NEWS STRIKE : राम निवास रावत और निर्मला सप्रे कांग्रेस में जल्द वापसी करेंगी

विधायक रामनिवास रावत और विधायक निर्मला सप्रे ने भाजपा का दामन तो थाम लिया है, लेकिन उन्होंने विधायकी से इस्तीफा नहीं दिया है। दल बदल कानून और फिर से चुनाव लड़ने से बचने के लिए दोनों ही विधायक कांग्रेस में आ सकते हैं वापस।

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Marut raj
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NEWS STRIKE Ram Niwas Rawat Nirmala Sapre  Congress Journalist Harish Diwekar द सूत्र
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हरीश दिवेकर, भोपाल. क्या ये सुन कर आप भी उतना ही चौंके हैं, जितना इनके पार्टी बदलने पर कांग्रेस चौंकी थी। जिस वक्त राम निवास रावत ने पार्टी बदली उस वक्त से ये अटकलें तेज हो गईं कि उनके दल बदल से पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह ( Former CM Digvijay Singh ) को नुकसान होगा। पूरे सागर जिले की विधानसभा सीटों में एक सीट कांग्रेस के खाते में आई थी, वो थी बीना की सीट। यहां से जीती थीं निर्मला सप्रे। वो भी बीजेपी आ गईं। अपनी मूल पार्टी को छोड़ने से लेकर अब तक इन विधायकों ने कुछ ऐसा कर दिया है, जो बार-बार ये संकेत दे रहा है कि ये जल्द कांग्रेस में वापसी कर लेंगे और अगर ऐसा होता है तो क्या ये सिर्फ बीजेपी का एक चुनावी स्टंट या प्रेशर पॉलीटिक्स मानी जाएगी।

विधानसभा की सदस्यता से नहीं दिया इस्तीफा

कांग्रेस के विधायक रहे सचिन बिरला की तर्ज पर वर्तमान विधायक रामनिवास रावत और विधायक निर्मला सप्रे ने भाजपा का दामन तो थाम लिया है, लेकिन उन्होंने विधायकी से इस्तीफा नहीं दिया है। सचिवालय से जुड़े सूत्रों के मुताबिक दोनों ने पार्टी तो बदल ली है, लेकिन अब तक विधायक के पद से इस्तीफा नहीं दिया है। 

रामनिवास रावत को कांग्रेस छोड़े हफ्ते भर से ज्यादा हो चुका है और निर्मला सप्रे को भी कुछ दिन बीत चुके हैं। इस्तीफे के सवाल पर निर्मला सप्रे ने मीडिया से कहा कि अभी उन्होंने विधायक पद से इस्तीफा नहीं दिया है। पहले वो पार्टी नेताओं से चर्चा करेंगी फिर इस संबंध में कोई फैसला लेंगी। हालांकि, बीजेपी ज्वॉइन करने के बाद भी निर्मला सप्रे ने सोमवार को सार्वजनिक तौर पर सागर से भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में प्रचार नहीं किया। 

सचिन बिरला का इस्तीफा वोटिंग के बाद स्वीकार किया था

मप्र में पिछले 39 दिन में निर्मला सप्रे कांग्रेस छोड़कर भाजपा ज्वॉइन करने वाली तीसरी विधायक हैं। इससे पहले विजयपुर से कांग्रेस विधायक रामनिवास रावत ने 30 अप्रैल को भाजपा की सदस्यता ली थी। अमरवाड़ा से कांग्रेस विधायक कमलेश शाह ने 29 मार्च को भाजपा ज्वॉइन की और पार्टी बदलते ही विधानसभा सचिवालय को अपना इस्तीफा भेज दिया था।

इससे पहले इस्तीफा न देने का उदाहरण पेश किया था बड़वाह से कांग्रेस विधायक रहे सचिन बिरला ने। सचिन बिरला ने 24 अक्टूबर 2021 को एक जनसभा में तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की मौजूदगी में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल होने का ऐलान कर दिया था। इसके बाद वे कांग्रेस के विधायक रहे और काम भाजपा का करते रहे। इसके बाद मप्र विधानसभा सदस्य नियम 1986 के तहत तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष डॉ. गोविंद सिंह ने बिरला की सदस्यता रद्द करने की मांग की थी। हालांकि, उनका इस्तीफा स्वीकर हुआ विधानसभा चुनाव 2023 की वोटिंग के बाद।

