Point Of View With Anand : ठंड मौसम में नहीं, सिस्टम में जम गई है...
Anand Pandey | Jan 04, 2026, 20:15 IST
Photograph: (thesootr)
मध्य प्रदेश में प्रशासनिक लापरवाही से जुड़ी घटनाएं बढ़ रही हैं, जहां अफसरों की उदासीनता की वजह से लोगों की जान जा रही है। the sootr के एडिटर इन चीफ आनंद पांडे के इस लेख में हम इन घटनाओं पर उपजे सवालों के जवाब खोजते हैं।
कत्ल भी करते हो और नाम भी नहीं आता है,
ये हुनर अफसरशाही से बेहतर किसे आता है?
Point Of View With Anand ( प्वाइंट ऑफ व्यू विद आनंद ) : साथियों, मध्यप्रदेश इस वक्त भीषण ठंड की चपेट में है, लेकिन इस ठंड से भी ज्यादा खतरनाक एक और ठंड है, जो पूरे प्रदेश के सिस्टम में पसरी हुई है। यह ठंड मौसम की नहीं, संवेदनाओं की है। यह वह सुन्नता है, जो सरकारी अधिकारियों की नसों में जम चुकी है। यह वही ठंड है, जिसमें मौतें होती हैं और फाइलें आगे बढ़ जाती हैं।
मौजूदा दौर में पूरा सूबा एक ऐसी स्थायी जड़ता से जूझ रहा है, जहां इंसानी जान अब हादसा नहीं, एक संख्या बन चुकी है। अफसरों की रगों में दौड़ता खून ठंडा पड़ चुका है। शव उन्हें बेचैन नहीं करते। कुर्सियों पर बैठे ये लोग जानते हैं कि अधिकतम क्या होगा... कुछ दिन का निलंबन, आधी तनख्वाह और फिर वापसी।
सर्द हवा के बीच सियासत में उबाल है। बयान तेज हैं। प्रेस नोट लगातार जारी हो रहे हैं, लेकिन हर बयान, हर सफाई और हर आश्वासन के नीचे एक ही सच्चाई बार-बार उभरकर सामने आती है... अफसरों की लापरवाही, उदासीनता और गैरजिम्मेदाराना रवैया। ऐसा नहीं है कि पहले रामराज्य था और अब कलयुग अपने अंतिम चरण में पहुंच गया है, लेकिन हाल फिलहाल जिस तरह से सरकारी ढर्रा चल रहा है, वह तकलीफदेह है।
देश के सबसे साफ शहर का तमगा उठाए इंदौर में गंदा पानी पीने से 16 लोगों की मौत हो जाती है। इससे बड़ी प्रशासनिक शर्म क्या हो सकती है? यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है, यह सिस्टम की नाकामी है। यह वह जहर है, जो पाइपों से होकर सीधे घरों में पहुंचा और प्रशासन सोता रहा।
संस्कारधानी कहे जाने वाले जबलपुर की हालत भी इंदौर से मेल खाती है। नर्मदा तीरे कच्ची शराब ने 19 जिंदगियां निगल लीं। वहीं, छिंदवाड़ा में नकली कफ सिरप पीने से कई बच्चों की सांसें थम गईं। हां, बच्चों की जो इलाज के भरोसे दवा पी रहे थे।
अब जरा कार्रवाई देखिए। इंदौर में अफसर हटाकर नाटक किया गया। जबलपुर में वह औपचारिकता भी नहीं निभाई गई। छिंदवाड़ा में कुछ अफसर हटे और फिर कहानी खत्म हो गई।
हर बार एक ही स्क्रिप्ट। कुछ सस्पेंशन। कुछ तबादले। कुछ बयान। और फिर सब नॉर्मल या कहें न्यू नॉर्मल। न्यू नॉर्मल इसलिए क्योंकि वह चरणबद्ध तरीके से लापरवाही की रेल दौड़ रही है। अधिकारी इतने दुस्साहसी हो गए हैं कि अब वे कोर्ट के Hammer से भी नहीं डरते।
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Point Of View With Anand आखिर ये किस मोड़ पर खड़ा है भारत?
