एमपी में बदलेंगे नलजल के नियम, पंचायतों को संभालना होगा पूरा सिस्टम
ऐसे समझें पूरा मामला
- पानी की सप्लाई बंद हुई तो पंचायत को जवाब देना होगा।
- बिल वसूली और जल शुल्क प्रबंधन की जिम्मेदारी पंचायत संभालेगी।
- पाइपलाइन में खराबी आने पर पंचायत को मरम्मत की व्यवस्था करनी होगी।
- अवैध नल कनेक्शन पर पंचायत को कार्रवाई करनी होगी।
- पीने के पानी की गुणवत्ता बनाए रखने और निगरानी की जिम्मेदारी भी पंचायत की होगी।
सुविधा मिली, अब जवाबदेही का दबाव भी
गांव में नल लगने के बाद अगर लोगों को समय पर पानी नहीं मिला, तो अब इसकी जिम्मेदारी सिर्फ विभाग की नहीं होगी। नई व्यवस्था के तहत ग्राम पंचायतों को नलजल योजना चलाने और उसकी देखरेख की जिम्मेदारी दी गई है। यानी पानी की सप्लाई ठीक रखना, पाइपलाइन की खराबी दूर कराना और बिल वसूली जैसे काम अब पंचायतों को संभालने होंगे।
मध्यप्रदेश में मप्र पंचायत (ग्रामीण नलजल योजना संचालन-संधारण एवं प्रबंधन) नियम, 2026 लागू हो गए हैं। इन नए नियमों के बाद गांवों में पानी की व्यवस्था को लेकर पंचायतों की भूमिका पहले से ज्यादा अहम हो गई है। अब सुविधा देने के साथ-साथ पंचायतों को व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी भी निभानी होगी।
नल बंद हुआ तो जिम्मेदारी टालना मुश्किल
अब सिर्फ गांव में नल लगाना ही काफी नहीं होगा, उसे लगातार चालू रखना भी पंचायत की जिम्मेदारी होगी।
अगर पाइपलाइन खराब होती है, कनेक्शन में कोई दिक्कत आती है या पानी की सप्लाई रुकती है, तो पंचायत को जल्द से जल्द व्यवस्था ठीक करानी होगी।
नई व्यवस्था के बाद नलजल योजना के संचालन को लेकर पंचायतों की भूमिका और कामकाज पर ज्यादा नजर रखी जाएगी।
पानी के साथ अब बिल का भी हिसाब
पानी की सुविधा देने के साथ अब पंचायतों को जल शुल्क यानी यूजर चार्ज की व्यवस्था भी संभालनी होगी।
पंचायतें पानी का शुल्क तय करेंगी, उपभोक्ताओं को बिल जारी करेंगी और उसकी वसूली भी करेंगी। अगर कोई उपभोक्ता भुगतान नहीं करता है, तो नियमों के अनुसार कनेक्शन काटने जैसी कार्रवाई भी की जा सकेगी।
यानी पंचायतों की जिम्मेदारी सिर्फ पानी पहुंचाने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि उन्हें पानी की व्यवस्था और उससे जुड़े पूरे हिसाब-किताब को भी संभालना होगा।
पाइपलाइन टूटी तो इंतजार का बहाना नहीं
ग्रामीण इलाकों में नलजल व्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती उसका लगातार संचालन है। कहीं पाइपलाइन में खराबी आती है तो कहीं पंप या दूसरे उपकरणों में समस्या हो सकती है।
नई व्यवस्था में ऐसे मामलों की देखरेख पंचायत के स्तर पर होगी। वॉल्वमैन और पंप ऑपरेटर की नियुक्ति तथा उनके भुगतान की व्यवस्था भी पंचायत करेगी।
छोटी मरम्मत के लिए भी जिम्मेदारी तय
आकस्मिक मरम्मत के लिए ग्राम पंचायत को हर महीने 1,000 रुपए तक बिना अलग अनुमति खर्च करने का प्रावधान किया गया है।
राशि सीमित है, लेकिन इसका उद्देश्य छोटी खराबियों को तत्काल ठीक कराना है। ऐसे में मामूली तकनीकी समस्या लंबे समय तक पानी की सप्लाई रोकती है तो स्थानीय स्तर पर कार्रवाई का सवाल उठेगा।
अवैध कनेक्शन पर पंचायत को लेना होगा एक्शन
पानी चोरी, अवैध जल दोहन, अनधिकृत कनेक्शन या पाइपलाइन और जल संरचनाओं को नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान रखा गया है।
पानी की व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने पर संबंधित व्यक्ति या संस्था से क्षतिपूर्ति की वसूली की जा सकती है। जरूरत पड़ने पर लागू कानूनी प्रावधानों के तहत एफआईआर की कार्रवाई के लिए भी पंचायत कदम उठा सकेगी।
पानी की गुणवत्ता पर भी नजर
नई व्यवस्था में केवल नल से पानी पहुंचना ही पर्याप्त नहीं माना गया है। पानी की गुणवत्ता की नियमित जांच कराने की जिम्मेदारी भी व्यवस्था में शामिल है।
इसका मतलब है कि ग्रामीण पेयजल व्यवस्था में अब सप्लाई, रखरखाव और गुणवत्ता—तीनों मोर्चों पर पंचायत की भूमिका होगी।
सरकार ने जिम्मेदारी नीचे तक पहुंचाई
सरकार का उद्देश्य जल जीवन मिशन एमपी के तहत बनी ग्रामीण नलजल योजनाओं को स्थानीय स्तर पर लगातार संचालित रखना है। इसके लिए पंचायतों को संचालन और रखरखाव की ज्यादा स्पष्ट भूमिका दी गई है।
जल जीवन मिशन के प्रबंध संचालक केवीएस चौधरी के अनुसार, नई व्यवस्था में पंचायत स्तर पर पेयजल योजनाओं के संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारियां स्पष्ट की गई हैं। इससे स्थानीय जरूरत के मुताबिक मरम्मत और पानी की आपूर्ति से जुड़े काम समय पर कराने में मदद मिलेगी।
अब असली परीक्षा पंचायतों की
नए नियमों का सबसे बड़ा असर यही है कि ग्रामीण पानी व्यवस्था (मध्य प्रदेश समाचार) की जिम्मेदारी अब ज्यादा स्पष्ट रूप से स्थानीय स्तर पर दिखाई देगी।
नल सूखा, पाइपलाइन खराब हुई, पानी की गुणवत्ता पर सवाल उठा या अवैध कनेक्शन मिला—हर स्थिति में पंचायत की भूमिका सामने होगी।
सुविधा पंचायत के स्तर तक पहुंची है तो अब जवाबदेही (एकल ग्राम नलजल योजना) भी वहीं तक पहुंच गई है।
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