क्या कहता है दल बदल कानून

ऐसे में ये जान लेना जरूरी है कि दल बदल ( anti defection law ) के बाद इस्तीफा देना या नहीं देना इतनी सुर्खियां क्यों बटोर रहा है। इसके लिए कोई नियम है भी या कोई भी विधायक जब चाहें तब किसी और पार्टी को ज्वॉइन कर सकता है और विधायक भी बना रह सकता है। असल में दल बदल को लेकर भी सख्त कानून है। पहले आप उस कानून को थोड़ा आसान भाषा में समझिए।

साल 1985 में 52वें संविधान संशोधन के माध्यम से देश में ‘दलबदल विरोधी कानून’ पारित किया गया और इसे संविधान की दसवीं अनुसूची में जोड़ा गया। इस कानून का मुख्य मकसद है भारतीय राजनीति में दलबदल की परंपरा पर लगाम कसना। इस कानून के तहत दल बदल के कुछ नियम बनाए गए हैं। जो भी निर्वाचित प्रतिनिधि उसे तोड़ता है तो वो अपने पद के अयोग्य माना जाता है, जिसके चलते उसे इस्तीफा भी देना पड़ता है।

दल बदल कानून के अनुसार.....

•   अगर निर्वाचित सदस्य स्वेच्छा से किसी राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ देता है।

•    कोई निर्वाचित सदस्य जीत किसी अन्य दल से हासिल करता है और फिर किसी और दल में शामिल हो जाता है।  

•    कोई निर्वाचित सदस्य सदन में पार्टी के रुख के विपरीत वोट करता है।

•    कोई सदस्य स्वयं को वोटिंग से अलग रखता है।

•    छह महीने की अवधि के बाद कोई मनोनीत सदस्य किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है

तो कानून का पालन करते हुए उसकी सदस्यता खत्म की जा सकती है। कानून के अनुसार, सदन के अध्यक्ष के पास सदस्यों को अयोग्य करार देने संबंधी निर्णय लेने की शक्ति है। अध्यक्ष जिस दल से है, यदि शिकायत उसी दल से संबंधित है तो सदन में मौजूद चुने गए किसी अन्य सदस्य को इस संबंध में निर्णय लेने का अधिकार है।

इन नियमों से ये साफ है कि चुने हुए जनप्रतिनिधि ने अगर जीत के बाद पार्टी बदली है तो उसे सबसे पहले अपने पद से इस्तीफा देना पड़ेगा। यानी उसकी सीट पर उपचुनाव होगा। ये नियम रामनिवास रावत ( MLA Ramniwas Rawat ) पर भी लागू होता है और निर्मला सप्रे पर भी। यानी पार्टी बदलते ही दोनों को विधायकी भी छोड़ना चाहिए थी, लेकिन सरेआम इस ऐलान के बावजूद ये दोनों ही दल बदल विरोधी कानून का पालन नहीं कर रहे हैं। इसके क्या मायने हैं, सियासी गलियारों में दोनों के रूख को लेकर ढेरों सवाल उठ रहे हैं। कुछ अटकलें ये भी हैं कि दोनों ज्यादा दिन बीजेपी का हिस्सा नहीं रहेंगे।

विधायकों का दल बदल करवाना बीजेपी की चुनावी पॉलीटिक्स का हिस्सा था?

रामनिवास रावत और निर्मला सप्रे ( Nirmala Sapre ) ने जब दल बदल किया होगा तो ये तय माना जा सकता है कि दल बदल की शर्त में एक शर्त ये भी होगी कि उपचुनाव होने पर बीजेपी उन्हीं ही टिकट देगी। एक नियम ये भी है कि इनका इस्तीफा होते ही, सीट खाली होने के छह महीने के भीतर सीट पर उपचुनाव करवाने होंगे। ताकि दूसरा विधायक जनता को मिल सके। तो क्या ये माना जाए कि किसी दबाव में आकर दोनों ने कांग्रेस पार्टी से तो नाता तो तोड़ लिया, लेकिन विधायक के पद को लेकर संशय अब भी बरकरार है। इसलिए इस्तीफा नहीं दे रहे। क्योंकि, पहले तो दोनों को ये तय करना होगा कि टिकट उन्हीं को मिले। फिर बीजेपी के टिकट से ही वो जीत हासिल कर लें, इसकी श्योरिटी भी होना जरूरी है या फिर इन दो विधायकों का दलबदल करवाना बीजेपी की चुनावी पॉलीटिक्स का हिस्सा था।

