एमपी का सबसे बड़ा कास्ट सर्टिफिकेट फ्रॉड : 26 साल पुरानी हेराफेरी ने रोक दी IPS बनने की राह

मध्यप्रदेश में जाति प्रमाण पत्र में हेराफेरी की पुरानी कहानी सामने आई है। ASP अमृतलाल मीना की 26 साल पुरानी जाति प्रमाण पत्र धोखाधड़ी ने आईपीएस बनने की राह रोक दी है।

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Sanjay Sharma
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MP's biggest cast certificate fraud, 30 years old fraud stopped the path of becoming IPS

Photograph: (the sootr)

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NEWS IN SHORT

  • आईपीएस पद पर रोक: फर्जी जाति प्रमाण पत्र मामले के चलते एएसपी अमृतलाल मीना का आईपीएस अवार्ड रुक गया है।
  • 1991 का फर्जीवाड़ा: गुना निवासी मीना ने 1991 में विदिशा की लटेरी तहसील से जनजातीय कोटे का प्रमाण पत्र बनवाया था।
  • ओबीसी छात्रवृत्ति का सबूत: जांच में सामने आया कि मीना ने स्कूल और कॉलेज के दौरान ओबीसी वर्ग की छात्रवृत्ति ली थी।
  • समिति ने किया अमान्य: राज्य स्तरीय छानबीन समिति ने बयानों को नकारते हुए तथ्यों के आधार पर प्रमाण पत्र अमान्य कर दिया।
  • हाईकोर्ट से स्टे: प्रमाण पत्र रद्द होने के बाद अमृतलाल मीना फिलहाल हाईकोर्ट से 9 फरवरी तक स्टे ले आए हैं।

NEWS IN DETAIL

BHOPAL. मध्य प्रदेश में फर्जी जाति प्रमाण पत्रों के सहारे सरकारी नौकरी हथियाने की लंबी फेहरिस्त है। हम जिस मामले की बात कर रहे हैं वह फेक कास्ट सर्टिफिकेट फ्रॉड का सबसे बड़ा और चर्चित मामला है। 26 साल पहले पुलिस महकमे में डीएसपी बनने के लिए जाति प्रमाण पत्र में हेराफेरी ने आईपीएस बनने की राह में रोड़ा अटका दिया है।

साल 2007 और 2012 में डीएसपी अमृतलाल मीना का जाति प्रमाण पत्र फर्जी होने की शिकायतों पर कई जांचें हुईं। हर बार अधिकारी या तो जांच करने में भ्रमित हो गए या पक्षपात के चलते शिकायतों को नकार दिया गया। ऐसे में मामला हाईकोर्ट पहुंच गया। हाईकोर्ट की सख्ती के बाद जब राज्य स्तरीय समिति ने दोबारा जांच की तो जाति प्रमाण पत्र की धांधली खुलकर सामने आ गई।

हाईकोर्ट पहुंचता रहा बार-बार मामला

यह मामला बार-बार हाईकोर्ट पहुंचता रहा। कभी शिकायतकर्ता जांच की विसंगतियों को लेकर हाईकोर्ट पहुंचे तो कभी पुलिस मुख्यालय में तैनात एएसपी अमृतलाल मीना अपनी नौकरी बचाने के लिए। अब हाईकोर्ट के आदेश पर राज्य उच्च स्तरीय छानबीन समिति ने जब जांच रिपोर्ट के आधार पर मौखिक बयानों को नकारते हुए उनका जाति प्रमाण पत्र अमान्य कर दिया है, तो एक बार फिर मीना हाईकोर्ट से स्टे ले आए हैं। हालांकि उन्हें 9 फरवरी तक जवाब पेश करने का मौका मिल गया है। लेकिन जाति प्रमाण पत्र में हेराफेरी के तथ्यों ने फिलहाल उनसे आईपीएस अवार्ड छीन लिया है।

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'द सूत्र' की पड़ताल में चौंकाने वाले तथ्य

मध्य प्रदेश के सबसे चर्चित जाति प्रमाण पत्र फर्जीवाड़े की पड़ताल में 'द सूत्र' के सामने ऐसे तथ्य आए हैं जो व्यवस्था पर सवाल खड़े करते हैं। सरकारी नौकरी के लिए कैसे हेराफेरी की जाती है और जांच समितियों को प्रभावित कर कैसे हथकंडों का सहारा लेते हैं, इसका भी खुलासा हुआ है। इस धांधली से जनजातीय वर्ग के वास्तविक अभ्यर्थी प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाते हैं और अपात्र उनके हिस्से की नौकरी पर कब्जा जमा लेते हैं।