नमस्कार, आप पढ़ रहे हैं प्वाइंट ऑफ व्यू। मैं आपको थोड़ा पीछे ले चलता हूं... करीब पच्चीस बरस पहले। तब दिल्ली की सर्दियां ठंडी होती थीं, पर टीवी चैनलों के न्यूज रूम उबाल मारते थे। वाद-विवाद से नहीं, खबरों की गहमागहमी से। हिंदी टीवी पत्रकारिता में दिल्ली, उत्तरप्रदेश और बिहार छाए रहते थे। ब्रेकिंग वहीं से तय होती थी। प्राइम टाइम वहीं से बनता था।
2000 से 2020 तक करीब बीस बरसों तक मध्यप्रदेश को टीवी पत्रकारिता में डेड स्टेट कहा जाता रहा। डेड इसलिए नहीं कि यहां कुछ होता नहीं था, बल्कि इसलिए कि यहां जो होता था, वो सामान्य होता था।
देश के दिल में बसा यह राज्य अपने संस्कार, अपने साहस और शांति में कभी पीछे नहीं रहा, प्रदेश की प्रशासनिक विफलताएं राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा नहीं बनती थीं। अब तस्वीर खराब हो गई है। साल 2025 इसका गवाह है। मध्यप्रदेश, खासकर इंदौर और भोपाल प्रशासनिक विफलता के प्रतीक बन चुके हैं।
भोपाल में अफसरों ने ऐसा मुजस्समा गढ़ा, जिस पर पूरा देश हंस पड़ा। राजधानी में बना नया रेलवे ओवरब्रिज 90 डिग्री के तीखे मोड़ के कारण इंजीनियरिंग का मजाक बन गया। यह कोई छोटी चूक नहीं है। यह अक्षमता का खुला प्रदर्शन है। सतना में थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों को दूषित ब्लड ट्रांसफ्यूजन दिया गया और कई मासूम HIV संक्रमित हो गए। कुछ बच्चों की मौत हो गई। यह लापरवाही नहीं तो और क्या है?
इंदौर के MY अस्पताल में चूहों के काटने से मौतें हुईं। NICU में भर्ती आदिवासी नवजात बच्चों को चूहों ने नोच लिया। दो मासूम जिंदगियां चली गईं। इन घटनाओं के बाद क्या हुआ? वही जो हमेशा होता है। अफसर हटाए गए। कुछ सस्पेंड हुए। जांच बैठी और फिर सन्नाटा।
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अब ये अफसर कुछ दिन घर बैठेंगे। आधी पगार मिलेगी। मामला ठंडा पड़ेगा और सिस्टम में इनकी वापसी हो जाएगी। इसे निलंबन कहना ईमानदारी से शब्दों का अपमान है। यह पेड लीव है। यह सुधार नहीं, ढोंग है।
सीधे शब्दों में कहा जाए तो सस्पेंशन अधिकारियों के लिए सजा नहीं, यह ब्रेक होता है। जनता के लिए इंसाफ नहीं, महज भ्रम होता है। एक और सच्चाई यह है कि सस्पेंशन की अवधि को बाद में कई बार ड्यूटी पीरियड भी मान लिया जाता है। मतलब यह कि अधिकारी को प्रमोशन में नुकसान भी नहीं होता। कभी-कभी तो पिछला वेतन भी एरियर के रूप में मिल जाता है।
हरदा में पटाखा फैक्ट्री विस्फोट में कई लोग मारे गए। क्या हुआ? कुछ नहीं।
छिंदवाड़ा कफ सिरप केस में बच्चों की सांसें उखड़ गईं क्या हुआ? कुछ नहीं। लीपापोती हुई और फाइलें बंद कर दी गईं।
सितंबर 2015 में झाबुआ के पेटलावद में पटाखा फैक्ट्री विस्फोट में 79 लोग मारे गए। सात आरोपी थे। दिसंबर 2021 में सभी कोर्ट से बरी हो गए। सजा किसे मिली? सिर्फ थाना प्रभारी की 1600 रुपए की वेतनवृद्धि रोक दी गई। अब इसे न्याय कहें या मजाक?
