हाईकोर्ट परिसर में गहराया जातीय टकराव, ओबीसी-सवर्ण अधिवक्ता आमने-सामने

13 जनवरी 2026 को मध्यप्रदेश हाईकोर्ट परिसर में जातीय टकराव बढ़ा। ओबीसी और सवर्ण अधिवक्ताओं के बीच विवाद हुआ। मामला बार काउंसिल तक पहुंच गया।

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Neel Tiwari
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NEWS In short

1. हाईकोर्ट परिसर की घटना को लेकर ओबीसी/एससी-एसटी और सवर्ण वर्ग के अधिवक्ता आमने-सामने आ गए।
2. हाईकोर्ट अधिवक्ता संघ ने झूठी शिकायत और दुर्भावना फैलाने के आरोप में दो अधिवक्ताओं को नोटिस जारी किया।
3. संयुक्त कार्यकारिणी बैठक में दोषी अधिवक्ताओं पर कठोर कार्रवाई का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हुआ।
4. मामला अब बार काउंसिल तक पहुंचा, कुछ अधिवक्ताओं का रजिस्ट्रेशन निरस्त करने पर विचार किया जा रहा है।
5. पिछड़ा वर्ग अधिवक्ता कल्याण संघ ने चीफ जस्टिस से CCTV जांच और निष्पक्ष कार्रवाई की मांग की।

News in Detail

मध्यप्रदेश हाईकोर्ट परिसर में 13 जनवरी 2026 को घटित घटना अब गंभीर कानूनी, सामाजिक और पेशेवर संकट बन गई है। मामला अब आपसी आरोप-प्रत्यारोप से बढ़कर रजिस्ट्रेशन निरस्त होने तक पहुंचा।

OBC/SC-ST वर्ग के अधिवक्ताओं ने इसे जातीय उत्पीड़न और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन बताया। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट अधिवक्ता संघ ने इसे झूठी शिकायत और सामाजिक विद्वेष फैलाने की साजिश कहा। इस टकराव ने हाईकोर्ट परिसर में तनाव बढ़ा दिया है।

तीन अधिवक्ता संगठनों की बैठक

14 जनवरी 2026 को जबलपुर में तीन अधिवक्ता संगठनों की बैठक हुई। बैठक की अध्यक्षता धन्य कुमार जैन ने की। सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित किया गया। अधिवक्ता रूप सिंह मरावी के खिलाफ निष्पक्ष जांच कराई जाए। उनके खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज कराया जाए। उनकी सदस्यता समाप्त करने के लिए नोटिस जारी किया जाए।

सोशल मीडिया के जरिए विद्वेष फैलाने के आरोप में अधिवक्ता विनायक शाह की सदस्यता भी समाप्त की जाएगी। बैठक में संजय अग्रवाल, मनीष मिश्रा और अन्य कार्यकारिणी सदस्य मौजूद थे। सैकड़ों अधिवक्ताओं ने ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन की प्रति एसपी जबलपुर को भेजी गई।

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आचार संहिता का उल्लंघन

इस विवाद का सबसे गंभीर पहलू यह है कि अब मामला बार काउंसिल ऑफ मध्यप्रदेश तक पहुंच चुका है। सूत्रों के अनुसार, झूठी शिकायत, पेशे की गरिमा को ठेस पहुंचाने, और सामाजिक वैमनस्य फैलाने के आरोपों पर विचार किया जा रहा है। इन अधिवक्ताओं के बार काउंसिल रजिस्ट्रेशन को निलंबित या निरस्त किया जा सकता है।

अधिवक्ता संगठनों का कहना है कि झूठे आरोप कोर्ट परिसर की शांति भंग करते हैं। यह एडवोकेट्स एक्ट और पेशेवर आचार संहिता का उल्लंघन है। ऐसे मामलों में सदस्यता समाप्त करने के साथ लाइसेंस रद्द करना जरूरी है। यह कदम भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए जरूरी है।

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आपत्तिजनक जातिसूचक भाषा का प्रयोग

मध्य प्रदेश पिछड़ा वर्ग अधिवक्ता कल्याण संघ और एससी/एसटी/ओबीसी संगठनों ने इस घटना को दबाने का प्रयास बताया। संघ ने मुख्य न्यायमूर्ति को लिखे पत्र में आरोप लगाया है। आरोप है कि 13 जनवरी 2026 को हाईकोर्ट परिसर में आपत्तिजनक जातिसूचक भाषा का प्रयोग किया गया।

आदिवासी अधिवक्ता रूप सिंह मरावी ने इसका विरोध किया। उनके साथ मारपीट की गई। सिविल लाइन थाना प्रभारी ने शिकायत के बावजूद एफआईआर दर्ज नहीं की। संघ ने घटना स्थल के CCTV फुटेज की मांग की। स्वतंत्र जांच कर दोषियों पर SC/ST एक्ट सहित कार्रवाई की मांग की।

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इस मामले पर अधिवक्ता समाज की नजर

यह मामला पुलिस जांच, हाईकोर्ट प्रशासन, बार एसोसिएशन और बार काउंसिल की प्रक्रिया से जुड़ा है। कानूनी जानकारों के मुताबिक, बार काउंसिल का रजिस्ट्रेशन निरस्त होने से पेशेवर भविष्य प्रभावित हो सकता है।

यह विवाद जातीय या संगठनात्मक संघर्ष से आगे बढ़ चुका है। अब यह पेशेवर साख, न्यायालय की गरिमा और संवैधानिक मूल्यों की परीक्षा बन चुका है। प्रदेश का अधिवक्ता समाज इस मामले पर नजर बनाए हुए है। सभी की निगाहें जांच और आगे के कदम पर हैं।

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