एमपी का सबसे बड़ा कास्ट सर्टिफिकेट फ्रॉड : 26 साल पुरानी हेराफेरी ने रोक दी IPS बनने की राह
Sanjay Sharma | Jan 14, 2026, 21:48 IST
Photograph: (the sootr)
मध्यप्रदेश में जाति प्रमाण पत्र में हेराफेरी की पुरानी कहानी सामने आई है। ASP अमृतलाल मीना की 26 साल पुरानी जाति प्रमाण पत्र धोखाधड़ी ने आईपीएस बनने की राह रोक दी है।
NEWS IN SHORT
- आईपीएस पद पर रोक: फर्जी जाति प्रमाण पत्र मामले के चलते एएसपी अमृतलाल मीना का आईपीएस अवार्ड रुक गया है।
- 1991 का फर्जीवाड़ा: गुना निवासी मीना ने 1991 में विदिशा की लटेरी तहसील से जनजातीय कोटे का प्रमाण पत्र बनवाया था।
- ओबीसी छात्रवृत्ति का सबूत: जांच में सामने आया कि मीना ने स्कूल और कॉलेज के दौरान ओबीसी वर्ग की छात्रवृत्ति ली थी।
- समिति ने किया अमान्य: राज्य स्तरीय छानबीन समिति ने बयानों को नकारते हुए तथ्यों के आधार पर प्रमाण पत्र अमान्य कर दिया।
- हाईकोर्ट से स्टे: प्रमाण पत्र रद्द होने के बाद अमृतलाल मीना फिलहाल हाईकोर्ट से 9 फरवरी तक स्टे ले आए हैं।
NEWS IN DETAIL
साल 2007 और 2012 में डीएसपी अमृतलाल मीना का जाति प्रमाण पत्र फर्जी होने की शिकायतों पर कई जांचें हुईं। हर बार अधिकारी या तो जांच करने में भ्रमित हो गए या पक्षपात के चलते शिकायतों को नकार दिया गया। ऐसे में मामला हाईकोर्ट पहुंच गया। हाईकोर्ट की सख्ती के बाद जब राज्य स्तरीय समिति ने दोबारा जांच की तो जाति प्रमाण पत्र की धांधली खुलकर सामने आ गई।
हाईकोर्ट पहुंचता रहा बार-बार मामला
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हम जिस मामले की बात कर रहे हैं वह राज्य पुलिस सेवा के अधिकारी अमृतलाल मीना से संबंधित है। अमृतलाल मीना एमपीपीएससी की परीक्षा के जरिए जनजातीय वर्ग के कोटे से साल 1999 में डीएसपी (उप पुलिस अधीक्षक) नियुक्त हुए थे। पोस्टिंग के बाद वे कई जिलों में पदस्थ रहे। साल 2007 में इंदौर निवासी भानु कुमार जैन और साल 2012 में लटेरी के रमेश ठाकरे व सागर निवासी विनयकांत सुहाने ने उनके जाति प्रमाण पत्र पर सवाल उठाए थे।
इन शिकायतों के बाद मामला जांच तक पहुंचा लेकिन विभागीय अधिकारियों से संपर्कों के चलते रिपोर्ट उनके पक्ष में बनी। जांच की रस्मअदायगी के बाद अमृतलाल मीना को क्लीनचिट दे दी गई। हेराफेरी ज्यादा दिन पर्दे में छिपी नहीं रहती और अब फर्जीवाड़ा अमृतलाल मीना पर भारी पड़ गया है।
बयानों के आधार पर दी गई क्लीनचिट:
- साल 2007 में हुई शिकायत पर साल 2010 में सीआईडी से जांच कराई गई लेकिन अमृतलाल मीना के गांव और परिवार के लोगों के बयानों के आधार पर क्लीनचिट दे दी गई।
- साल 2012 में हुई शिकायत पर 4 साल फाइलों में जांच चली और 2016 में एकपक्षीय निर्णय आया। डीएसपी की अपील पर हाईकोर्ट से स्टे मिला, लेकिन इस स्टे के बाद यह मामला मध्य प्रदेश में जाति प्रमाण पत्र की हेराफेरी का सबसे चर्चित केस बन गया।
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सुप्रीम कोर्ट का फैसला बना जांच का आधार:
जांच अधिकारियों की नजर से चूके तथ्य:
अधिकारियों के जांच प्रतिवेदन भी लोगों के बयानों के आधार पर अमृतलाल मीना को विदिशा जिले की लटेरी तहसील का मूल निवासी बताते हैं। लेकिन राज्य उच्च स्तरीय समिति ने प्राथमिक, माध्यमिक कक्षा और कॉलेज में ली गई ओबीसी की छात्रवृत्ति और उनकी पैतृक जमीन के दस्तावेजों के आधार पर गुना और विदिशा जिला पुलिस अधीक्षक की जांच को नकार दिया है।
ओबीसी नहीं फिर क्यों लेते रहे छात्रवृत्ति?
