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Photograph: (thesootr)
News In Short
- दिग्विजय सिंह की पोस्ट ने राजनीति से रिटायरमेंट के संकेत दिए हैं।
- दिग्विजय सिंह की राजनीति में तजुर्बे का अहम योगदान है।
- दिग्विजय सिंह ने विरोधियों को साधने की कला को साबित किया।
- उनका रिटायरमेंट पोस्ट आलाकमान को इशारा कर सकता है।
- राजनीति से रिटायरमेंट की पोस्ट ने कांग्रेस में हलचल मचाई।
News In Detail
NEWS STRIKE | न्यूज स्ट्राइक: दिसंबर 1993, वो महीना जब मध्यप्रदेश की राजनीति की दूसरी पंक्ति में बैठने वाला एक नेता अचानक प्रदेश का मुखिया बन जाता है। एक फोन घनघनाता है और प्रदेश के सारे आला नेता किनारे कर दिए जाते हैं और नए चेहरे को तख्त पर बिठा दिया जाता है।
जिस शख्स की किस्मत सिर्फ एक फोन कॉल ने बदल दी क्या वही शख्स सिर्फ एक पोस्ट के जरिए फिर से अपनी राजनीति बदलने का इशारा कर रहा है। क्या वो ये जता रहा है कि अब उसे घर बैठने पर या संन्यास लेने पर मजबूर किया जा रहा है। या वो खुद अपने लिए सियासी तकदीर में लिखा ये फैसला स्वीकार करने को तैयार हो गया है। वजह जो भी है ये तय है कि उसके साथ-साथ मध्यप्रदेश ही नहीं देश की राजनीति का पूरा एक अध्याय चार दिवारी की जिल्द में बंद होकर रह जाएगा।
अनुभव से भरपूर है दिग्विजय सिंह की राजनीति
राजनीति में भले ही किसी बड़े पद पर रहने की उम्र मोटे तौर पर तय कर दी हो। पर सच्चाई ये है कि एक राजनेता कभी पुराना, रिटायर ये बेकार नहीं होता। बल्कि, उम्र के साथ-साथ उसका तजुर्बा बढ़ता है और वो नए राजनेताओं को सही डायरेक्शन देने में मददगार बन जाता है।
मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह भी कुछ ऐसे ही हैं। जिन्हें भले ही मिस्टर बंटाधार का टैग मिला है, लेकिन सच्चाई यही है कि राजनीति में और खासतौर से कांग्रेस की राजनीति में फिलहाल उनके जितने अनुभवी नेता, मध्यप्रेदश की नब्ज समझने वाले नेता अब कम ही बचे हैं।
क्या इस तजुर्बे की कद्र करने की जगह कांग्रेस उन्हें साइडलाइन कर रही है। क्या दिग्विजय सिंह को संन्यास लेने पर मजबूर किया जा रहा है या हालात कुछ ऐसे हैं कि वो खुद संन्यास लेने पर मजबूर हो रहे हैं। ये भी हो सकता है कि पार्टी से कोई तवज्जो नहीं मिलने पर वो आला नेताओं को ये इशारा कर रहे हैं कि वो राजनीति से दूर होने वाले हैं। दिग्विजय सिंह का ताजा पोस्ट कुछ ऐसे ही सवाल खड़े कर रहा है।
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दिग्विजय का रिटायरमेंट प्लान: राजनीति से अलविदा?
