आदिवासियों के लिए धर्म कोड की मांग, क्या बनेगा कांग्रेस का चुनावी मास्टर स्ट्रोक ?

Harish Divekar | Mar 12, 2026, 07:00 IST
Photograph: (the sootr)
मध्य प्रदेश में कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने आदिवासियों के लिए अलग धर्म कोड की मांग उठाकर सियासत गर्मा दी है। जानिए क्या है यह पूरा विवाद।

News Strike.आदिवासी हिंदू है या मुसलमान है, सिक्ख है या ईसाई। क्या जब जाति या धर्म का कॉलम भरा जाता है। तब उसमें एक ऑप्शन आदिवासी का भी होना चाहिए। क्या आदिवासियों के लिए एक अलग धर्म कोड होना चाहिए। मध्यप्रदेश में आदिवासी वोटर्स की ये राजनीति बहुत गहराई तक समाई है। जिसमें एक नई बहस शुरू की है नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार के एक बयान ने। सिंघार खुद आदिवासी समाज से आते हैं. और, अब लगता है कि आदिवासी वोटर्स को फिर से एकजुट कर कांग्रेस के खाते में लाने के लिए पार्टी ने सिंघार को तैनात कर दिया है। सिंघार का हालिया बयान इसी बात का सबूत है, जो बीजेपी के लिए भी नया सिरदर्द बन सकता है।



प्रदेश का आदिवासी मतदाता किंग मेकर!

आदिवासी समाज को हमेशा ही कांग्रेस का कोर वोटर माना जाता रहा है। प्रदेश का आदिवासी मतदाता खुद को किंग मेकर मानकर इतरा भी सकता हैं। क्योंकि हर चुनाव में सत्ता किसके हाथ में जाएगी इसका फैसला भी वही करता है। बीजेपी के लिए भी ये वोट बैंक एक तरह से सिरदर्द ही रहा है, जिसे अपने पाले में रखने के लिए पार्टी चुनाव के समय जी जान एक कर देती है। हालांकि बीजेपी को भी इस वोटबैंक की फिक्र काफी बाद में हुई है। लेकिन जब इनकी अहमियत समझ में आई तब बीजेपी ने इनके लिए जैसे पलक पावड़े ही बिछा दिए। खुद पीएम नरेंद्र मोदी ने इस तबके लिए सौगातों का पिटारा खोल दिया।



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आदिवासियों को साधने में पीछे नहीं बीजेपी

बात राष्ट्रीय स्तर से शुरू करते हैं। बीजेपी ने सबसे पहले आदिवासी समाज से आने वाली द्रौपदी मुर्मू को देश का सर्वोच्च संवैधानिक पद दिया यानी कि राष्ट्रपति बनाया। इसे आदिवासी समाज का प्रतीकात्मक सम्मान कह सकते हैं।


पीएम जनमन सेवा की बात करते हैं जो खास तौर से जनजातीय समूहों के कमजोर तबके के लिए ही है। इसके तहत आवास बिजली और पानी की सुविधा आदिवासियों तक पहुंचाने के लिए करोड़ों की योजनाएं चल रही हैं। आदिवासी समाज के बच्चों की शिक्षा पर भी अलग अलग मदों में सरकार करोड़ों रुपए खर्च करती है। जिसके तहते एकलव्य नाम के होस्टल और कई स्कॉलरशिप दी जाती है। जनजातीय मंत्रालय भी इस समाज के लिए बड़े बड़े काम करता है।



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2018 में आदिवासी वोटर्स ने दिखाया था दम

मध्यप्रदेश में भी आदिवासी वोटर्स का दम बीजेपी देख ही चुकी है। जो जरा सा इधर से उधर हुआ और 2018 में कांग्रेस की सरकार बन गई। उसके बाद से बीजेपी ने आदिवासियों को अपना बनाए रखने में एड़ी चोटी का जोर लगा दिया था। प्रदेश में आदिवासी श्रेष्ठ माने जाने वाले बिरसा मुंडा की जन्मतिथि को गौरव दिवस के रूप में बनाने की शुरुआत खुद पीएम मोदी ने मध्यप्रदेश से ही की थी। बिरसा मुंडा के अलावा रानी दुर्गावती टंट्या मामा जैसे दिग्गज आदिवासी नामों को भी याद किया गया। भोपाल में हबीबगंज स्टेशन का नाम बदलकर उसे कमलापति करना भी इसी राजनीति का हिस्सा रहा।



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आदिवासी समाज खुद को हिंदू नहीं मानता

आदिवासी क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को ज्यादा सशक्त बनाने के लिए पेसा एक्ट के एग्जीक्यूशन में भी बदलाव और तेजी लाई गई। इसके अलावा आदिवासी इलाकों के विकास में भी कोई कमी नहीं छोड़ गई। लेकिन असल पेंच फंसता है बीजेपी की बेसिक राजनीति में कुछ पुरानी भूलों में और कांग्रेस का उन्हें ही अपना सेंसिटिव प्वाइंट बनाने में। असल में आदिवासी समाज खुद को हिंदू नहीं मानता है। जबकि बीजेपी की मूल राजनीति हिंदू और हिंदुत्व के आसपास सिमटी हुई है। पहले धर्म और मजहब पर बात होती रही। फिर जाति का मसला उठा तो जातिगत जनगणना तक मामला गया। अब उमंग सिंघार ने आदिवासियों के लिए एक अलग मांग उठा दी है।



