News Strike : मप्र में राष्ट्रगीत गाना अनिवार्य, अल्पसंख्यक नेताओं ने जताया विरोध, क्या बीजेपी का है फायदा?

मध्यप्रदेश में वंदे मातरम गाने पर विवाद बढ़ा। मुस्लिम नेताओं का विरोध, क्या यह बीजेपी को फायदा पहुंचा रहा है? कांग्रेस और आप नेताओं के बयान पर बहस जारी।

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Harish Divekar
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Photograph: (thesootr)

News In Short

  • मध्यप्रदेश में वंदे मातरम गाना अनिवार्य हुआ।
  • मुस्लिम नेताओं ने वंदे मातरम के छंदों पर विरोध जताया।
  • कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने धार्मिक आजादी का हवाला दिया।
  • बीजेपी की मदद करने का आरोप, कांग्रेस और आप नेताओं पर।
  • वंदे मातरम को लेकर विवाद, राजनीति में अहम मोड़।

News In Detail

वंदे मातरम को लेकर अब एमपी में भी विवाद शुरू हो गया है। इस विवाद के बीच आप नेता का एक बयान ऐसा भी है। जो पूरी कॉन्ट्रोवर्सी को देखने के लिए एक नया चश्मा दे रहा है। ये तारक मेहता का उल्टा चश्मा तो नहीं है, लेकिन एक नए किस्म का विजन जरूर दे रहा है। उस बयान को सुनने के बाद शायद आप भी यही पूछेंगे कि क्या आरिफ मसूद जैसा कांग्रेसी नेता बीजेपी का बैक डोर समर्थक तो नहीं है।

वंदे मातरम गाने पर विवाद: मुस्लिम पक्ष का विरोध

न्यूज स्ट्राइक | राष्ट्रगीत वंदे मातरम: मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने हाल ही में एक घोषणा की है। इसके बाद प्रदेश के जितने भी एजुकेशनल इंस्टिट्यूट हैं वहां पर वंदे मातरम गाना अनिवार्य होगा। ये घोषणा मदरसों पर भी लागू होगी। वैसे तो वंदे मातरम हमारे देश का राष्ट्रीय गीत है। इसे गाने में किसी को कोई एतराज नहीं होना चाहिए।

असल विवाद है वंदे मातरम को पूरा गाने में। मुस्लिम पक्ष हमेशा ये मानता रहा है कि वंदेमातरम के कुछ छंद देवी आराधना से जुड़े हैं। जिनका विरोध आज से नहीं साल 1896 से ही शुरू हो गया था, तब गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने पहली बार इस गीत को पूरा गाया था। उस दौर में कुछ पंक्तियों को सुनकर ही मुस्लिम नेताओं ने तर्क दिया था कि वो लाइनें मूर्ति पूजा का हिस्सा हैं।

वंदे मातरम पर मुस्लिम विरोध और राष्ट्रगीत की स्वीकृति

इस गीत पर जब मुस्लिमों का विरोध लगातार बढ़ता चला गया। तब कांग्रेस ने 1937 में एक कमेटी बनाई। जिसमें गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, मौलाना अबुल कलाम आजाद और पंडित जवाहर लाल नेहरू भी शामिल थे।

इस कमेटी ने ये फैसला किया गया कि शुरू के दो अंतरे ही राष्ट्रगीत के रूप में गाए जाएंगे। ये दो अंतरे मातृभूमि की तारीफ में लिखे गए हैं। हालांकि, इतना ही काफी नहीं था। उस दौर में मोहम्मद अली जिन्ना ने कहा कि इसे राष्ट्रगीत के रूप में नहीं माना जाना चाहिए। 

17 मार्च 1938 को उन्होंने इस गीत पर तगड़ा विरोध जताया, लेकिन जिन्ना की कोई कोशिश काम नहीं आई। 1950 में वंदे मातरम देश के राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किया गया और 24 जनवरी 1950 को डा. राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा में वंदेमातरम को राष्ट्रगीत के रूप में अपनाने का वक्तव्य पढ़ा। उसके बाद से सब कुछ वैसा ही चल रहा था, लेकिन इस साल वंदेमातरम के सारे छंद गाना अनिवार्य कर दिया गया है। 

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वंदे मातरम पर आरिफ मसूद का विरोध

केंद्र की इस पहल पर प्रदेश सरकार ने घोषणा कर मुहर लगा दी है। जिस पर कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने कहा है कि भारत प्रजातांत्रिक देश है। जहां हर नागरिक को आर्टिकल 25 के तहत धार्मिक आजादी मिली हुई है। उन्होंने ये भी कहा कि वंदे मातरम के सम्मान को लेकर कोई विवाद नहीं है।

