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मां नर्मदा की महिमा
25 जनवरी को नर्मदा जयंती का पावन पर्व बड़े धूमधाम से मनाया जाएगा। शास्त्रों में मां नर्मदा का प्राकट्य उत्सव भक्तों के लिए सुख और सौभाग्य लेकर आता है। आइए नर्मदा जयंती पर नर्मदा नदी के बारे में जानें....
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शिव के पसीने से उत्पत्ति
पौराणिक कथाओं के मुताबिक जब भगवान शिव मैकल पर्वत पर तपस्या में लीन थे। तब उनके पसीने की बूंद से दिव्य कन्या नर्मदा का जन्म हुआ था। शिवजी ने उन्हें वरदान दिया कि जो कोई भी श्रद्धा से उनका दर्शन करेगा उसका तुरंत ही कल्याण हो जाएगा।
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दर्शन मात्र से पाप मुक्ति
जहां गंगा नदी में डुबकी लगाने से पाप धुलते हैं। वहीं शास्त्रों में कहा गया है कि नर्मदा के लिए उनके केवल दर्शन ही पापनाशिनी शक्ति रखते हैं। भोलेनाथ ने नर्मदा जी की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें ये विशेष वरदान दिया था कि उनका जल सदैव पवित्र रहेगा।
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कण-कण में शंकर का वास
मान्यता है कि नर्मदा नदी के तल से निकलने वाला हर पत्थर स्वयं सिद्ध नर्मदेश्वर शिवलिंग होता है। इसकी स्थापना बिना प्राण-प्रतिष्ठा के भी की जा सकती है। भगवान शिव के वरदान के कारण ही कहा जाता है कि नर्मदा का हर कंकर, शंकर होता है।
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ओंकारेश्वर का पावन संगम
मध्यप्रदेश के खंडवा जिले में स्थित ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर के पास नर्मदा का स्वरूप अत्यंत मनोहारी है। यहां नर्मदा नदी ॐ का आकार बनाती है। ये इस स्थान को आध्यात्मिक रूप से पूरे विश्व में सबसे अनूठा और शक्तिशाली ऊर्जा केंद्र बनाता है।
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एकमात्र परिक्रमा वाली नदी
संसार की सभी नदियों में केवल नर्मदा ही ऐसी नदी हैं जिनकी संपूर्ण परिक्रमा की जाती है। इसे नर्मदा परिक्रमा कहते हैं। भक्त आत्म-ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति के लिए अमरकंटक से गुजरात तक की कठिन पदयात्रा पूरी कर मांं का आशीर्वाद लेते हैं।
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उल्टा बहने की अनोखी दिशा
ज्योग्राफिकली और धार्मिक दृष्टि से नर्मदा जी की एक विशेषता ये भी है कि वे अन्य नदियों के विपरीत पूर्व से पश्चिम की ओर बहती हैं। ये उनके अडिग और स्वतंत्र स्वभाव का प्रतीक माना जाता है।
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देवताओं का स्थायी निवास
भगवान शिव ने नर्मदा जी को आशीष दिया था कि उनके तटों पर सभी तैंतीस कोटि देवी-देवताओं का सदैव वास रहेगा। इसलिए नर्मदा तट पर किया गया दान, तप और पूजन अक्षय फलदायी होता है।
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