मुख्य सचिव की हाईलेवल बैठकों से बुझेगी प्यास या फिर दोहराएगा दूषित पानी का संकट ?

Ramanand Tiwari | May 24, 2026, 22:46 IST
mp water crisis
मध्य प्रदेश में बढ़ती गर्मी के साथ पेयजल संकट फिर गंभीर हो गया है। पुराने पाइपलाइन नेटवर्क और सीवर के मिल जाने से कई जगह गंदा पानी सप्लाई हो रहा है। मुख्यमंत्री के निर्देश पर मुख्य सचिव ने हाईलेवल बैठकें कर समाधान के निर्देश दिए।

मध्य प्रदेश में बढ़ती गर्मी के साथ पेयजल संकट फिर बढ़ गया है। मुख्यमंत्री के निर्देश पर मुख्य सचिव अनुराग जैन ने संभाग आयुक्तों, कलेक्टरों, जिला पंचायत CEO, PHED और नगरीय निकाय अधिकारियों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग कर पानी की स्थिति की समीक्षा की।



सरकार ने युद्ध स्तर पर काम करने के निर्देश दिए हैं। विशेषज्ञ सवाल कर रहे हैं कि क्या सिर्फ बैठकों और निर्देशों से लोगों को दूषित पानी और सप्लाई संकट से राहत मिल पाएगी।



प्रदेश के कई शहरों और कस्बों में पुरानी पाइपलाइन सबसे बड़ी चुनौती बन चुकी है। कई जगह पेयजल और सीवर लाइनें आपस में जुड़ जाती हैं। नतीजा यह होता है कि घरों तक गंदा और बदबूदार पानी पहुंचता है। मजबूरी में लोग वही पानी पीने को विवश होते हैं।



पुराने पाइप नेटवर्क ने बढ़ाई परेशानी

मध्य प्रदेश के कई बड़े शहरों से लेकर छोटे जिलों तक दूषित पानी की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं। कहीं पाइपलाइन टूटती है। कहीं लीकेज से सीवर का पानी मिल जाता है। कुछ जगह सप्लाई व्यवस्था इतनी कमजोर है कि लोगों को घंटों इंतजार करना पड़ता है। इंदौर समेत कई शहरों में दूषित पानी के मामले पहले भी चर्चा में रहे हैं। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर स्थायी समाधान अभी तक नजर नहीं आया।





इंजीनियरिंग सिस्टम पर भी उठ रहे सवाल

स्थानीय लोगों की सबसे बड़ी शिकायत यह रहती है कि शिकायतों पर समय पर सुनवाई नहीं होती। कई क्षेत्रों में लोग धरना-प्रदर्शन तक करते हैं, लेकिन समस्या बार-बार लौट आती है। विभागीय अमले की कमी और पुरानी व्यवस्थाएं हालात को और मुश्किल बना रही हैं। अक्सर पाइपलाइनें दशकों पुरानी होने के कारण बार-बार फटती हैं। ऐसे में मरम्मत के बाद भी समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होती।



सरकार ने क्या-क्या दिए निर्देश?

पेयजल संकट से निपटने के लिए युद्ध स्तर पर काम के निर्देश दिए गए हैं। नगरीय निकाय और PHED कर्मचारियों की छुट्टियां एक महीने तक प्रतिबंधित रहेंगी। कलेक्टर रोजाना समीक्षा बैठक करेंगे। हर जिले में कंट्रोल रूम बनाकर निगरानी होगी। जनप्रतिनिधियों और मीडिया से मिले फीडबैक पर तुरंत कार्रवाई करने के निर्देश हैं।



सीएम हेल्पलाइन शिकायतों का 24 घंटे में निराकरण करेगी। पानी के टैंकरों की सप्लाई पारदर्शी तरीके से मॉनिटर होगी। शहरों में पानी वितरण में किसी क्षेत्र के साथ भेदभाव नहीं होगा। ग्रामीण पेयजल व्यवस्था के लिए 1,500 करोड़ रुपए जारी किए गए हैं। पंचायतों को 10,000 रुपए तक के छोटे पेयजल कार्य तुरंत कराने का अधिकार दिया गया है। जल योजनाओं को निर्बाध बिजली देने के लिए ऊर्जा विभाग को निर्देश दिए गए हैं।



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क्या वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से बदलेगी जमीनी हकीकत?

शासन स्तर पर इस तरह की बैठकें पहले भी होती रही हैं। हर साल गर्मियों में पेयजल संकट को लेकर समीक्षा और निर्देश जारी किए जाते हैं। लेकिन सवाल यह है कि जब पाइपलाइनें जर्जर हों, तकनीकी अमला सीमित हो और निगरानी कमजोर हो, तब केवल निर्देश कितने असरदार होंगे। कई इलाकों में लोग आज भी गंदे पानी, कम दबाव और अनियमित सप्लाई से परेशान हैं। ऐसे में जनता अब कागजी समीक्षा नहीं, बल्कि जमीन पर परिणाम देखना चाहती है।



सबसे बड़ी चुनौती दूषित पानी पर स्थायी समाधान

विशेषज्ञ मानते हैं कि असली समस्या सिर्फ पानी की कमी नहीं, बल्कि खराब वितरण व्यवस्था भी है। जब तक पुरानी पाइपलाइनें बदली नहीं जाएंगी, सीवर और पानी की लाइनें अलग-अलग सुरक्षित तरीके से नहीं डाली जाएंगी और फील्ड मॉनिटरिंग मजबूत नहीं होगी, तब तक हर गर्मी में यही संकट दोहराने का खतरा बना रहेगा।



जनता का अब सीधा सवाल

लोग जानना चाहते हैं कि क्या इस बार सरकार की सख्ती और हाईलेवल मॉनिटरिंग से हालात बदलेंगे, या फिर यह मामला सिर्फ बैठकों और निर्देशों तक सीमित रह जाएगा? क्योंकि प्रदेश में प्यास सिर्फ पानी की नहीं, भरोसे की भी है।



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