जून 2017 में मंदसौर गोलीकांड में छह किसान मारे गए। पूरा देश सड़कों पर था। तीन अफसर निलंबित हुए और फिर बहाल कर दिए गए। 2007 बैच के IAS स्वतंत्र कुमार सिंह, 2009 बैच के IPS ओपी त्रिपाठी और 2014 बैच के IPS साई कृष्णा एस। आज ये सब फिर सिस्टम का हिस्सा हैं, नई पोस्टिंग के साथ।
जानवर भी इससे अछूते नहीं हैं। अक्टूबर 2024 में बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में 10 हाथियों की मौत हुई थी। इसके बाद वन संरक्षक और सहायक वन संरक्षक को सस्पेंड कर दिया गया। अब इनकी बहाली हो चुकी है। आज ये अफसर अच्छे पदों पर बैठे हैं।
भोपाल में 90 डिग्री का ब्रिज बनता है। मेट्रो स्टेशन ऐसे बनाए जाते हैं कि ट्रक तक नहीं निकल पाते। फिर सड़क खोदकर समाधान निकाला जाता है। नगर निगम 40 करोड़ की इमारत बना देता है और मीटिंग हॉल बनाना भूल जाता है। अब 10 करोड़ और खर्च होंगे। राजधानी के पास ही मस्तीपुरा गांव में पर्यावरणीय मंजूरी में दस्तावेजी खेल होता है...कागजों में 53 पेड़ और हकीकत में 13 एकड़ जंगल।
माइनिंग इंस्पेक्टर सस्पेंड होता है। आगे क्या होगा, सब जानते हैं। दमोह में 400 करोड़ का मेडिकल कॉलेज वन भूमि पर खड़ा हो जाता है। अब समाधान खोजे जा रहे हैं, जिम्मेदार नहीं।
बात यहीं खत्म नहीं होती। कुछ अफसर ऐसे हैं, जिन पर न सस्पेंशन का असर होता है, न जांच का और न ही अदालत की सख्ती का। हरदा जिले के टिमरनी में फैला राजा बरारी एस्टेट यही बताता है कि यहां कानून से बड़ा रसूख है।
द सूत्र ने ही सबसे पहले यह मुद्दा उठाया था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद 8000 एकड़ का वन क्षेत्र आज भी निजी एस्टेट की तरह चल रहा है। इसी में 4500 एकड़ सघन जंगल शामिल है, जहां से हर साल सागौन जैसी कीमती लकड़ियों की कटाई होती है, और प्रशासन आंख मूंदे बैठा है। नतीजा यह है कि अपने ही जंगलों पर हक रखने वाले करीब 10 हजार आदिवासी आज उसी जमीन पर मजदूर बनकर काम करने को मजबूर हैं।
भगोड़े विजय माल्या से जुड़ा भोपाल का मामला गंभीर सवाल खड़े करता है। गोविंदपुरा इंडस्ट्रियल एरिया में उनकी कंपनी से जुड़ी इकाई को दी गई साढ़े तीन एकड़ जमीन को बिकवाने में लीज नियमों और पर्यावरणीय शर्तों की अनदेखी की गई। द सूत्र के खुलासे के बाद मंत्री चैतन्य काश्यप ने जांच की बात कही है।
दस्तावेज बताते हैं कि 16 साल पहले निरस्त लीज को अफसरों ने बहाल कराया और महज तीन माह बाद जमीन बेचने की प्रक्रिया शुरू करा दी, जबकि नियमों के मुताबिक उद्योग में कुल निवेश का करीब 50 फीसदी खर्च होना जरूरी था।
रिकॉर्ड में उत्पादन बंद होने, मौके पर सिर्फ चौकीदार मिलने, केवल 65 लाख की मशीनरी और 50 लोगों को रोजगार देने की बात दर्ज है। इसके बावजूद जमीन की नई लीज और रजिस्ट्री कराकर एक के बाद एक फर्मों को बेचने में विभागीय अफसरों ने पूरा सहयोग दिया।
एक और बानगी देखिए...। मध्यप्रदेश की एकल ग्राम नल-जल योजना में भारी गड़बड़ी सामने आने के बाद सरकार ने इंजीनियरों पर कार्रवाई शुरू की है। 28 हजार गांवों की जांच में 8 हजार गांवों में खामियां मिलीं हैं, जिससे 20 हजार करोड़ की योजना की लागत करीब 23 हजार करोड़ पहुंच गई।
जिन इंजीनियरों की वजह से खर्च बढ़ा, उनमें कई रिटायर हो चुके हैं और इसमें भी उन्हें रिटायर्ड हुए चार साल बीत चुके हैं। अब नियम कहता है कि यदि किसी को रिटायर्ड हुए चार साल हो गए तो आप उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। अब देखिए एक नियम की आड़ से सरकार का 2800 करोड़ का नुकसान करने वाले 51 इंजीनियर पूरी तरह बच गए।
साथियों, यह कोई भावनात्मक बहस नहीं है, यह सीधा सवाल है। जब लापरवाही से पुल गिरता है, जहर मिला पानी घरों में पहुंचता है, अस्पताल में बच्चे मरते हैं, शराब और नकली दवा से जिंदगियां खत्म होती हैं तो इसे हादसा कहना किस कानून में लिखा है?
