News Strike: सत्ता से दूरी की छटपटाहट या आलाकमान को इशारा, दिग्विजय सिंह की पोस्ट के क्या हैं मायने?
Harish Divekar | Mar 10, 2026, 07:00 IST
Photograph: (thesootr)
दिग्विजय सिंह की पोस्ट ने राजनीति से रिटायरमेंट का सवाल उठाया है। क्या वो राजनीति से दूर हो रहे हैं या सिर्फ संदेश दे रहे हैं? जानें इस दिलचस्प मुद्दे पर।
News In Short
- दिग्विजय सिंह की पोस्ट ने राजनीति से रिटायरमेंट के संकेत दिए हैं।
- दिग्विजय सिंह की राजनीति में तजुर्बे का अहम योगदान है।
- दिग्विजय सिंह ने विरोधियों को साधने की कला को साबित किया।
- उनका रिटायरमेंट पोस्ट आलाकमान को इशारा कर सकता है।
- राजनीति से रिटायरमेंट की पोस्ट ने कांग्रेस में हलचल मचाई।
News In Detail
जिस शख्स की किस्मत सिर्फ एक फोन कॉल ने बदल दी क्या वही शख्स सिर्फ एक पोस्ट के जरिए फिर से अपनी राजनीति बदलने का इशारा कर रहा है। क्या वो ये जता रहा है कि अब उसे घर बैठने पर या संन्यास लेने पर मजबूर किया जा रहा है। या वो खुद अपने लिए सियासी तकदीर में लिखा ये फैसला स्वीकार करने को तैयार हो गया है। वजह जो भी है ये तय है कि उसके साथ-साथ मध्यप्रदेश ही नहीं देश की राजनीति का पूरा एक अध्याय चार दिवारी की जिल्द में बंद होकर रह जाएगा।
अनुभव से भरपूर है दिग्विजय सिंह की राजनीति
मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह भी कुछ ऐसे ही हैं। जिन्हें भले ही मिस्टर बंटाधार का टैग मिला है, लेकिन सच्चाई यही है कि राजनीति में और खासतौर से कांग्रेस की राजनीति में फिलहाल उनके जितने अनुभवी नेता, मध्यप्रेदश की नब्ज समझने वाले नेता अब कम ही बचे हैं।
क्या इस तजुर्बे की कद्र करने की जगह कांग्रेस उन्हें साइडलाइन कर रही है। क्या दिग्विजय सिंह को संन्यास लेने पर मजबूर किया जा रहा है या हालात कुछ ऐसे हैं कि वो खुद संन्यास लेने पर मजबूर हो रहे हैं। ये भी हो सकता है कि पार्टी से कोई तवज्जो नहीं मिलने पर वो आला नेताओं को ये इशारा कर रहे हैं कि वो राजनीति से दूर होने वाले हैं। दिग्विजय सिंह का ताजा पोस्ट कुछ ऐसे ही सवाल खड़े कर रहा है।
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दिग्विजय का रिटायरमेंट प्लान: राजनीति से अलविदा?
देखते-देखते दिग्विजय सिंह का ये पोस्ट वायरल हुआ और सवाल उठने लगे कि क्या दिग्विजय सिंह राजनीति से रिटायर होने वाले हैं। वैसे भी उनकी उम्र 79 साल की हो चुकी है। राजनीति में अहम पद पर रहने की उम्र सीमा को 75 साल के करीब तय कर दिया गया है।
हालांकि, ये कोई हार्ड कोर लाइन नहीं है जिसे मानना जरूरी हो। फिर भी दिग्विजय सिंह की उम्र इससे चार साल ज्यादा ही हो चुकी है। राज्यसभा न जाने का फैसला भी वो खुद ही कर चुके हैं। कम से कम पर्दे के आगे तो यही बताया जा रहा है। खुद दिग्विजय सिंह भी यही दावा करते हैं कि राज्यसभा न जाने का फैसला उनका अपना है। तो अब दिग्विजय सिंह को कांग्रेस क्या जिम्मेदारी देगी।
वो केंद्रीय संगठन में किसी पद पर नहीं है. राज्यसभा नहीं जाने पर वो केंद्र के राजनीतिक पद पर भी नहीं रहेंगे. वो प्रदेश में रह कर कांग्रेस के संगठन को मजबूत करने की ख्वाहिश जता चुके हैं. लेकिन प्रदेश के दूसरे नेता और कांग्रेस की मौजूदा लीडरशिप उनकी दखलंदाजी को बहुत ज्यादा पसंद नहीं कर रही है।
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आखिर क्या होगी दिग्विजय सिंह की नई शुरुआत?
