एमपी की हर पंचायत में लगेगा 'विंड' सिस्टम : अब किसानों को मिलेगी मौसम की सटीक जानकारी

Sanjay Dhiman | Apr 20, 2026, 17:15 IST
Photograph: (the sootr)
मध्यप्रदेश सरकार ने राज्य की सभी 23,634 ग्राम पंचायतों और 444 तहसीलों में ऑटोमैटिक रेन गेज और वेदर स्टेशन लगाने की योजना शुरू की है। इससे हर 15 मिनट में मौसम और बारिश की सटीक जानकारी सरकार को मिलेगी। जो किसानों के लिए फायदेमंद साबित होगी।

News in Short

  • एमपी में डिजिटल क्रांति: अब हर पंचायत में मौसम की मशीन, पल-पल मिलेगी बारिश की खबर
  • बीमा क्लेम का झंझट खत्म! एमपी की 23,634 पंचायतों में लगेंगे ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन
  • हर 15 मिनट में मौसम का अपडेट! एमपी के गांव-गांव में लगेगा हाईटेक 'विंड्स' सिस्टम
  • किसानों की चांदी: अब पंचायत बताएगी कब होगी बारिश, सरकार ने मंजूर किए करोड़ों रुपए
  • खत्म होगा डेटा का खेल! अब एमपी की हर तहसील में मौसम की सटीक निगरानी

News in Detail

मध्य प्रदेश सरकार अब खेती-किसानी को हाईटेक बनाने के मूड में दिख रही है। प्रदेश की सभी 23,634 ग्राम पंचायतों और 444 तहसीलों में अब खास मशीनें लगेंगी। इन मशीनों का नाम है- ऑटोमैटिक रेन गेज और ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन (AWS)।



सरल भाषा में कहें तो अब हर गांव की बारिश का हिसाब सरकार के पास होगा। सरकार ने इसके लिए 'विंड्स' (WINDS) नाम का एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट शुरू किया है। अब मौसम की जानकारी के लिए शहर के केंद्रों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। कृषि विभाग ने इसके लिए कंपनियों से आवेदन मांगें हैं।



हर 15 मिनट में मिलेगी मौसम की खबर

इस नए सिस्टम की सबसे बड़ी ताकत इसकी रफ़्तार और इसकी सटीकता होने वाली है। अब हर 15 मिनट में बारिश और मौसम का डेटा सीधे सरकारी पोर्टल पर पहुंचेगा। पहले क्या होता था कि तहसील में बारिश हुई तो पूरे इलाके को भीगा मान लिया। लेकिन अब ऐसा नहीं होगा क्योंकि हर पंचायत में अपनी खुद की मशीन होगी।



इससे अतिवृष्टि या सूखे की स्थिति का सही और एकदम सटीक पता चल सकेगा। यह डेटा पूरी तरह डिजिटल होगा और इसमें कोई भी इंसान हेराफेरी नहीं कर पाएगा। किसानों के लिए यह जानकारी किसी वरदान से कम साबित नहीं होने वाली है। सरकार के पास रीयल-टाइम डेटा होगा जिससे फैसले लेना बहुत आसान हो जाएगा।



करोड़ों का बजट और केंद्र का साथ

यह कोई छोटा-मोटा काम नहीं है, इसमें केंद्र और राज्य दोनों का पैसा लगा है। एक रेन गेज मशीन लगाने में करीब 35 से 40 हजार रुपए का खर्च आएगा। वहीं तहसील स्तर के वेदर स्टेशन पर डेढ़ से दो लाख रुपए खर्च होंगे। इस पूरे प्रोजेक्ट का कुल बजट लगभग 100 से 120 करोड़ रुपए के बीच है।



खास बात यह है कि भारत सरकार इस खर्च का आधा पैसा खुद वहन कर रही है। इसे 'वायबिलिटी गैप फंडिंग' कहा जाता है जो बड़े प्रोजेक्ट्स को सहारा देती है। बाकी का आधा पैसा राज्य सरकार और काम करने वाली कंपनियां मिलकर लगाएंगी। यह निवेश आने वाले सालों में किसानों की फसल बचाने में बहुत काम आएगा।



किसानों को मिलेगा उनका असली हक

अक्सर किसान शिकायत करते हैं कि उनके गांव में सूखा पड़ा पर बीमा नहीं मिला। इसकी वजह यह थी कि ब्लॉक स्तर पर बारिश का डेटा रिकॉर्ड नहीं हो पाता था। अब हर पंचायत में मशीन लगने से फसल बीमा का क्लेम लेना आसान होगा। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY) के तहत अब नुकसान का सटीक आकलन हो सकेगा।



बीमा कंपनियां अब डेटा की कमी का बहाना बनाकर किसानों का पैसा नहीं रोक सकेंगी। जब हर गांव का डेटा सर्वर पर होगा, तो विवाद की कोई गुंजाइश नहीं बचेगी। यह सिस्टम किसानों और सरकार के बीच भरोसे की एक नई मजबूत दीवार खड़ा करेगा। किसानों को उनके पसीने की हर बूंद का सही मुआवजा अब समय पर मिलेगा।



बिना बिजली के चलेंगी यह मशीन

यह पूरी तकनीक पूरी तरह से आत्मनिर्भर है और इसे बिजली की जरूरत नहीं है। ये मशीनें सौर ऊर्जा यानी सूरज की रोशनी से चलेंगी और इनमें सिम कार्ड लगेगा। जैसे हमारे मोबाइल से मैसेज जाता है, वैसे ही ये मशीनें सर्वर को डेटा भेजेंगी। इसमें तापमान, हवा की गति और नमी नापने वाले बहुत ही आधुनिक सेंसर लगे होंगे।



इंसानी दखल न होने की वजह से डेटा एकदम शुद्ध और पारदर्शी तरीके से रिकॉर्ड होगा। ये उपकरण खराब मौसम में भी बिना रुके अपना काम बखूबी करते रहेंगे। वायरलेस तकनीक के जरिए यह 'विंड्स' के केंद्रीय सर्वर से हर पल जुड़ा रहेगा। इससे मौसम विभाग को भविष्य की सटीक भविष्यवाणी करने में भी बहुत मदद मिलेगी।



अगले 6 से 9 महीने में पूरा होगा काम

सरकार इस काम को टालने के मूड में नहीं है और काम युद्ध स्तर पर होगा। अप्रैल 2026 तक निविदा प्रक्रिया पूरी होने के बाद कंपनियों को काम शुरू करना होगा। वर्क ऑर्डर मिलने के 9 महीने के भीतर सभी पंचायतों में मशीनें लग जानी चाहिए। इसके बाद अगले 5 सालों तक इन मशीनों के रखरखाव की जिम्मेदारी भी कंपनी की होगी।



इसका मतलब है कि अगर कोई मशीन खराब होती है, तो कंपनी उसे ठीक करेगी। सरकार चाहती है कि डेटा का फ्लो कभी न टूटे और किसानों को लाभ मिलता रहे। यह मध्य प्रदेश के इतिहास में खेती का सबसे बड़ा डिजिटल कदम माना जा रहा है। आने वाले समय में एमपी की खेती पूरी तरह से मौसम और डेटा पर आधारित होगी।



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