अगर एक आम आदमी की गलती से किसी की जान चली जाए तो वह गैर इरादतन हत्या का आरोपी बनता है। फिर वही गलती अफसर करता है तो उसे प्रशासनिक चूक का कवच कैसे मिल जाता है? क्या कुर्सी इंसान को कानून से ऊपर कर देती है?
जब तक अफसरों पर धाराएं नहीं लगेंगी, जब तक लापरवाही से मौत को सीधे आपराधिक कृत्य नहीं माना जाएगा, जब तक सस्पेंशन को सजा की जगह नहीं, शर्म की तरह नहीं देखा जाएगा, तब तक कुछ नहीं बदलेगा। ऐसे हादसे होते रहेंगे।
मेरा यह सवाल सत्ता से है। क्या सरकार सिर्फ बयान देने के लिए है या जिम्मेदारी तय करने के लिए? क्या अफसर सिर्फ फाइल आगे बढ़ाने के लिए हैं या जान बचाने के लिए? अगर जवाबदेही आज नहीं तय हुई तो याद रखिए, कुछ नहीं बदलेगा।
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ये हुनर अफसरशाही से बेहतर किसे आता है?
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शव अफसरों को बेचैन नहीं करते
सर्द हवा के बीच सियासत में उबाल है। बयान तेज हैं। प्रेस नोट लगातार जारी हो रहे हैं, लेकिन हर बयान, हर सफाई और हर आश्वासन के नीचे एक ही सच्चाई बार-बार उभरकर सामने आती है... अफसरों की लापरवाही, उदासीनता और गैरजिम्मेदाराना रवैया। ऐसा नहीं है कि पहले रामराज्य था और अब कलयुग अपने अंतिम चरण में पहुंच गया है, लेकिन हाल फिलहाल जिस तरह से सरकारी ढर्रा चल रहा है, वह तकलीफदेह है।
देश के सबसे साफ शहर का तमगा उठाए इंदौर में गंदा पानी पीने से 16 लोगों की मौत हो जाती है। इससे बड़ी प्रशासनिक शर्म क्या हो सकती है? यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है, यह सिस्टम की नाकामी है। यह वह जहर है, जो पाइपों से होकर सीधे घरों में पहुंचा और प्रशासन सोता रहा।
संस्कारधानी कहे जाने वाले जबलपुर की हालत भी इंदौर से मेल खाती है। नर्मदा तीरे कच्ची शराब ने 19 जिंदगियां निगल लीं। वहीं, छिंदवाड़ा में नकली कफ सिरप पीने से कई बच्चों की सांसें थम गईं। हां, बच्चों की जो इलाज के भरोसे दवा पी रहे थे।
अब जरा कार्रवाई देखिए। इंदौर में अफसर हटाकर नाटक किया गया। जबलपुर में वह औपचारिकता भी नहीं निभाई गई। छिंदवाड़ा में कुछ अफसर हटे और फिर कहानी खत्म हो गई।
हर बार एक ही स्क्रिप्ट। कुछ सस्पेंशन। कुछ तबादले। कुछ बयान। और फिर सब नॉर्मल या कहें न्यू नॉर्मल। न्यू नॉर्मल इसलिए क्योंकि वह चरणबद्ध तरीके से लापरवाही की रेल दौड़ रही है। अधिकारी इतने दुस्साहसी हो गए हैं कि अब वे कोर्ट के Hammer से भी नहीं डरते।
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Point Of View With Anand आखिर ये किस मोड़ पर खड़ा है भारत?
