News Strike: गौतम टेटवाल की जाति पर बवाल, पहले भी उठे कई सवाल, किस नियम में होती है कार्रवाई?

Harish Divekar | Mar 07, 2026, 07:00 IST
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Photograph: (thesootr)

बीजेपी विधायक गौतम टेटवाल पर फर्जी जाति प्रमाण पत्र से चुनाव लड़ने का आरोप लगा है। इस मामले में अदालत ने अब कार्रवाई करने के संकेत दिए हैं।

News In Short

  • गौतम टेटवाल पर फर्जी जाति प्रमाण पत्र का आरोप है।
  • मामले में अदालत ने मंत्री से स्पष्टीकरण मांगा है।
  • इस मुद्दे पर गहरी जांच और कार्रवाई के संकेत हैं।
  • पहले भी ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनमें कार्रवाई नहीं हुई।
  • चुनावी हलफनामे में गलत जानकारी देना गंभीर अपराध है।

News In Detail

News Strike | न्यूज स्ट्राइक:बीजेपी से सारंगपुर विधायक गौतम टेटवाल को क्या अपनी विधायकी से हाथ धोना पड़ सकता है। असल में विधायक महोदय फर्जी प्रमाण पत्र लगाकर चुनाव लड़ने के मामले में सुर्खियों में हैं। इस वजह से उनकी सत्ता पर सवाल खड़े हो रहे हैं। आरोप सही निकले तो विधायकी तो जाएगी ही राज्य मंत्री पद से भी हाथ धो बैठेंगे।

क्या वाकई ऐसे मामलों में गंभीरता से कार्रवाई होती है और सत्ता पक्ष और विपक्ष इसे बहुत संजीदगी से लेकर कार्रवाई करता है। एक पुराने केस के जरिए इस पूरे मामले को समझाता हूं और ये भी बात करते हैं कि फर्जी दस्तावेज लगाकर चुनाव लड़ने पर क्या कार्रवाई होती है।

गौतम टेटवाल का जाति प्रमाण पत्र विवाद

गौतम टेटवाल सांरगपुर से विधायक हैं। उनका जाति प्रमाण पत्र से जुड़ा मामला इंदौर हाईकोर्ट में चल रहा है। कोमल प्रसाद शाक्य नाम के शख्स ने टेटवाल पर आरोप लगाए हैं कि उन्होंने फर्जी जाति प्रमाण पत्र लगाकर चुनाव लड़ा। इसके लिए उन्होंने कुछ दस्तावेज भी पेश किए हैं।

शाक्य का दावा है कि टेटवाल की जाति स्कूल के दस्तावेजों में जीनगर लिखी गई है। शाक्य ने अपनी बात सही साबित करने के एक नहीं कई जरूरी डॉक्यूमेंट्स पेश किए हैं। जैसे टेटवाल के पिता की सर्विस बुक, फैमिली से जुड़े कुछ दस्तावेज और आरआटीआई लगाकर स्कॉलर रिजस्ट्रेशन भी हासिल किया है। इन सब में उनकी जाति जीनगर होना बताया है।

एक ही व्यक्ति के दो अलग जाति प्रमाण पत्र

स्कूल के प्रिसिंपल की ओर से एक और दस्तावेज पेश किया गया है जिसमें उनकी जाति मोची बताई गई है। इस नए ट्विस्ट के बाद मामला थोड़ा उलझ सा गया है। शाक्य ने जो डॉक्यूमेंट्स दिए हैं वो आरटीआई के जरिए निकाले गए। जो साल 2007 और 2013 की तारीखों के हैं। इसके जवाब में बचाव पक्ष ने यानी कि टेटवाल के पक्ष ने नया प्रमाण पत्र पेश किया है जो साल 2011 का है।

एक ही शख्स के दो अलग-अलग जातियों वाले प्रमाण पत्र होना अपने आप में कानूनी तौर पर गलत है, लेकिन उससे पहले अदालत को ये जानना होगा कि वाकई टेटवाल ने ही दो प्रमाण पत्र बनवाए या एक पक्ष का सर्टिफिकेट फर्जी है। शाक्य का तो यही दावा है कि बचाव पक्ष वाला दस्तावेज गलत है। मामला सेंसिटिव है इसलिए अदालत ने भी गहन जांच के संकेत दिए हैं। इस मामले में आगे क्या होगा ये अदालता का फैसला ही तय करेगा।

