30 साल बाद CMO प्रमोशन, फिर भी कुर्सी नहीं: नगरीय प्रशासन में पदोन्नति के बाद क्यों अटकी पोस्टिंग?
पदोन्नति के बाद पोस्टिंग नहीं
बता दें कि यह पदोन्नति MP urban administration department यानी नगरीय प्रशासन विभाग ने दी थी। विभाग ने 63 अधिकारियों-कर्मचारियों को मुख्य नगर पालिका अधिकारी (CMO – Chief Municipal Officer) बनाया। पोस्टिंग का आदेश अब तक जारी नहीं हुआ।
पदोन्नति के बाद पोस्टिंग नहीं मिलने से ये अफसर पुराना काम ही कर रहे हैं। MP CMO promotion की यह सूची फिलहाल कागज पर ही है। दो मामले पूरी तस्वीर साफ कर देते हैं।
केस 1: 2 महीने 8 दिन इंतजार, फिर रिटायरमेंट
सौंसर नगर परिषद के राजू वाड़ेकर को 5 जून 2026 को CMO पद पर प्रमोशन मिला। उन्होंने 13 जून को जॉइनिंग दे दी। लेकिन उनका CMO posting order जारी नहीं हुआ। वे पुराना काम करते रहे और 21 अगस्त को रिटायर हो गए।
केस 2: 30 साल बाद प्रमोशन, कुर्सी नहीं मिली
छतरपुर के लखनलाल तिवारी ने 1986 में क्लर्क के रूप में नौकरी शुरू की। वे 1996 में मुख्य लिपिक और लेखापाल बने। उनके मुताबिक, नियम से 5 साल बाद वे CMO पद के पात्र हो गए थे। फिर भी प्रमोशन में करीब 30 साल लग गए।
12 जुलाई को उन्हें CMO पद पर पदोन्नत किया गया। डेढ़ महीने तक पोस्टिंग का आदेश नहीं आया। वे लेखापाल का काम करते हुए ही रिटायर हो गए।
मलाल जिंदगी भर रहेगा: लखनलाल तिवारी
नगर पालिका छतरपुर के पदोन्नत CMO (रिटायर्ड) लखनलाल तिवारी ने बताया कि 30 साल बाद प्रमोशन मिला। CMO के पद पर 1 महीना 19 दिन रहा, लेकिन कुर्सी पर बैठने का मौका तक नहीं मिला। इसका मलाल जिंदगी भर रहेगा।
सोचिए एक बार। 30 साल का इंतजार, और कुर्सी पर एक दिन भी नहीं।
165 निकाय प्रभारी CMO के भरोसे
बता दें कि प्रदेश में कुल 397 नगरीय निकाय हैं। इनमें से 165 में नियमित CMO नहीं हैं। इनमें 24 नगर पालिका और 141 नगर परिषद शामिल हैं। यानी मध्य प्रदेश नगरीय निकाय का करीब 42% हिस्सा in-charge CMO के भरोसे है।
एक तरफ 165 कुर्सियों पर नियमित अफसर नहीं हैं। दूसरी तरफ पदोन्नत अफसर बिना प्रभार घर जा रहे हैं। तो फिर अड़चन कहां है?
क्लर्क और लेखापाल संभाल रहे CMO की कुर्सी
इन 165 निकायों में दूसरे पदों के कर्मचारियों को अतिरिक्त प्रभार दिया गया है। इनमें राजस्व निरीक्षक और राजस्व उपनिरीक्षक शामिल हैं। सहायक ग्रेड-1, लेखापाल, मुख्य लिपिक और कार्यालय अधीक्षक भी यह जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
अमरकंटक में राजस्व उपनिरीक्षक प्रभारी CMO हैं। बैरसिया में लेखापाल के पास यह जिम्मेदारी है। अमरवाड़ा और सिरोंज में सहायक ग्रेड-1 प्रभार संभाल रहे हैं। गंजबासौदा में मुख्य लिपिक के पास CMO का प्रभार है।
CMO पोस्टिंग में देरी का असर
नगरीय प्रशासन विभाग के एक अफसर ने नाम न बताने की शर्त पर बात की। उनके मुताबिक नियमित CMO की कमी से शहरी विकास कार्य प्रभावित हो रहे हैं। जलापूर्ति, सीवरेज, स्वच्छ भारत मिशन और अमृत योजना की निगरानी में देरी हो रही है। प्रधानमंत्री आवास योजना की फाइलें भी समय पर नहीं निपट रही हैं।
प्रभारी CMO का अमले पर कमजोर नियंत्रण
उसी अफसर ने दूसरी चुनौती भी बताई। नियमों के तहत CMO को कर्मचारियों पर कार्रवाई का अधिकार मिलता है। लेकिन कई जगह तृतीय श्रेणी कर्मचारी या दैनिक वेतनभोगी प्रभारी CMO बन जाता है। तब उसके लिए अपने ही अमले पर नियंत्रण रखना मुश्किल हो जाता है।
मंत्रालय में अटकी फाइल की असली वजह
असली कहानी यहीं से शुरू होती है। विभाग ने 63 पदोन्नत अफसरों की पोस्टिंग का प्रस्ताव मंत्रालय भेजा था। इसके बाद भी आदेश जारी नहीं हुए। सूत्रों का दावा है कि देरी के पीछे प्रशासनिक कारणों के साथ राजनीतिक दबाव भी है।
सूत्रों के मुताबिक, कुछ स्थानीय नेता और जनप्रतिनिधि प्रभारी व्यवस्था जारी रखना चाहते हैं। क्लर्क या लेखापाल प्रभारी CMO हो तो उस पर दबाव बनाना आसान होता है। सूत्रों का कहना है कि नियमित CMO बेवजह का दबाव ज्यादा सहन नहीं करते।
यह खबर सिर्फ 63 अफसरों की नहीं है। यह 165 निकायों के कामकाज से जुड़ा सवाल है। मंत्रालय में अटकी फाइल कब आगे बढ़ेगी, यह अभी साफ नहीं है। क्या बाकी पदोन्नत अफसर भी कुर्सी देखे बिना रिटायर होंगे?