नेशनल गेम्स के आंकड़ों ने MP के खेल सिस्टम पर उठाए सवाल
ऐसे समझें क्या है पूरा मामला...
- नेशनल गेम्स में MP के खिलाड़ियों ने दम दिखाया
- कई विश्वविद्यालयों ने पदक तालिका में जगह बनाई
- तैराकी में खिलाड़ियों ने बड़ी उपलब्धियां हासिल कीं
- सरकारी कोच के आठ पदों में दो ही भरे
- विभाग का दावा, विशेषज्ञ कोच भी मैदान में
मध्यप्रदेश के खेल मैदान से लगातार ऐसी खबरें आती हैं, जिनमें खिलाड़ी पदक जीतकर प्रदेश का नाम रोशन करते दिखाई देते हैं। लेकिन इन सफलताओं को केवल मेडल की संख्या से देखना पूरी तस्वीर नहीं बताता।
नेशनल गेम्स के प्रदर्शन, विश्वविद्यालयों की हिस्सेदारी, खिलाड़ियों को मिली पुरस्कार राशि और प्रदेश में उपलब्ध प्रशिक्षक व्यवस्था को एक साथ देखें तो खेल सिस्टम की एक दूसरी तस्वीर सामने आती है।
यही इस पूरी कहानी का अलग पहलू है। सवाल यह नहीं कि खिलाड़ी सक्षम हैं या नहीं। सवाल यह है कि इस प्रतिभा को लगातार आगे बढ़ाने के लिए प्रदेश की व्यवस्था कितनी तैयार है।
यूनिवर्सिटी खिलाड़ियों ने दिखाई ताकत
पिछले नेशनल गेम्स (National Games) में मध्यप्रदेश के विश्वविद्यालयों की मौजूदगी ने प्रदेश की खेल प्रतिभा को सामने रखा। उपलब्ध आंकड़ों में रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर, बरकतउल्ला विश्वविद्यालय भोपाल, जीवाजी विश्वविद्यालय ग्वालियर, आईटीएम ग्वालियर, एलएनसीटी भोपाल, सरदार पटेल विश्वविद्यालय बालाघाट, जेएलयू भोपाल, आरएनटीयू भोपाल, आरजीपीवी भोपाल और विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन शामिल हैं।
इन संस्थानों के खिलाड़ियों ने अलग-अलग स्पर्धाओं में पदक हासिल किए। आंकड़ों में रैंक 26, 27, 40, 65, 88, 94, 98, 131, 132 और 140 तक की स्थिति भी दर्ज है।
यह तस्वीर बताती है कि प्रदेश में प्रतिभा की कमी नहीं है। कई विश्वविद्यालय खेलों में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं और खिलाड़ी प्रतिस्पर्धी स्तर पर प्रदर्शन कर रहे हैं।
तैराकी ने दिखाया पदकों का दम
तैराकी में भी खिलाड़ियों के प्रदर्शन ने ध्यान खींचा। उपलब्ध विवरण के मुताबिक रिचा मिश्रा ने चार गोल्ड, एक सिल्वर और तीन ब्रॉन्ज पदक हासिल किए, जिसके लिए कुल 24 लाख रुपये की राशि का उल्लेख है।
आरोन डिसूजा के खाते में तीन गोल्ड, एक सिल्वर और पांच ब्रॉन्ज दर्ज हैं। उनके लिए 21 लाख 60 हजार रुपये की पुरस्कार राशि का उल्लेख किया गया है।
संदीप सेजवाल ने चार गोल्ड और दो ब्रॉन्ज पदक जीते। उपलब्ध आंकड़ों में उनके लिए कुल 60 लाख 80 हजार रुपये की राशि दर्ज है। इन उपलब्धियों का महत्व इसलिए भी है क्योंकि खिलाड़ी तभी बड़े मंच पर टिकता है, जब उसके पीछे लगातार प्रशिक्षण और बेहतर खेल वातावरण हो।
असली सवाल: व्यवस्था कितनी टिकाऊ?