बस चंद लाइनों से एतराज है जो अपना मजहब मानने की आजादी पर अंकुश लगाने के समान है। इसके बाद उन्होंने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का हवाला भी दिया और कहा कि जब तक बोर्ड अपनी राय नहीं बना लेता वो किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकते हैं।

उज्जैन के इमाम मुफ्ती सैय्यद नासिर अली नदवी ने भी इस आदेश को इस्लाम का विरोधी बताया है। आरिफ मसूद की तर्ज पर उन्होंने भी इस गीत को इस्लाम विरोधी बताया है। उन्होंने यहां तक कहा कि जिन स्कूलों में वंदेमातरम अनिवार्य रूप से गाया जाए। उन स्कूलों से अपने बच्चों को निकाल लें। उन्होंने सरकार से गुजारिश भी की कि वो अपना फैसला वापस लें।

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वंदे मातरम पर मंत्रियों के विवादित बयान

इस मामले पर स्कूल शिक्षा मंत्री राव उदय प्रताप सिंह का भी बयान आया है। उन्होंने कहा कि जो भी राष्ट्र का नागिरक है। उसे देश में बने कानून मानने ही होंगे। फिर वो चाहें मदरसे में हो या स्कूल में हों। उन्होंने ये भी कहा कि युवा पीढ़ी को राष्ट्रवाद से जोड़ने के लिए ये फैसला काफी पहले हो जाना चाहिए था।

मध्यप्रदेश के मंत्री विश्वास सारंग तो इस मामले में और भी आगे निकल गए। उन्होंने ये तक कह डाला कि जिन्हें वंदेमातरम गाने से एतराज है वो पाकिस्तान जा सकते हैं। 

विवादित बयान: बाबरी मस्जिद पर आम आदमी पार्टी

इस विवाद का इतिहास बेहद पुराना है। ये हम आपको बता ही चुके हैं। जो विवाद उन्नीसवीं सदी से चल रहा है वो किस अंजाम तक पहुंचेगा या कब थमेगा वो कहना मुश्किल है। पर, यहां हम आपका ध्यान आम आदमी पार्टी के एक नेता के बयान की तरफ खींचना चाहेंगे।

उसका थोड़ा सा संदर्भ बता देते हैं। ये खबरें आपने भी सुनी होंगी कि पश्चिम बंगाल में हुमायू कबीर नाम के नेता ने बाबरी मस्जिद बनाने का ऐलान किया है। ये मसला इन दिनों खूब सुर्खियां बटोर रहा है। उस हुमायू कबीर पर आप नेता संजय सिंह ने कैसी चुटकी ली है। वो भी सुनिए।

संजय सिंह ने अपने बयान से ये साफ कर दिया है कि जो लोग इस तरह के मजहबी मुद्दों को हवा दे रहे हैं। वो बीजेपी की ही टीम का हिस्सा हैं। ऐसे मुद्दों के पीछे विकास, बेरोजगारी और महंगाई जैसे अहम मुद्दे दब जाते हैं। आम लोगों को उस तरफ ध्यान ही नहीं जाता है। 

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वंदे मातरम विवाद: कांग्रेस नेताओं की रणनीति पर सवाल

क्या मध्यप्रदेश में भी यही हो रहा है। अब वंदे मातरम में उलझ कर कांग्रेस नेता या मजहबी नेता भी कहीं दूसरे और जरूरी मुद्दों को पीछे नहीं छोड़ रहे। आप नेता का ये भी दावा है कि ऐसे नेता सिर्फ बीजेपी की मदद ही कर रहे हैं। यानी इनडायरेक्टली वो बीजेपी के लिए ही काम कर रहे हैं।

क्या आरिफ मसूद भी ये महसूस करते हैं कि उनकी बयानबाजी से बीजेपी को ही फायदा होगा। या इमाम साहब के जेहन में ये बात आई होगी कि स्कूल से बच्चों को निकाल लेने की उनकी दरख्वास्त मजहबी बंटवारे की लकीर को और कितना गहरा कर सकती है। या बीजेपी के ऐलान के बहाने ऐसे नेताओं को भी अपनी नेतागिरी चमकाने का एक जरिया मिल गया है। 


सवाल बहुत सारे हैं। सोचना ये जरूरी है कि क्या हर मुद्दे पर बंटकर हम कैसा समाज गढ़ पाएंगे। फिलहाल ये साफ है कि वंदे मातरम गाना अनिवार्य है, लेकिन नहीं गाया तो सजा का कोई प्रावधान नहीं है। फिर ऐसे ऐलान पर विवादों को हवा देना क्या महज राजनीति को चमकाना ही नहीं है। 

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