तीन महीने के भीतर इन मामलों का अंतिम निराकरण करे।
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फैसले में तकनीकी खामियों का आरोप
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद OBC पक्ष ने कुछ तकनीकी त्रुटियों की ओर इशारा किया है। ओबीसी एडवोकेट्स वेलफेयर एसोसिएशन ने पुनर्विचार याचिका (रिव्यू पिटिशन) दायर की है। याचिका में कहा गया है कि आदेश के कुछ पहलू स्पष्ट नहीं हैं। इससे न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। OBC पक्ष का कहना है कि विशेष अनुमति याचिकाओं (SLP) पर स्पष्ट निर्णय दिए बिना मामले वापस भेजना सही नहीं है। उनका तर्क है कि हाईकोर्ट के आदेशों को निरस्त किए बिना मामले रिमांड करना कानूनी दृष्टि से गलत है।
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10 मार्च को नहीं हो सकी सुनवाई
इस रिव्यू याचिका को 10 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया गया था। यह मामला कोर्ट नंबर 6 के समक्ष लगा था। लेकिन अदालत में समय की कमी के कारण इस पर सुनवाई नहीं हो सकी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले को अगली तारीख देते हुए 17 मार्च 2026 को फिर से सूचीबद्ध करने के निर्देश दिए हैं। अब सभी पक्षों की नजर 17 मार्च को होने वाली सुनवाई पर टिकी है, क्योंकि इसी दिन यह तय होगा कि सुप्रीम कोर्ट अपने पहले के आदेश में कोई संशोधन करता है या नहीं।
ओपन कोर्ट में सुनवाई
ओबीसी अधिवक्ताओं के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने रिव्यू याचिका की सुनवाई ओपन कोर्ट में करने का निर्णय लिया है। आमतौर पर रिव्यू याचिकाओं की सुनवाई चैंबर में होती है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ओपन कोर्ट में सुनवाई अदालत की गंभीरता को दिखाता है। इससे दोनों पक्षों को अपनी दलीलें रखने का मौका मिलेगा।
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दोनों पक्षों के बीच बढ़ा विवाद
इस पूरे मामले को लेकर OBC पक्ष और सामान्य वर्ग के छात्रों के बीच भी मतभेद बढ़ गए हैं। सामान्य वर्ग के कुछ छात्र संगठनों का आरोप है कि रिव्यू याचिका के जरिए मामले को और लंबा खींचने की कोशिश की जा रही है। उनका कहना है कि भर्ती और प्रवेश प्रक्रियाएं पहले ही लंबे समय से प्रभावित हो रही हैं। वहीं OBC पक्ष इन आरोपों को खारिज करते हुए कह रहा है कि रिव्यू याचिका दाखिल करना उनका कानूनी अधिकार है और इसका उद्देश्य सिर्फ अदालत के आदेश में स्पष्टता लाना है।
OBC वर्ग के अधिवक्ताओं ने दायर की है रिव्यू पिटिशन
रिव्यू याचिका में OBC पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर, अधिवक्ता वरुण ठाकुर और विनायक प्रसाद शाह पैरवी कर रहे हैं। ये अधिवक्ता सुप्रीम कोर्ट में आदेश की कानूनी व्याख्या और उसमें सुधार की मांग को लेकर अपनी दलीलें रखेंगे।
हजारों छात्रों पर पड़ रहा असर
ओबीसी आरक्षण से जुड़ा यह विवाद केवल अदालतों तक सीमित नहीं है। इसका सीधा असर राज्य में चल रही कई भर्ती प्रक्रियाओं और शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश पर पड़ रहा है। हजारों अभ्यर्थी लंबे समय से अंतिम निर्णय का इंतजार कर रहे हैं। 17 मार्च को सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इसके बाद ही यह स्पष्ट होगा कि मामला हाईकोर्ट की विशेष बेंच में जाएगा या फिर सुप्रीम कोर्ट में इसकी दिशा तय होगी।