दस्तावेज अगर सही पाए जाते हैं तो कोई बात नहीं और अगर गलत होते हैं तो भी कोई खास उम्मीद मत रखिए। क्योंकि ऐसे मामलों में कोई ठोस कार्रवाई बमुश्किल ही हो पाती है। इससे पहले ऐसा ही एक मामला बैतूल सांसद के साथ हुआ था। ये सांसद थी ज्योति धुर्वे। पहले ये बता दें कि ज्योति धुर्वे अब सांसद नहीं है, लेकिन जब सांसद थीं तब उनकी जाति पर भी जमकर बवाल हुआ था।

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ज्योति धुर्वे का जाति प्रमाण पत्र फर्जी साबित

टेटवाल का जाति प्रमाण पत्र फर्जी है या नहीं इस पर तो अब तक विवाद है, लेकिन ज्योति धुर्वे का प्रमाण पत्र तो फर्जी साबित हो चुका था। बैतूल की तत्कालीन सांसद का जाति प्रमाण पत्र तो फर्जी निकल चुका था।

जाति प्रमाण पत्र के लिए बनाई गई एक राज्य स्तरीय समिति ने उनके सर्टिफिकेट को खारिज कर दिया था और, उनके खिलाफ कार्रवाई की भी सिफारिश कर दी थी। इस पर भी ठसक देखिए कि धुर्वे को बार-बार समिति के सामने पेश होने के लिए कहा गया। वो कई बार इसे टालती रहीं।

आखिर 2017 उन्हें हाजिर होना पड़ा। तब वो गोंड समुदाय से खुद के होने का कोई सबूत पेश नहीं कर सकीं। समिति ने अपनी रिपोर्ट में साफ कहा कि उनके सारे डॉक्यूमेंट्स में पिता की जगह पति प्रेम सिंह धुर्वे का नाम लिखा है।

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फर्जी प्रमाण पत्र फिर भी सांसद

गजब तो ये है कि ज्योति धुर्वे के डॉक्यूमेंट फर्जी होने के बाद भी वो सांसद रहीं। उन्हें पार्टी ने फिर से टिकट दिया और वो फिर अपना कार्यकाल पूरा करने में कामयाब रहीं। बैतूल की सीट एसटी वर्ग के लिए रिजर्व है। साल 2009 में धुर्वे यहां से पहली बार लोकसभा चुनाव जीतीं। उनके पहले कार्यकाल में ही जाति प्रमाण पत्र का मामला उछल चुका था। उनके खिलाफ शिकायत दर्ज करवाई गई थी।

पहले कार्यकाल के पांच साल में शिकायत पर सुनवाई पूरी नहीं हो सकी। धुर्वे का कार्यकाल पूरा हुआ और अगले चुनाव के लिए टिकट भी मिल गया। धुर्वे फिर जीतीं और सदन में पहुंच गईं।

साल 2014 में फिर उनके खिलाफ शिकायत हुई। मजबूरी में ही शायद उनके खिलाफ कमेटी बनानी पड़ी जिसमें उनके कास्ट सर्टिफिकेट को फर्जी बता दिया गया, लेकिन क्या धुर्वे को पद छोड़ना पड़ा नहीं। हुआ तो बस इतना ही कि धुर्वे को साल 2019 के चुनाव में टिकट नहीं मिला।

फर्जी जाति प्रमाण पत्र से चुनावी मुद्दे

तो टेटवाल के जाति प्रमाण पत्र भी चर्चा करते-करते चुनाव वापस सिर पर आ जाएं तो कोई ताज्जुब नहीं होगा। वैसे भी ऐसा सिर्फ मध्यप्रदेश में हो तो नहीं हो रहा है। ऐसे बहुत सारे मामले हैं जहां फर्जी जातिप्रमाण पत्र के सहारे जन प्रतिनिधि सदन तक पहुंचे और कार्यकाल पूरा किया।