छानबीन समिति के सामने गुना जिले के चाचौड़ा ब्लॉक स्थित बापचा लहरिया माध्यमिक शाला का रिकॉर्ड भी है, जिसमें अमृतलाल मीना द्वारा ओबीसी वर्ग की 105 रुपए की छात्रवृत्ति ली गई थी। वहीं गुना पीजी कॉलेज के रिकॉर्ड में भी साल 1991-1992 में मीना द्वारा ओबीसी वर्ग की 268 रुपए की छात्रवृत्ति का चेक लेने की पुष्टि हुई है। जनजातीय वर्ग के जिस जाति प्रमाण पत्र के आधार पर डीएसपी का पद हासिल किया वह 1991 में लटेरी तहसील से जारी कराया गया था।
राजस्व रिकॉर्ड में गुना जिले में कृषि भूमि:
तथ्यों के आगे बिखर गई धांधली:
अंततः साल 2012 में हुई शिकायत और हाईकोर्ट के आदेश पर 13 साल चली लंबी जांच के बाद धांधली की परतें खुलकर सामने आ गई हैं। राज्य स्तरीय छानबीन समिति ने पुलिस अधिकारी अमृतलाल मीना के जाति प्रमाण पत्र को अमान्य कर वैधानिक कार्रवाई की अनुशंसा की है। यानी पुलिस अधिकारी बनने के लिए अमृतलाल मीना द्वारा की गई हेराफेरी अब उनकी मुसीबत बन गई है।
इतने ग्रामीणों को बनाया गवाह:
मामला हाईकोर्ट में विचाराधीन:
152 शिकायतों में 67 जाति प्रमाण पत्र मिले जाली:
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संदेहास्पद सर्टिफिकेट पर समिति की जांच:
| कुल मामले | अमान्य | मान्य | संरक्षण |
| 152 | 67 | 54 | 31 |
माधुरी पाटिल केस में सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था:
- जाति प्रमाण पत्र (सामाजिक स्थिति प्रमाण पत्र) राजस्व सबडिवीजन अधिकारी, डिप्टी कलेक्टर अथवा उपायुक्त स्तर के अधिकारी द्वारा जारी किया जाए।
- माता-पिता, अभिभावक या आवेदक द्वारा जाति प्रमाण पत्र प्राप्त करने के लिए राजपत्रित अधिकारी अथवा सक्षम गैर राजपत्रित अधिकारी द्वारा सत्यापित शपथ पत्र के आधार पर जारी किया जाए। इसमें उसकी जाति, उपजाति, जनजाति, जनजातीय समुदाय, जिस स्थान से वह आता है वहां का मूल विवरण भी दर्ज होगा।
- शैक्षणिक संस्थान में प्रवेश अथवा किसी पद पर नियुक्ति के लिए आवेदन करने से छह माह पूर्व जाति प्रमाण पत्र के सत्यापन के लिए जांच समिति को आवेदन करना होगा।
- राज्य सरकारें तीन अधिकारियों की समिति गठित करेंगी जिसमें एक अतिरिक्त या संयुक्त सचिव या संबंधित विभाग के निदेशक से उच्च पद का अधिकारी, एक निदेशक और अनुसूचित जातियों/जनजातियों के मामलों के विशेषज्ञ अधिकारी शामिल होंगे।
- प्रत्येक निदेशालय को एक सतर्कता प्रकोष्ठ (Vigilance Cell) गठित करना चाहिए जिसमें वरिष्ठ उप पुलिस अधीक्षक और पर्याप्त संख्या में निरीक्षक तैनात हों। उन्हें उम्मीदवार के मूल निवास स्थान पर जाकर व्यक्तिगत रूप से तथ्यों का सत्यापन करना चाहिए।
- सत्यापन के लिए विद्यालय के रिकॉर्ड और जन्म पंजीकरण की जांच अनिवार्य है। माता-पिता या अभिभावक की जाति के संबंध में स्थानीय लोगों से पूछताछ करनी चाहिए।
- विशेष रूप से अनुसूचित जनजातियों के मामले में उनके विशिष्ट रीति-रिवाज, अनुष्ठान, विवाह विधि, और मृत्यु संस्कार आदि की नृवंश वैज्ञानिक जांच भी रिपोर्ट में दर्ज होनी चाहिए।
- यदि रिपोर्ट में सामाजिक स्थिति का दावा "फर्जी" या "झूठा" पाया जाता है, तो 'कारण बताओ नोटिस' जारी करना चाहिए और दो से चार सप्ताह के भीतर जवाब प्राप्त कर अंतिम निर्णय लेना चाहिए।
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