उमंग सिंघार ने हाल ही में एक कार्यक्रम में कहा कि आदिवासी समाज के एकजुट होने का वक्त आ गया है। इसके आगे जो उन्होंने कहा वो बात और बढ़ी तो बीजेपी की मुश्किलें भी बढ़ेंगी।



उमंग सिंघार ने की अलग धर्म कोड की मांग

उमंग सिंघार ने अमरकंटक की एक सभा में आदिवासियों के लिए एक अलग धर्म कोड होने की बात उठा दी है। यानी अब जहां भी धर्म का कॉलम होगा, वहां सिर्फ हिंदू मुस्लिम सिक्ख ईसाई से काम नहीं चलेगा। वहां आदिवासियों के लिए भी धर्म का जिक्र अलग होना चाहिए। इसका मतलब ये है कि जिस खाई को पाटने के लिए बीजेपी इतने सालों से अलग अलग घोषणा और योजनाओं का मुरम भर रही थी। उस खाई को गहरा करने के लिए कांग्रेस ने एक नया मुद्दा ढूंढ ही लिया और छेड़ भी दिया है। सिंघार ये मांग भी कर रहे हैं कि इस मांग से जुड़े ज्यादा से ज्यादा आवेदन भेजे जाएं ताकि राष्ट्रपति तक आवाज पहुंचे और उनके धर्म और संस्कृति को अलग पहचान मिल सके।



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47 सीटों पर आदिवासी वोटर दमदार

अब कांग्रेस वाकई इस मांग को आंदोलन में कितना तब्दील कर पाती है ये बाद की बात है। पर इतना जरूर है कि मध्यप्रदेश में इसका असर जल्दी दिख सकता है। क्योंकि यहां आज भी आदिवासी वोटबैंक बीजेपी का मजबूत आधार नहीं बना है। ये वो वोटबैंक है जो कभी भी बड़ी आसानी से शिफ्ट हो सकता है। ये मैं अपने पुराने वीडियोज में भी बहुत बार बता चुका हूं कि करीब 47 सीटों पर आदिवासी वोटर दमदार पकड़ रखते हैं। लोकसभा की बात करें तो प्रदेश की करीब 10 सीटों पर आदिवासी मतदाता बड़ा खेल करते हैं। 2018 में कांग्रेस ने 47 में 30 आदिवासी सीटों पर जीत दर्ज की थी। बीजेपी की कोशिशों के बाद साल 2023 में कांग्रेस के हाथ केवल 22 सीटें लगी और बीजेपी को 24 सीटें मिली। लेकिन ये अंतर कोई बहुत बड़ा नहीं है। इसलिए बीजेपी चैन से बैठने वाली नहीं है। कांग्रेस ने भी धर्म कोड के जरिए एक नया राग छेड़ ही दिया है।



आदिवासियों को वनवासी मानती है बीजेपी

आदिवासियों के मामले में बीजेपी के दामन पर एक पुराना दाग है। कांग्रेस की हर संभव कोशिश होती है कि उस दाग का निशान आदिवासी वोटर्स की यादों से न मिट सके। असल में बीजेपी पर कांग्रेस ये आरोप लगाती रही है कि वो आदिवासियों को आदिवासी नहीं मानती बल्कि वनवासी मानती है। अपनी भारत जोड़ो यात्रा के दौरान भी राहुल गांधी ने ये मुद्दा उठाया था कि बीजेपी आदिवासियों को वनवासी मानती है और वन तेजी से खत्म हो रहे हैं। यानी वन खत्म हो जाएंगे तो वनवासी भी नहीं बचेंगे। राहुल गांधी ने ये भी कहा कि बीजेपी आरएसएस कहती हैं कि आदिवासी देश में सबसे पहले से रहते थे। जबकि कांग्रेस उन्हें देश का मूल मालिक समझती है।



सिंघार की बात को हलके में नहीं ले रही बीजेपी

अब अगर हम ये कहें कि राहुल गांधी की इस बात का एक्सटेंशन है उमंग सिंघार का धर्म कोड वाला बयान। जिससे सियासी भूचाल आना चाहिए और आया ही है। बीजेपी के कुछ नेताओं ने तुरंत इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया दी है। मंत्री विश्वास सारंग ने इस बयान को आदिवासियों को गुमराह करने वाला बयान बताया। सीएम मोहन यादव ने भी धार में भिलाला सम्मेलन में कहा कि हम सब भारत माता के लाल हैं इसमें भेदभदाव का कोई सवाल नहीं है। उनके इस बयान को भी सिंघार के बयान के पलटवार से जोड़कर देखा जा रहा है।



ये इस बात का इशारा है कि सिंघार की बात को बीजेपी हलके में लेकर खामोश रहने वाली नहीं है। जाहिर तौर पर पार्टी ने कुछ तैयारी शुरू कर ही दी होगी। लेकिन इस मामले पर आदिवासी अगर लामबंद हुए तो इसका असर चुनावों पर पड़ना भी काफी हद तक तय माना जा सकता है।



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