कुछ में नेताओं को सीट गंवानी पड़ी तो कईयों का कार्यकाल पूरा भी हुआ। ऐसा नहीं है कि फर्जी जातिप्रमाण पत्र से चुनाव लड़कर टिके रहना बहुत आसान है। ऐसा करने पर सख्त नियमों का सामना करना पड़ता है।

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चुनावी हलफनामे में जानकारी देना जरूरी

अपने चुनावी हलफनामे में उम्मीदवार को सारी जानकारी देने जरूरी है जिसमें उनका फैमिली बैकग्राउंड शामिल है। उनकी एजुकेशन, क्रिमिनल रिकॉर्ड और प्रॉपर्टी से जुड़ी सारी इनफर्मेशन इस हलफनामे में शामिल होती है। ताकि आम मतदाता भी ये जान सके कि वो जिस प्रत्याशी को चुन रहे हैं उसकी डिटेल क्या क्या हैं।

विधानसभा का चुनाव हो या लोकसभा का चुनाव हो, हर प्रत्याशी को इलेक्शन कमीशन में ये हलफनामा दाखिल करना पड़ता है। इसका कोई कॉलम खाली छोड़ना अलाऊ नहीं होता है। इस फॉर्म को ही एफिडेविट, हलफनामा या फिर फॉर्म 26 भी कहा जाता है।

गलत जानकारी का खुलासा होने पर कार्रवाई

आप जिस तरह अपनी बिटिया की शादी से पहले लड़के के घर की एक-एक बात का पता लगाते हैं हर जरूरी डिटेल खंगालते हैं। उसी तरह इस हलफनामे को देखकर आप प्रत्याशी की पूरी कुंडली जान सकते हैं, लेकिन बहुत से जनप्रतिनिधि इस जरूरी दस्तावेज में भी गलत जानकारी देने से बाज नहीं आते।

ऐसे जनप्रतिनिधियों की गलती का खुलासा होते ही उन पर सख्त कार्रवाई हो सकती है। आरोप साबित होने पर उन्हें द रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल्स एक्ट 1951 की धारा 125ए के तहत छह महीने की सजा हो सकती है। भारीभरकम जुर्माना भी हो सकता है। इसी एक्ट का सेक्शन 8 ए ये भी कहता है कि कोई उम्मीदवार अगर रिश्वत लेने या धमकी देने जैसी गलत प्रैक्टिस करता है तो उसे चुनाव लड़ने से भी रोका जा सकता है।

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गलत जानकारी पर सख्त कार्रवाई की सिफारिश

इस एक्ट पर खासतौर से इसके कुछ शब्दों पर बहस होती रही है। कुछ नेता ये मांग उठा चुके हैं कि गलत जानकारी देने वाले प्रत्याशियों के चुनाव लड़ने पर भी रोक लगनी चाहिए। इतना ही नहीं गलत जानकारी देने वालों की सजा भी बढ़ाई जानी चाहिए। इसे लेकर एक संसदीय कमेटी भी बनी थी। जिसके अध्यक्ष थे बीजेपी सांसद सुशील मोदी।

इस कमेटी ने सिफारिश की थी चुनावी हलफनामे में गलत जानकारी देने वालों की सजा को बढ़ा दिया जाना चाहिए। इस सजा को छह महीने से बढ़ाकर दो साल तक करने की सिफारिश भी हो चुकी है। कमेटी ने इस मामले को 8 (1) में रखने की भी अनुशंसा की। इस सेक्शन के तहत उम्मीदवार चुनाव लड़ने से ही अयोग्य हो जाएगा, लेकिन इस रिकमंडेशन पर कोई फैसला अब तक नहीं हुआ है।

आपको ये भी बता दें कि अगर एक आम मतदाता होते हुए आप को भी लगता है कि चुनाव लड़ रहे प्रत्याशी ने या जनप्रतिनिधि ने कोई गलत जानकारी दी है तो आप भी शिकायत दर्ज करवा सकते हैं। हालांकि, कार्रवाई कब तक होगी, सजा कब मिलेगी। इस बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता। फिलहाल तो टेटवाल के मामले में भी ये देखना दिलचस्प होगा कि दो-दो प्रमाण पत्र सामने आने के बाद अगली सुनवाई में क्या होता है।



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