हम जिस मामले की बात कर रहे हैं वह राज्य पुलिस सेवा के अधिकारी अमृतलाल मीना से संबंधित है। अमृतलाल मीना एमपीपीएससी की परीक्षा के जरिए जनजातीय वर्ग के कोटे से साल 1999 में डीएसपी (उप पुलिस अधीक्षक) नियुक्त हुए थे। पोस्टिंग के बाद वे कई जिलों में पदस्थ रहे। साल 2007 में इंदौर निवासी भानु कुमार जैन और साल 2012 में लटेरी के रमेश ठाकरे व सागर निवासी विनयकांत सुहाने ने उनके जाति प्रमाण पत्र पर सवाल उठाए थे।

इन शिकायतों के बाद मामला जांच तक पहुंचा लेकिन विभागीय अधिकारियों से संपर्कों के चलते रिपोर्ट उनके पक्ष में बनी। जांच की रस्मअदायगी के बाद अमृतलाल मीना को क्लीनचिट दे दी गई। हेराफेरी ज्यादा दिन पर्दे में छिपी नहीं रहती और अब फर्जीवाड़ा अमृतलाल मीना पर भारी पड़ गया है।

बयानों के आधार पर दी गई क्लीनचिट:

  1. साल 2007 में हुई शिकायत पर साल 2010 में सीआईडी से जांच कराई गई लेकिन अमृतलाल मीना के गांव और परिवार के लोगों के बयानों के आधार पर क्लीनचिट दे दी गई।

  2. साल 2012 में हुई शिकायत पर 4 साल फाइलों में जांच चली और 2016 में एकपक्षीय निर्णय आया। डीएसपी की अपील पर हाईकोर्ट से स्टे मिला, लेकिन इस स्टे के बाद यह मामला मध्य प्रदेश में जाति प्रमाण पत्र की हेराफेरी का सबसे चर्चित केस बन गया। 

सुप्रीम कोर्ट का फैसला बना जांच का आधार:

डीएसपी को मिले स्थगन के विरोध में शिकायतकर्ता भी हाईकोर्ट पहुंच गए। पुरानी जांचों को नकारते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले (माधुरी पाटिल मामला) के आधार पर नए सिरे से निष्पक्ष जांच के आदेश दिए। हाईकोर्ट ने राज्य स्तरीय समिति को पुरानी किसी भी जांच से प्रभावित हुए बिना निष्पक्ष रिपोर्ट तैयार करने का आदेश दिया था। इसके बाद दो जिलों के पुलिस अधिकारियों ने दो जिलों के तीन गांवों से तथ्य जुटाए, राजस्व और स्कूल रिकॉर्ड खंगाले, दर्जनों ग्रामीणों के बयान दर्ज किए तो जाति प्रमाण पत्र की हेराफेरी खुलकर सामने आ गई। साल 2023 में लटेरी के आनंदपुर थाने में धोखाधड़ी का अपराध भी दर्ज किया जा चुका है।

जांच अधिकारियों की नजर से चूके तथ्य:

राज्य स्तरीय छानबीन समिति द्वारा विदिशा और गुना जिले के पुलिस अधिकारियों को सूक्ष्म जांच की जिम्मेदारी दी गई थी। अमृतलाल मीना के जाति प्रमाण पत्र की जांच करने वाले अधिकारी इस मामले में चूक गए। उन्होंने सैंकड़ा भर ग्रामीणों के बयान तो दर्ज किए लेकिन तथ्यात्मक रिकॉर्ड नहीं जुटाया।

अधिकारियों के जांच प्रतिवेदन भी लोगों के बयानों के आधार पर अमृतलाल मीना को विदिशा जिले की लटेरी तहसील का मूल निवासी बताते हैं। लेकिन राज्य उच्च स्तरीय समिति ने प्राथमिक, माध्यमिक कक्षा और कॉलेज में ली गई ओबीसी की छात्रवृत्ति और उनकी पैतृक जमीन के दस्तावेजों के आधार पर गुना और विदिशा जिला पुलिस अधीक्षक की जांच को नकार दिया है।

ओबीसी नहीं फिर क्यों लेते रहे छात्रवृत्ति?