इंदौर-भोपाल प्रशासनिक विफलता के प्रतीक
2000 से 2020 तक करीब बीस बरसों तक मध्यप्रदेश को टीवी पत्रकारिता में डेड स्टेट कहा जाता रहा। डेड इसलिए नहीं कि यहां कुछ होता नहीं था, बल्कि इसलिए कि यहां जो होता था, वो सामान्य होता था।
देश के दिल में बसा यह राज्य अपने संस्कार, अपने साहस और शांति में कभी पीछे नहीं रहा, प्रदेश की प्रशासनिक विफलताएं राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा नहीं बनती थीं। अब तस्वीर खराब हो गई है। साल 2025 इसका गवाह है। मध्यप्रदेश, खासकर इंदौर और भोपाल प्रशासनिक विफलता के प्रतीक बन चुके हैं।
भोपाल में अफसरों ने ऐसा मुजस्समा गढ़ा, जिस पर पूरा देश हंस पड़ा। राजधानी में बना नया रेलवे ओवरब्रिज 90 डिग्री के तीखे मोड़ के कारण इंजीनियरिंग का मजाक बन गया। यह कोई छोटी चूक नहीं है। यह अक्षमता का खुला प्रदर्शन है। सतना में थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों को दूषित ब्लड ट्रांसफ्यूजन दिया गया और कई मासूम HIV संक्रमित हो गए। कुछ बच्चों की मौत हो गई। यह लापरवाही नहीं तो और क्या है?
इंदौर के MY अस्पताल में चूहों के काटने से मौतें हुईं। NICU में भर्ती आदिवासी नवजात बच्चों को चूहों ने नोच लिया। दो मासूम जिंदगियां चली गईं। इन घटनाओं के बाद क्या हुआ? वही जो हमेशा होता है। अफसर हटाए गए। कुछ सस्पेंड हुए। जांच बैठी और फिर सन्नाटा।
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Point Of View With Anand मध्य प्रदेश में खाकी की असलियत का खौफनाक सच
अफसरों पर सस्पेंशन का नहीं होता असर
हालिया मामला फिर इंदौर का है। दूषित पानी पीने से 16 लोगों की मौत हो गई। इसके बाद सरकार ने नगर निगम कमिश्नर दिलीप कुमार यादव को हटा दिया। अपर आयुक्त रोहित सिसोनिया और इंजीनियर संजीव श्रीवास्तव सस्पेंड कर दिए गए। कार्रवाई पूरी हो गई।
सीधे शब्दों में कहा जाए तो सस्पेंशन अधिकारियों के लिए सजा नहीं, यह ब्रेक होता है। जनता के लिए इंसाफ नहीं, महज भ्रम होता है। एक और सच्चाई यह है कि सस्पेंशन की अवधि को बाद में कई बार ड्यूटी पीरियड भी मान लिया जाता है। मतलब यह कि अधिकारी को प्रमोशन में नुकसान भी नहीं होता। कभी-कभी तो पिछला वेतन भी एरियर के रूप में मिल जाता है।
हरदा में पटाखा फैक्ट्री विस्फोट में कई लोग मारे गए। क्या हुआ? कुछ नहीं।
छिंदवाड़ा कफ सिरप केस में बच्चों की सांसें उखड़ गईं क्या हुआ? कुछ नहीं। लीपापोती हुई और फाइलें बंद कर दी गईं।
सितंबर 2015 में झाबुआ के पेटलावद में पटाखा फैक्ट्री विस्फोट में 79 लोग मारे गए। सात आरोपी थे। दिसंबर 2021 में सभी कोर्ट से बरी हो गए। सजा किसे मिली? सिर्फ थाना प्रभारी की 1600 रुपए की वेतनवृद्धि रोक दी गई। अब इसे न्याय कहें या मजाक?