दिग्विजय सिंह ने हाल ही में एक वीडियो शेयर किया। इस वीडियो में ओडिसा के एक रिटायर्ड बैंक मैनेजर नजर आते हैं। जो अपनी पत्नी के साथ देशभर की यात्रा पर निकले हैं। ये शायद उनका रिटायरमेंट प्लान है जिसे शेयर करते हुए दिग्विजय सिंह ने लिखा कि मेरा रिटायरमेंट प्लान? इसके आगे लिखा शायद, क्यों नहीं।
देखते-देखते दिग्विजय सिंह का ये पोस्ट वायरल हुआ और सवाल उठने लगे कि क्या दिग्विजय सिंह राजनीति से रिटायर होने वाले हैं। वैसे भी उनकी उम्र 79 साल की हो चुकी है। राजनीति में अहम पद पर रहने की उम्र सीमा को 75 साल के करीब तय कर दिया गया है।
हालांकि, ये कोई हार्ड कोर लाइन नहीं है जिसे मानना जरूरी हो। फिर भी दिग्विजय सिंह की उम्र इससे चार साल ज्यादा ही हो चुकी है। राज्यसभा न जाने का फैसला भी वो खुद ही कर चुके हैं। कम से कम पर्दे के आगे तो यही बताया जा रहा है। खुद दिग्विजय सिंह भी यही दावा करते हैं कि राज्यसभा न जाने का फैसला उनका अपना है। तो अब दिग्विजय सिंह को कांग्रेस क्या जिम्मेदारी देगी।
वो केंद्रीय संगठन में किसी पद पर नहीं है. राज्यसभा नहीं जाने पर वो केंद्र के राजनीतिक पद पर भी नहीं रहेंगे. वो प्रदेश में रह कर कांग्रेस के संगठन को मजबूत करने की ख्वाहिश जता चुके हैं. लेकिन प्रदेश के दूसरे नेता और कांग्रेस की मौजूदा लीडरशिप उनकी दखलंदाजी को बहुत ज्यादा पसंद नहीं कर रही है।
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आखिर क्या होगी दिग्विजय सिंह की नई शुरुआत?
काम हो या न हो, कोई बड़ी जिम्मेदारी हो या न हो, लेकिन खबरों में कैसे बने रहना है ये हर राजनेता को दिग्विजय सिंह से सीख लेना चाहिए। कभी किसी हल्के फुल्के वीडियो के जरिए तो कभी किसी गंभीर मुद्दे को उठाकर वो खबरों में रहना खूब जानते हैं। हालांकि, इस बार का उनकी पोस्ट इस तरफ भी इशारा कर रही है कि राजनीति में पगे इस नेता को शायद ये समझ आ गया है कि अब घर बैठने का वक्त आ गया है। दिग्विजय सिंह राज्यसभा की सीट खुद ही छोड़ने का ऐलान कर चुके हैं। ऐसे में दिग्विजय सिंह की जरूरत अब कांग्रेस में कहां रह गई है।
दिग्विजय सिंह की इस पोस्ट का क्या मकसद
दिग्विजय सिंह खुद इस पोस्ट पर सफाई दे चुके हैं कि वो रिटायर नहीं होने वाले। बस उन्हें रिटायरमेंट का ये प्लान काफी दिलचस्प लगा, इसलिए उन्होंने पोस्ट किया। उन्होंने ये भी कहा कि वो अपनी आखिरी सांस तक कांग्रेस के सिपाही रहेंगे। उन्हें क्या काम देना है ये पार्टी और उसकी लीडरशिप तय करेगी, लेकिन ये सफाई देते-देते बहुत देर हो चुकी है।
कोई और नेता ये पोस्ट करता तो शायद ये माना जा सकता था कि पोस्ट बस यूं ही किया गया है। पर, दिग्विजय सिंह जो करते हैं वो बस यूं ही नहीं होता। उनकी हर बात का, हर बयान का और हर पोस्ट का कुछ न कुछ मकसद जरूर होता है।
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दिग्विजय की छटपटाहट: राजनीति से दूरी या बदलाव?
इससे पहले तक वो अपने बयानों की वजह से कांग्रेस के संकट मोचक बन ही चुके थे। इसके बदले पार्टी ने उन्हें राज्यसभा का मौका दिया था। अब राज्यसभा उनके हाथ से निकल चुकी है और कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं मिल रही है।
पिछले दिनों उन्होंने आरएसएस की तारीफ में पोस्ट की थी। उसके बाद से राहुल गांधी भी उनसे नाराज बताए जा रहे हैं। तब क्या ये मान लें कि दिग्विजय सिंह के दिन कुछ ठीक नहीं चल रहे हैं। जिस वजह से वो रिटायरमेंट प्लान जैसी पोस्ट करके आलाकमान का ध्यान अपनी तरफ खींचना चाहते हैं।
