नेपानगर महासम्मेलन: आदिवासी धर्म कोड के बहाने उमंग सिंघार ने सरकार को ललकारा

Ramanand Tiwari | Jan 14, 2026, 23:17 IST
umang singhar
नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने आदिवासियों के लिए अलग धर्म कोड की मांग की। उन्होंने सरकार को संगठित आदिवासी शक्ति से झुकने पर मजबूर करने की बात कही।

NEWS In short

  1. नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने आदिवासियों के अलग धर्म कोड की मांग की है।
  2. सिंघार ने कहा कि मध्यप्रदेश में 1.5 करोड़ से अधिक आदिवासी रहते हैं।
  3. सिंघार का दावा है कि आदिवासी संगठित होकर सरकार को झुकने पर मजबूर कर सकते हैं।
  4. यदि समाज एकजुट हो जाता है, तो कोई सरकार उनके संवैधानिक अधिकारों से इनकार नहीं कर सकती।
  5. सिंघार ने झारखंड के आदिवासी आंदोलन का उदाहरण दिया हैं।

News in Detail

मध्यप्रदेश के नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के एक बयान ने प्रदेश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। आदिवासियों ने अलग धर्म कोड की मांग की। उन्होंने सरकार पर दबाव बनाने की बात कही। साथ ही, यह संकेत दिया कि संगठित आदिवासी शक्ति सरकार को झुकने पर मजबूर कर सकती है।



सरकार को अधिकार देना पड़ेगा

33वें आदिवासी सांस्कृतिक एकता महासम्मेलन में उमंग सिंघार ने कहा कि मध्यप्रदेश में डेढ़ करोड़ से अधिक आदिवासी रहते हैं। यदि समाज एकजुट होकर अपनी आवाज उठाए, तो कोई सरकार उनके संवैधानिक अधिकार देने से इनकार नहीं कर सकती। उनका बयान सियासी गलियारों में सरकार के लिए खुली चेतावनी के तौर पर देखा जा रहा है।



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महासम्मेलन बना शक्ति प्रदर्शन का मंच

नेपानगर में आयोजित महासम्मेलन में आदिवासी प्रतिनिधि पहुंचे। इसमें मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और गुजरात के प्रतिनिधि शामिल थे। सिंघार ने इसे एकता, चेतना और संस्कृति का उदाहरण बताया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह भाषण सामाजिक संदेश और शक्ति प्रदर्शन था।



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क्या आदिवासियों को बनाया जा रहा है राजनीतिक ढाल?

उमंग सिंघार ने भले ही यह कहा कि वे राजनीति से दूर रहकर समाज के अधिकारों की बात कर रहे हैं। लेकिन मंच, भीड़ और बयान की भाषा कई सवाल खड़े करती है। सवाल यह है कि आदिवासी धर्म कोड की मांग सामाजिक सरोकार से जुड़ी है या राजनीतिक समीकरणों की तैयारी हो रही है।



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झारखंड मॉडल का हवाला

नेता प्रतिपक्ष ने झारखंड के आदिवासी आंदोलन का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश के आदिवासियों को भी संघर्ष करना होगा। उन्होंने राष्ट्रपति को ज्ञापन भेजने की बात की। इसे आदिवासियों का संवैधानिक अधिकार बताया। यह बयान केंद्र और राज्य सरकार पर दबाव बनाने की रणनीति है।



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जल-जंगल-जमीन के नाम पर भावनात्मक अपील

उमंग सिंघार ने भाषण के अंत में जल, जंगल, जमीन की रक्षा का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि वे आदिवासी संस्कृति और अस्मिता की लड़ाई में हमेशा समाज के साथ रहेंगे। यह भावनात्मक अपील आंदोलन को मजबूत करने की कोशिश मानी जा रही है।



आने वाले समय में साफ होगी तस्वीर

उमंग सिंघार का यह बयान आदिवासी अधिकारों की बहस को फिर केंद्र में ले आया है। लेकिन यह भी साफ है कि इस मुद्दे पर राजनीति और आंदोलन की रेखा धुंधली होती जा रही है। अब देखना यह है कि यह आवाज जन आंदोलन बनेगी या राजनीतिक हथियार।





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