दिग्विजय सिंह की इस पोस्ट का क्या मकसद
कोई और नेता ये पोस्ट करता तो शायद ये माना जा सकता था कि पोस्ट बस यूं ही किया गया है। पर, दिग्विजय सिंह जो करते हैं वो बस यूं ही नहीं होता। उनकी हर बात का, हर बयान का और हर पोस्ट का कुछ न कुछ मकसद जरूर होता है।
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दिग्विजय की छटपटाहट: राजनीति से दूरी या बदलाव?
पिछले दिनों उन्होंने आरएसएस की तारीफ में पोस्ट की थी। उसके बाद से राहुल गांधी भी उनसे नाराज बताए जा रहे हैं। तब क्या ये मान लें कि दिग्विजय सिंह के दिन कुछ ठीक नहीं चल रहे हैं। जिस वजह से वो रिटायरमेंट प्लान जैसी पोस्ट करके आलाकमान का ध्यान अपनी तरफ खींचना चाहते हैं।
ऐसा हो भी सकता है जो शख्स मध्यप्रदेश कांग्रेस में सबसे ज्यादा लोकप्रिय रहा। जिसके बंगले पर सबसे ज्यादा कार्यकर्ताओं की भीड़ जमा होती रही और जो प्रदेश की राजनीति और चप्पे-चप्पे की तासीर से वाकिफ है। उसे कोई मौका नहीं मिलेगा तो छटपटाहट होना भी लाजमी है। शायद वही छटपटाहट ऐसी पोस्ट का कारण बन रही है।
सीएम बनने की दिग्विजय की चौंकाने वाली कहानी
दिग्विजय सिंह का नाम इस रेस में दूर-दूर तक नहीं था। उन्होंने विधानसभा चुनाव भी नहीं लड़ा था। ये बात है साल 1993 की। जब बाबरी विध्वंस के बाद मध्यप्रदेश में पहली बार चुनाव हुए थे और कांग्रेस को बहुमत मिल गया था।
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समीकरण बदले और दिग्विजय सिंह बन गए सीएम
कमलनाथ और सुरेश पचौरी गुट भी मान चुका था कि उनके साथ ज्यादा लोग नहीं है। तब अचानक समीकण बदले। कमलनाथ और दिग्विजय सिंह में चर्चा हुई। हालांकि, किसी नाम पर सहमति न बनते देख बतौर पर्यवेक्षक प्रणब मुखर्जी ने गुप्त मतदान का फैसला लिया और जो नतीजे आए उसके बारे में किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।
174 विधायकों में से केवल 56 ने श्यामाचरण शुक्ल को वोट दिया, जबकि उनका नाम सबसे आगे था। दिग्विजय सिंह जिनका रेस में होना तो छोड़िए वो तो रेस के मैदान में भी दूर-दूर तक नहीं थे। उन्हें मिले 100 विधायकों के वोट।
ये बात तत्कालीन पीएम पीवी नरसिम्हा राव को पता चली। उन्होंने फोन पर कहा कि जिसे ज्यादा वोट मिले हैं उसे ही सीएम बना दीजिए। ये फोन आना भले ही किस्मत की बात थी, लेकिन विधायकों की लॉबिंग तो दिग्विजय सिंह की मेहनत का ही फल था। जिसके दम पर वो दो कार्यकाल तक प्रदेश के मुखिया रहे।
दिग्विजय सिंह की विरोधियों को साधने की कला
पर दिग्विजय सिंह ने तब वो कर दिखाया था। जब वो सीएम बने तब अपनी ही पार्टी में उनके दो धुर विरोधी नेता थे। एक सुभाष यादव और दूसरी जमुना देवी। इन दोनों को दिग्विजय सिंह ने उपमुख्यमंत्री बनाकर साधा। उनके कार्यकाल के दौरान जितने नेता प्रतिपक्ष रहे। उनके लिए भी दिग्विजय सिंह सबसे पहले खड़े नजर आए।
दिग्विजय सिंह की राजनीति: रिटायरमेंट या कोई संदेश?
ये दिग्गी की राजनीति है साहब जिसमें कुछ न कुछ तो राज छिपा है। वो राज यानी कि मैसेज या तो आलाकमान समझ चुके हैं या फिर दिग्विजय सिंह ने रिटायरमेंट की भूमिका बांधनी शुरू कर दी है। क्या आप भी इस बात से सहमत हैं। कमेंट करके हमें जरूर बताइए।
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