ऐसा हो भी सकता है जो शख्स मध्यप्रदेश कांग्रेस में सबसे ज्यादा लोकप्रिय रहा। जिसके बंगले पर सबसे ज्यादा कार्यकर्ताओं की भीड़ जमा होती रही और जो प्रदेश की राजनीति और चप्पे-चप्पे की तासीर से वाकिफ है। उसे कोई मौका नहीं मिलेगा तो छटपटाहट होना भी लाजमी है। शायद वही छटपटाहट ऐसी पोस्ट का कारण बन रही है।
सीएम बनने की दिग्विजय की चौंकाने वाली कहानी
दिग्विजय सिंह किस किस्म के राजनेता हैं या किस किस्म के दांवपेंच जानते हैं ये उनकी सीएम बनने की कहानी से समझा जा सकता है। हमने आपको शुरुआत में ही बताया था कि सिर्फ एक फोन कॉल ने दिग्विजय सिंह को सीएम बना दिया था। जिस समय ये फोन कॉल आया, उस समय कमलनाथ, अर्जुन सिंह, माधव राव सिंधिया और श्यामाचरण शुक्ल जैसे नेताओं के नाम सीएम पद की रेस में थे।
दिग्विजय सिंह का नाम इस रेस में दूर-दूर तक नहीं था। उन्होंने विधानसभा चुनाव भी नहीं लड़ा था। ये बात है साल 1993 की। जब बाबरी विध्वंस के बाद मध्यप्रदेश में पहली बार चुनाव हुए थे और कांग्रेस को बहुमत मिल गया था।
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समीकरण बदले और दिग्विजय सिंह बन गए सीएम
खुद सीएम बनने या अपने समर्थक को सीएम बनाने में बड़े नेता लॉबिंग में जुटे हुए थे। माधव राव सिंधिया को करीब 15 विधायकों का समर्थन मिल चुका था। अर्जुन सिंह चाहते थे कि वो या सुभाष यादव सीएम बने, लेकिन उनके साथ ज्यादा विधायक जाने को तैयार नहीं थे।
कमलनाथ और सुरेश पचौरी गुट भी मान चुका था कि उनके साथ ज्यादा लोग नहीं है। तब अचानक समीकण बदले। कमलनाथ और दिग्विजय सिंह में चर्चा हुई। हालांकि, किसी नाम पर सहमति न बनते देख बतौर पर्यवेक्षक प्रणब मुखर्जी ने गुप्त मतदान का फैसला लिया और जो नतीजे आए उसके बारे में किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।
174 विधायकों में से केवल 56 ने श्यामाचरण शुक्ल को वोट दिया, जबकि उनका नाम सबसे आगे था। दिग्विजय सिंह जिनका रेस में होना तो छोड़िए वो तो रेस के मैदान में भी दूर-दूर तक नहीं थे। उन्हें मिले 100 विधायकों के वोट।
ये बात तत्कालीन पीएम पीवी नरसिम्हा राव को पता चली। उन्होंने फोन पर कहा कि जिसे ज्यादा वोट मिले हैं उसे ही सीएम बना दीजिए। ये फोन आना भले ही किस्मत की बात थी, लेकिन विधायकों की लॉबिंग तो दिग्विजय सिंह की मेहनत का ही फल था। जिसके दम पर वो दो कार्यकाल तक प्रदेश के मुखिया रहे।
दिग्विजय सिंह की विरोधियों को साधने की कला
ये सिर्फ एक राजनीतिक घटनाक्रम नहीं है। इसे गहराई से समझें तो ये दिग्विजय सिंह की राजनीतिक समझ को भी जाहिर करती है। इतने बड़े नामों के बीच अपने नाम पर सहमति बनवा लेना आसान नहीं होता।
पर दिग्विजय सिंह ने तब वो कर दिखाया था। जब वो सीएम बने तब अपनी ही पार्टी में उनके दो धुर विरोधी नेता थे। एक सुभाष यादव और दूसरी जमुना देवी। इन दोनों को दिग्विजय सिंह ने उपमुख्यमंत्री बनाकर साधा। उनके कार्यकाल के दौरान जितने नेता प्रतिपक्ष रहे। उनके लिए भी दिग्विजय सिंह सबसे पहले खड़े नजर आए।
दिग्विजय सिंह की राजनीति: रिटायरमेंट या कोई संदेश?
कहने का मतलब ये कि जिस राजनेता की राजनीतिक समझ इतनी गहरी हो या जिसमें कूटनीति का भी भरपूर मिश्रण हो। क्या वो राजनेता रिटायरमेंट से जुड़ी पोस्ट क्या यूं ही कर देगा।
ये दिग्गी की राजनीति है साहब जिसमें कुछ न कुछ तो राज छिपा है। वो राज यानी कि मैसेज या तो आलाकमान समझ चुके हैं या फिर दिग्विजय सिंह ने रिटायरमेंट की भूमिका बांधनी शुरू कर दी है। क्या आप भी इस बात से सहमत हैं। कमेंट करके हमें जरूर बताइए।
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