इसकी एक वजह ये मानी जा रही है कि राम निवास रावत कांग्रेस के बहुत पुराने नेता हैं और अपने समुदाय में अच्छी पकड़ रखते हैं। छह बार के विधायक रहे राम निवास रावत बड़ा ओबीसी चेहरा होने के साथ साथ प्रदेश कांग्रेस कमेटी के कार्यकारी अध्यक्ष भी रह चुके हैं। उनकी पार्टी बदलने की टाइमिंग भी परफेक्ट थी। जिस दिन राहुल गांधी भिंड जिले के दौरे पर थे, उसी दिन राम निवास रावत पार्टी बदल रहे थे। नतीजा ये हुआ कि राहुल गांधी की सभा से ज्यादा राम निवास रावत की दल बदल की चर्चा होती रही। कांग्रेस की किरकिरी भी खूब ही। ये भी माना गया कि रावत के दल बदल का असर दिग्विजय सिंह के चुनाव पर भी पड़ेगा। क्योंकि अब ग्वालियर चंबल का ओबीसी वोटर राम निवास रावत के साथ बीजेपी का रुख कर सकता है।

क्या ये चुनाव पूरा होते ही ये ड्रेमेटिक स्टंट खत्म होगा

इसी तरह निर्मला सप्रे के दल बदल का फायदा शायद बीजेपी ने सागर की सीट पर उठाने की कोशिश की। वैसे तो सागर लोकसभा सीट भी 1996 से बीजेपी के खाते में ही है, लेकिन इस बार लता वानखेड़े के सामन कांग्रेस ने गुड्डू राजा बुंदेला को उतारकर बीजेपी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं, जो जीत बहुत आसान दिख रही थी उस जीत को कांग्रेस ने अपने फैसले से मुश्किल बना दिया है। गुड्डू राजा बुंदेला को टिकट कुछ देर से मिला, लेकिन उन्होंने उस समय को कवर करने में देर नहीं लगाई और लता वानखेड़े पर भारी पड़ते नजर आए। आपको बता दें कि गुड्डू राजा बुंदेला झांसी ललितपुर के पूर्व सांसद सुजान सिंह बुंदेला के बेटे हैं और, राजनीति के मैदान के पुराने खिलाड़ी हैं। बुंदेला ने विधानसभा चुनाव से पहले ही आलीशान गाड़ियों के काफिले के साथ कांग्रेस में प्रवेश किया था। विधानसभा में उन्हें टिकट नहीं मिल सका। अब लोकसभा चुनाव के मैदान में वो कड़ी चुनौती बन रहे हैं।

ऐसे में सागर लोकसभा सीट पर कांग्रेस कमजोर हो रही है, ये मैसेज देना जरूरी हो गया था,  लेकिन खबर लिखे जाने तक निर्मला सप्रे ने न तो इस्तीफा दिया था और न ही वो बीजेपी के चुनाव प्रचार का हिस्सा बनी थीं। इसलिए ये सवाल तो पूछा ही जाना चाहिए कि क्या राम निवास रावत वर्षों की निष्ठा भुलाकर और निर्मला सप्रे किसी दबाव के चलते अचानक पार्टी बदलने पर मजबूर हुए हैं और क्या ये चुनाव पूरा होते ही ये ड्रेमेटिक स्टंट खत्म होगा और दोनों नेता अपनी अपनी पार्टी का रुख कर लेंगे। फिलहाल तो सब चुनाव में उलझे हैं7 लेकिन इससे फारिग होते ही इन दोनों पर सवाल जरूर उठेंगे।  Journalist Harish Diwekar | the sootr news strike | News Strike Harish Divekar | News Strike

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