अमृतलाल मीना के जाति प्रमाण पत्र की जांच के दौरान उनकी प्राथमिक परीक्षा की अंकसूची सामने आई। यह अंकसूची जिला स्तरीय प्राथमिक परीक्षा मंडल गुना से जारी हुई थी जिसमें उनकी जाति पिछड़ा वर्ग (OBC) दर्शाई गई है। इस पर मीना का जवाब था कि तत्कालीन शिक्षक द्वारा जाति दर्ज की गई होगी।

छानबीन समिति के सामने गुना जिले के चाचौड़ा ब्लॉक स्थित बापचा लहरिया माध्यमिक शाला का रिकॉर्ड भी है, जिसमें अमृतलाल मीना द्वारा ओबीसी वर्ग की 105 रुपए की छात्रवृत्ति ली गई थी। वहीं गुना पीजी कॉलेज के रिकॉर्ड में भी साल 1991-1992 में मीना द्वारा ओबीसी वर्ग की 268 रुपए की छात्रवृत्ति का चेक लेने की पुष्टि हुई है। जनजातीय वर्ग के जिस जाति प्रमाण पत्र के आधार पर डीएसपी का पद हासिल किया वह 1991 में लटेरी तहसील से जारी कराया गया था।

राजस्व रिकॉर्ड में गुना जिले में कृषि भूमि:

1958 के राजस्व रिकॉर्ड में अमृतलाल मीना के दादा बिहारीलाल मीना के नाम चाचौड़ा तहसील के ग्राम हरीछा में कृषि भूमि दर्ज है। छानबीन समिति के सवाल पर मीना ने इस तथ्य को भी नकारा है। उनका कहना है कि हरीछा में उनके दादा की ससुराल थी। कृषि भूमि का टैक्स जमा न कर पाने की वजह से दादा ने आर्थिक मदद की थी जिस वजह से राजस्व रिकॉर्ड में उनका नाम चढ़ा दिया गया। जबकि वे लटेरी के जिस मडावता गांव को अपना मूल गांव बता रहे हैं, वहां 1958 या उससे पहले के रिकॉर्ड में कोई कृषि भूमि ही दर्ज नहीं है।

तथ्यों के आगे बिखर गई धांधली:

राज्य स्तरीय छानबीन समिति ने तथ्यों के आधार पर माना कि डीएसपी का पद हासिल करने के लिए अमृतलाल मीना द्वारा खुद को लटेरी तहसील का मूल निवासी बताया गया है। विदिशा की लटेरी तहसील में मीना जाति को जनजातीय वर्ग के आरक्षण में रखा गया था। इसका फायदा लेने के लिए गुना के चाचौड़ा का निवासी होने के बावजूद लटेरी के मडावता में जमीन खरीदी गई।

अंततः साल 2012 में हुई शिकायत और हाईकोर्ट के आदेश पर 13 साल चली लंबी जांच के बाद धांधली की परतें खुलकर सामने आ गई हैं। राज्य स्तरीय छानबीन समिति ने पुलिस अधिकारी अमृतलाल मीना के जाति प्रमाण पत्र को अमान्य कर वैधानिक कार्रवाई की अनुशंसा की है। यानी पुलिस अधिकारी बनने के लिए अमृतलाल मीना द्वारा की गई हेराफेरी अब उनकी मुसीबत बन गई है।

इतने ग्रामीणों को बनाया गवाह:

मूलचंद मीना, संतोष मीना, दीवान सिंह मीना, मथुरालाल मीना, रामस्वरूप मीना, धीरज मीना, रामेश्वर मीना (ग्राम मडावता लटेरी), मोहर सिंह भील, चेतन सिंह राजपूत (हरिपुर लटेरी), हजारीलाल बंजारा, मांगीलाल बंजारा (हरिपुर), हरवीर सिंह मीना (मडावता), प्रकाश बाई मीना (ग्राम सोल्याहेडी कुभराज गुना), रोडीबाई भील (बापचा लहरिया गुना), रामजीवन मीना (नलखेड़ा बीनागंज), अनिरुद्ध मीना (भैंसुआ चाचौड़ा), कृष्ण मुरारी मीना (पोरूखेड़ी गुना), मांगीलाल सेन, पुरुषोत्तम शर्मा (बापचा लहरिया गुना), श्यामलाल वाल्मीकि, फूलसिंह मीना, कालूराम मीना, रामजीवन मीना, जगदीश मीना (चक हरीछा), तखत सिंह मीना, हरभजन विश्वकर्मा।

मामला हाईकोर्ट में विचाराधीन:

'द सूत्र' ने जाति प्रमाण पत्र अमान्य किए जाने के संबंध में एएसपी अमृतलाल मीना से बात की तो उनका कहना था कि उन्होंने राज्य स्तरीय छानबीन समिति के निर्णय के खिलाफ अपील की है। हाईकोर्ट ने इस पर स्टे दिया है। मामला अभी हाईकोर्ट में विचाराधीन है इसलिए वे इस पर कोई भी टिप्पणी नहीं करना चाहते। उन्होंने जनजातीय कार्य विभाग की छानबीन समिति के निष्कर्ष पर भी कमेंट करने से इनकार कर दिया है।

152 शिकायतों में 67 जाति प्रमाण पत्र मिले जाली:

एमपी जनजातीय कार्य विभाग की राज्य उच्च स्तरीय छानबीन समिति के पास 152 मामलों में जाति प्रमाण पत्रों से संबंधित शिकायतें पहुंची थीं। समिति द्वारा कराई गई जांच में 67 जाति प्रमाण पत्र फर्जी पाए गए हैं। समिति द्वारा इन सभी प्रमाण पत्रों को अमान्य कर दिया गया है जिसके बाद अधिकांश लोगों पर आपराधिक प्रकरण भी दर्ज कराए जा चुके हैं। वहीं जांच के बाद 54 जाति प्रमाण पत्रों के जाली होने की शिकायतों को खारिज किया गया है। इसके साथ ही 31 जाति प्रमाण पत्रों को जीएडी की गाइडलाइन के आधार पर संरक्षण दिया गया है।

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संदेहास्पद सर्टिफिकेट पर समिति की जांच:

कुल मामलेअमान्यमान्यसंरक्षण
152675431

माधुरी पाटिल केस में सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था:

  1. जाति प्रमाण पत्र (सामाजिक स्थिति प्रमाण पत्र) राजस्व सबडिवीजन अधिकारी, डिप्टी कलेक्टर अथवा उपायुक्त स्तर के अधिकारी द्वारा जारी किया जाए।

  2. माता-पिता, अभिभावक या आवेदक द्वारा जाति प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए राजपत्रित अधिकारी अथवा सक्षम गैर राजपत्रित अधिकारी द्वारा सत्यापित शपथ पत्र के आधार पर जारी किया जाए। इसमें उसकी जाति, उपजाति, जनजाति, जनजातीय समुदाय, जिस स्थान से वह आता है वहां का मूल विवरण भी दर्ज होगा।

  3. शैक्षणिक संस्थान में प्रवेश अथवा किसी पद पर नियुक्ति के लिए आवेदन करने से छह माह पूर्व जाति प्रमाण पत्र के सत्यापन के लिए जांच समिति को आवेदन करना होगा।

  4. राज्य सरकारें तीन अधिकारियों की समिति गठित करेंगी जिसमें एक अतिरिक्त या संयुक्त सचिव या संबंधित विभाग के निदेशक से उच्च पद का अधिकारी, एक निदेशक और अनुसूचित जातियों/जनजातियों के मामलों के विशेषज्ञ अधिकारी शामिल होंगे।

  5. प्रत्येक निदेशालय को एक सतर्कता प्रकोष्ठ (Vigilance Cell) गठित करना चाहिए जिसमें वरिष्ठ उप पुलिस अधीक्षक और पर्याप्त संख्या में निरीक्षक तैनात हों। उन्हें उम्मीदवार के मूल निवास स्थान पर जाकर व्यक्तिगत रूप से तथ्यों का सत्यापन करना चाहिए।

  6. सत्यापन के लिए विद्यालय के रिकॉर्ड और जन्म पंजीकरण की जांच अनिवार्य है। माता-पिता या अभिभावक की जाति के संबंध में स्थानीय लोगों से पूछताछ करनी चाहिए।

  7. विशेष रूप से अनुसूचित जनजातियों के मामले में उनके विशिष्ट रीति-रिवाज, अनुष्ठान, विवाह विधि, और मृत्यु संस्कार आदि की नृवंश वैज्ञानिक जांच भी रिपोर्ट में दर्ज होनी चाहिए।

  8. यदि रिपोर्ट में सामाजिक स्थिति का दावा "फर्जी" या "झूठा" पाया जाता है, तो 'कारण बताओ नोटिस' जारी करना चाहिए और दो से चार सप्ताह के भीतर जवाब प्राप्त कर अंतिम निर्णय लेना चाहिए।

हाईकोर्ट जाति प्रमाण पत्र छानबीन समिति एमपी जनजातीय कार्य विभाग राज्य पुलिस सेवा एएसपी अमृतलाल मीना राज्य उच्च स्तरीय छानबीन समिति
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