खेल विभाग के आंकड़ों के मुताबिक मध्यप्रदेश में सरकारी कोच के आठ पद स्वीकृत हैं, लेकिन इनमें केवल दो पदों पर नियुक्ति हो सकी है। इन दोनों प्रशिक्षकों पर विभागीय जिम्मेदारियां भी हैं। यानी खिलाड़ियों की ट्रेनिंग के साथ प्रशासनिक काम का बोझ भी जुड़ा हुआ है।
दूसरे राज्यों के आंकड़े इस अंतर को और स्पष्ट करते हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक हरियाणा में 480, पंजाब में 158, महाराष्ट्र में 125 और चंडीगढ़ में 58 कोच बताए गए हैं।
यह तुलना अपने आप में कोई निष्कर्ष नहीं देती, लेकिन यह जरूर पूछती है कि मध्यप्रदेश में बढ़ती खेल प्रतिभा के अनुपात में प्रशिक्षक और विशेषज्ञ संसाधनों का विस्तार कितनी तेजी से हुआ है।
विभाग का जवाब भी जानिए
खेल एवं युवा कल्याण विभाग के ज्वाइंट डायरेक्टर बालू सिंह यादव के मुताबिक विभाग ने खिलाड़ियों की जरूरत को देखते हुए कॉन्ट्रैक्ट पर अनुभवी प्रशिक्षकों की सेवाएं ली हैं।
यादव का कहना है कि खेल प्रशिक्षण की व्यवस्था सिर्फ नियमित सरकारी पदों तक सीमित नहीं है। विशेषज्ञ और अनुबंधित प्रशिक्षकों को भी इससे जोड़ा गया है, जिनके मार्गदर्शन में प्रदेश के खिलाड़ी बड़े स्तर की प्रतियोगिताओं में पहुंचे हैं।
विभाग का पक्ष यह है कि इसी व्यवस्था के जरिए खिलाड़ियों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की तैयारी मिल रही है और कुछ खिलाड़ी पदक तक पहुंच रहे हैं।
प्रतिभा बनाम सिस्टम
इस कहानी का सबसे अहम पहलू यही है कि मध्यप्रदेश में प्रतिभा और परिणाम दोनों दिखाई दे रहे हैं, लेकिन उनके पीछे खड़े सिस्टम की क्षमता पर बहस अभी बाकी है।
विश्वविद्यालयों से खिलाड़ी निकल रहे हैं। नेशनल गेम्स में प्रदर्शन हो रहा है। तैराकी जैसी स्पर्धाओं में बड़े पदक मिल रहे हैं। पुरस्कार राशि भी दी जा रही है।
अब अगला सवाल यह है कि क्या यह सफलता एक मजबूत और स्थायी खेल व्यवस्था का परिणाम है या प्रतिभाशाली खिलाड़ियों और उपलब्ध संसाधनों के बीच बनी जुगलबंदी का?
यही सवाल मध्यप्रदेश के खेल मॉडल की अगली परीक्षा तय कर सकता है। क्योंकि एक-दो प्रतियोगिताओं में सफलता से आगे बढ़कर किसी प्रदेश को खेल शक्ति बनाने के लिए मजबूत प्रशिक्षण नेटवर्क, विशेषज्ञ सपोर्ट और लगातार तैयार होने वाली नई प्रतिभाओं की जरूरत होती है।
ये खबरें भी पढ़ें...
भोपाल में SC और ED का डर दिखाकर दंपती को रखा 97 दिन डिजिटल अरेस्ट
एमपी के सरकारी कर्मचारियों के लिए खुशखबरी, सीएम का ऐलान, अब हर साल होगी DPC
मंत्री कैलाश विजयवर्गीय क्यों बोले- अच्छा है शक्कर के दाम बढ़ गए...
तलाकशुदा प्रेमिका के प्यार में 1121 किमी पहुंचा युवक, खाया जहर, पढ़ें लव स्टोरी