जून 2017 में मंदसौर गोलीकांड में छह किसान मारे गए। पूरा देश सड़कों पर था। तीन अफसर निलंबित हुए और फिर बहाल कर दिए गए। 2007 बैच के IAS स्वतंत्र कुमार सिंह, 2009 बैच के IPS ओपी त्रिपाठी और 2014 बैच के IPS साई कृष्णा एस। आज ये सब फिर सिस्टम का हिस्सा हैं, नई पोस्टिंग के साथ।
जानवर भी इससे अछूते नहीं हैं। अक्टूबर 2024 में बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में 10 हाथियों की मौत हुई थी। इसके बाद वन संरक्षक और सहायक वन संरक्षक को सस्पेंड कर दिया गया। अब इनकी बहाली हो चुकी है। आज ये अफसर अच्छे पदों पर बैठे हैं।
जब इंजीनियरिंग से बना पूरे प्रदेश का मजाक
माइनिंग इंस्पेक्टर सस्पेंड होता है। आगे क्या होगा, सब जानते हैं। दमोह में 400 करोड़ का मेडिकल कॉलेज वन भूमि पर खड़ा हो जाता है। अब समाधान खोजे जा रहे हैं, जिम्मेदार नहीं।
बात यहीं खत्म नहीं होती। कुछ अफसर ऐसे हैं, जिन पर न सस्पेंशन का असर होता है, न जांच का और न ही अदालत की सख्ती का। हरदा जिले के टिमरनी में फैला राजा बरारी एस्टेट यही बताता है कि यहां कानून से बड़ा रसूख है।
द सूत्र ने ही सबसे पहले यह मुद्दा उठाया था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद 8000 एकड़ का वन क्षेत्र आज भी निजी एस्टेट की तरह चल रहा है। इसी में 4500 एकड़ सघन जंगल शामिल है, जहां से हर साल सागौन जैसी कीमती लकड़ियों की कटाई होती है, और प्रशासन आंख मूंदे बैठा है। नतीजा यह है कि अपने ही जंगलों पर हक रखने वाले करीब 10 हजार आदिवासी आज उसी जमीन पर मजदूर बनकर काम करने को मजबूर हैं।
निरस्त लीज को बहाल कर बेचने का कारनामा
दस्तावेज बताते हैं कि 16 साल पहले निरस्त लीज को अफसरों ने बहाल कराया और महज तीन माह बाद जमीन बेचने की प्रक्रिया शुरू करा दी, जबकि नियमों के मुताबिक उद्योग में कुल निवेश का करीब 50 फीसदी खर्च होना जरूरी था।
रिकॉर्ड में उत्पादन बंद होने, मौके पर सिर्फ चौकीदार मिलने, केवल 65 लाख की मशीनरी और 50 लोगों को रोजगार देने की बात दर्ज है। इसके बावजूद जमीन की नई लीज और रजिस्ट्री कराकर एक के बाद एक फर्मों को बेचने में विभागीय अफसरों ने पूरा सहयोग दिया।
नियमों की आड़ में बच गए 51 इंजीनियर
जिन इंजीनियरों की वजह से खर्च बढ़ा, उनमें कई रिटायर हो चुके हैं और इसमें भी उन्हें रिटायर्ड हुए चार साल बीत चुके हैं। अब नियम कहता है कि यदि किसी को रिटायर्ड हुए चार साल हो गए तो आप उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। अब देखिए एक नियम की आड़ से सरकार का 2800 करोड़ का नुकसान करने वाले 51 इंजीनियर पूरी तरह बच गए।
कुर्सी इंसान को कानून से ऊपर कर देती है?
अगर एक आम आदमी की गलती से किसी की जान चली जाए तो वह गैर इरादतन हत्या का आरोपी बनता है। फिर वही गलती अफसर करता है तो उसे प्रशासनिक चूक का कवच कैसे मिल जाता है? क्या कुर्सी इंसान को कानून से ऊपर कर देती है?
जब तक अफसरों पर धाराएं नहीं लगेंगी, जब तक लापरवाही से मौत को सीधे आपराधिक कृत्य नहीं माना जाएगा, जब तक सस्पेंशन को सजा की जगह नहीं, शर्म की तरह नहीं देखा जाएगा, तब तक कुछ नहीं बदलेगा। ऐसे हादसे होते रहेंगे।
मेरा यह सवाल सत्ता से है। क्या सरकार सिर्फ बयान देने के लिए है या जिम्मेदारी तय करने के लिए? क्या अफसर सिर्फ फाइल आगे बढ़ाने के लिए हैं या जान बचाने के लिए? अगर जवाबदेही आज नहीं तय हुई तो याद रखिए, कुछ नहीं बदलेगा।
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