बीजेपी में पोस्टर से स्क्रीन तक पहुंची सियासत, अब हर कहानी बनेगी कंटेंट
ऐसे समझें मामला...
- जनसंपर्क का तरीका मोबाइल केंद्रित हो रहा है।
- हर शक्ति केंद्र से रील बनाने की चल रही तैयारी।
- लाभार्थियों की कहानी बनेगी डिजिटल कंटेंट।
- क्रिएटर्स को ग्राउंड रिपोर्ट के लिए जोड़ेंगे।
- 17 सितंबर से बूथ स्तर पर संपर्क अभियान।
राजनीति में अब लोगों तक पहुंचने के लिए सिर्फ मंच, माइक और पोस्टर काफी नहीं माने जा रहे। मोबाइल स्क्रीन ने जनसंपर्क का पूरा तरीका बदल दिया है।
इसी बदलाव के बीच भाजपा अपने आगामी अभियान में रील, लाभार्थियों की वास्तविक कहानियों और डिजिटल क्रिएटर्स को बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करने की तैयारी में है। खास बात यह है कि कंटेंट बनाने का काम अब संगठन के स्थानीय स्तर तक ले जाने का खाका तैयार किया गया है।
जनसंपर्क की नई जगह अब जेब में रखा मोबाइल
एक समय राजनीतिक संदेश पोस्टर, पर्चे, सभाओं और नुक्कड़ बैठकों से लोगों तक पहुंचता था। अब वही संदेश कुछ सेकंड के वीडियो में हजारों लोगों तक पहुंच सकता है।
इसी बदलाव को ध्यान में रखते हुए आगामी अभियान में डिजिटल माध्यम को सिर्फ प्रचार का जरिया नहीं, बल्कि जमीनी गतिविधियों को दिखाने वाले मंच के तौर पर इस्तेमाल करने की तैयारी है। यानी स्थानीय स्तर पर होने वाला काम पहले कैमरे में दर्ज होगा और फिर सोशल मीडिया के जरिए लोगों तक जाएगा।
बूथ से बनेगा कंटेंट, ऊपर तक पहुंचेगा
प्रस्तावित योजना में संगठन के निचले स्तर को भी डिजिटल कंटेंट से जोड़ने की तैयारी है। हर शक्ति केंद्र से कम से कम 10 रील तैयार कराने का लक्ष्य रखा गया है। कार्यकर्ताओं को अपने क्षेत्र में सरकारी योजनाओं से लाभ पाने वाले लोगों की पहचान करनी होगी।
वीडियो में लाभार्थी का नाम, स्थान, जिला, संबंधित योजना और उससे हुए बदलाव जैसी जानकारी शामिल करने की योजना है। वीडियो को करीब 60 सेकंड तक सीमित रखने के साथ तय फ्रेम, हैशटैग और अभियान की पहचान के साथ सोशल मीडिया पर डालने का खाका है। इसका मतलब साफ है कि सोशल मीडिया पर कंटेंट अब केवल प्रदेश या राष्ट्रीय स्तर की टीम का काम नहीं रहेगा।
नेता नहीं, लाभार्थी बनेगा कहानी का चेहरा
इस पूरी कवायद में एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई देता है। सरकारी योजनाओं की जानकारी सिर्फ भाषण या प्रेस बयान के जरिए देने के बजाय उसे किसी व्यक्ति की कहानी के रूप में पेश करने की तैयारी है।
किस योजना से किस व्यक्ति को क्या फायदा मिला, उसके जीवन में क्या बदलाव आया और वह बदलाव जमीन पर कैसा दिखता है, इसे छोटे वीडियो में दिखाने का प्रयास होगा।
यही फॉर्मेट सोशल मीडिया के मौजूदा व्यवहार से मेल खाता है, जहां लंबी जानकारी के बजाय छोटी और दृश्य आधारित कहानी ज्यादा आसानी से देखी जाती है।
डिजिटल क्रिएटर अब मौके पर जाएंगे
बीजेपी केअभियान का दूसरा बड़ा हिस्सा बाहरी डिजिटल क्रिएटर्स और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को जोड़ने की तैयारी है। इन क्रिएटर्स को ऐसे स्थानों पर ले जाने का प्रस्ताव है जहां विकास और सरकारी योजनाओं के असर का दावा किया जा रहा है।
वहां स्थानीय लोगों से बातचीत, मौके का निरीक्षण और अपने अनुभव के आधार पर वीडियो तैयार करने की योजना है। राज्यों से ऐसे स्थानों की सूची भी मांगी जानी है, जहां इंफ्रास्ट्रक्चर, रोजगार, अर्थव्यवस्था, सुरक्षा, अवसर या जनजीवन में बदलाव दिखाई देता हो। राष्ट्रीय स्तर पर करीब 50 स्थानों को चुने जाने का प्रस्ताव है।
अब ग्राउंड रिपोर्ट का रास्ता सोशल मीडिया से
यहां राजनीतिक संचार का नया मॉडल दिखाई देता है। पहले नेता किसी योजना या उपलब्धि के बारे में बताते थे। अब कोशिश यह है कि उसी दावे को मौके की तस्वीर और डिजिटल क्रिएटर की रिपोर्ट के जरिए दिखाया जाए।
इससे राजनीतिक संदेश का माध्यम भी बदलता है और उसे देखने वाला वर्ग भी बदलता है। हालांकि, इस मॉडल की विश्वसनीयता अंततः इस बात पर निर्भर करेगी कि वीडियो में दिखाए गए दावों और जमीन पर मौजूद वास्तविक स्थिति के बीच कितना मेल रहता है।
17 सितंबर को बूथ तक पहुंचेगा संपर्क अभियान
17 सितंबर को ‘आशीर्वाद का दीया’ कार्यक्रम के जरिए बूथ स्तर तक संपर्क की तैयारी है। कार्यकर्ताओं के घर-घर जाकर लोगों से दीप जलाने का
आग्रह करने की योजना है। इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जनसेवा और विकसित भारत 2047 के संकल्प से जोड़ा गया है। इसके बाद कार्यक्रम से जुड़ी तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर साझा करने की तैयारी है।
असली बदलाव कंटेंट के तरीके में
इस पूरे अभियान को केवल एक कार्यक्रम के तौर पर देखना अधूरा होगा। इसके पीछे जनसंपर्क के तरीके में आया बड़ा बदलाव भी दिखाई देता है।
अब राजनीतिक संगठन के लिए मैदान और मोबाइल, दोनों एक साथ महत्वपूर्ण हो गए हैं। स्थानीय कार्यकर्ता जमीन से कहानी जुटाएगा, कैमरा उसे रिकॉर्ड करेगा और सोशल मीडिया उस कहानी को आगे पहुंचाएगा। यही वह बदलाव है जो आने वाले समय में राजनीतिक जनसंपर्क की भाषा और शैली को और ज्यादा डिजिटल बना सकता है।
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