MP Promotion Update: सीएम की सीधी मॉनिटरिंग, फिर भी कर्मचारियों की बढ़ी चिंता
समझें क्या है पूरा मामला...
- MP में 10 साल बाद प्रमोशन प्रक्रिया तेज हुई।
- सीएम ऑफिस विभागों की प्रगति पर नजर रखेगा।
- विभागों को ऑनलाइन पोर्टल पर जानकारी देनी होगी।
- डेढ़ लाख तक कर्मचारियों को लाभ मिल सकता है।
- हाईकोर्ट में कानूनी मामले की सुनवाई प्रस्तावित है।
सीएम ऑफिस करेगा निगरानी
मध्य प्रदेश में करीब दस साल बाद पदोन्नति प्रक्रिया फिर शुरू हुई है। सीएम मोहन यादव ने इसे मिशन मोड में आगे बढ़ाने के निर्देश दिए हैं। सीएम ऑफिस अब विभागवार प्रगति की निगरानी करेगा। दूसरी ओर कर्मचारी संगठनों ने कानूनी स्थिति को लेकर चिंता जताई है।
सीएम ऑफिस करेगा हर विभाग की मॉनिटरिंग
सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि पदोन्नति प्रक्रिया में अब किसी तरह की अनावश्यक देरी स्वीकार नहीं होगी। जिन विभागों में अभी तक प्रमोशन आदेश जारी नहीं हुए हैं, उनकी प्रगति पर मुख्यमंत्री कार्यालय सीधे नजर रखेगा।
सामान्य प्रशासन विभाग ने सभी विभागों को निर्देश दिए हैं कि जारी और लंबित पदोन्नति मामलों का पूरा विवरण निर्धारित ऑनलाइन पोर्टल पर दर्ज किया जाए। इसके आधार पर विभागवार समीक्षा की जाएगी।
मंत्रियों को भी दी गई व्यक्तिगत जिम्मेदारी
सीएम मोहन यादव ने सभी विभागीय मंत्रियों से कहा है कि वे अपने-अपने विभागों में पदोन्नति प्रक्रिया की व्यक्तिगत समीक्षा करें। उद्देश्य यह है कि पात्र कर्मचारियों को समय पर पदोन्नति और उससे जुड़े सभी लाभ मिल सकें।
कर्मचारियों के मन में क्यों बना हुआ है संशय?
पदोन्नति प्रक्रिया शुरू होने के बावजूद कई कर्मचारी कानूनी स्थिति को लेकर असमंजस में हैं। उनका कहना है कि यदि भविष्य में अदालत की ओर से कोई अलग फैसला आता है, तो पहले से जारी पदोन्नति आदेशों की स्थिति क्या होगी, इसे लेकर स्पष्टता जरूरी है। इसी कानूनी विवाद के बीच सोमवार को हाईकोर्ट में मामले की सुनवाई प्रस्तावित है। कर्मचारियों की नजर अब इस सुनवाई पर टिकी हुई है।
कर्मचारी नेता ने उठाए कई सवाल
कर्मचारी नेता उमाशंकर तिवारी का कहना है कि महाधिवक्ता प्रशांत सिंह की कानूनी राय के बाद सरकार ने पदोन्नति प्रक्रिया शुरू की है। उनके मुताबिक पत्र में यह उल्लेख किया गया था कि फिलहाल पदोन्नति पर अदालत की कोई रोक नहीं है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि रोक नहीं थी, तो इतने वर्षों तक पदोन्नति प्रक्रिया लंबित क्यों रखी गई।
उनका कहना है कि इस दौरान बड़ी संख्या में कर्मचारी बिना पदोन्नति के ही सेवानिवृत्त हो गए। तिवारी का यह भी कहना है कि अंतिम निर्णय अदालत को करना है। ऐसे में यदि भविष्य में कोई अलग आदेश आता है, तो पहले से हुई पदोन्नतियों की स्थिति क्या होगी, इस पर सरकार को स्पष्ट जवाब देना चाहिए।
डेढ़ लाख कर्मचारियों को मिल सकता है लाभ
सरकार का दावा है कि नई व्यवस्था से प्रदेश के करीब एक से डेढ़ लाख अधिकारियों और कर्मचारियों को पदोन्नति का लाभ मिल सकता है। इसी वजह से प्रक्रिया को पारदर्शी और समयबद्ध बनाने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। मुख्यमंत्री अगले सप्ताह विभागवार समीक्षा कर यह जानेंगे कि किन विभागों में काम तेजी से आगे बढ़ रहा है और कहां अभी भी फाइलें लंबित हैं।
नई नीति पर विरोध भी तेज
दूसरी ओर सामान्य, पिछड़ा एवं अल्पसंख्यक वर्ग अधिकारी-कर्मचारी संस्था और सपाक्स ने नई पदोन्नति नीति पर सवाल उठाए हैं। कि ज़िम्मेदार अफसरों ने नीति बनाते समय हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का पूरा पालन नहीं किया गया। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने अपने फैसले पर पुनर्विचार नहीं किया तो संगठन अदालत का रुख करेगा और प्रदेशव्यापी आंदोलन भी शुरू किया जा सकता है।
अब आगे क्या?
सरकार प्रशासनिक स्तर पर पदोन्नति प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाना चाहती है, जबकि कर्मचारी संगठन कानूनी पहलुओं पर स्पष्टता की मांग कर रहे हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में अदालत की सुनवाई और उसके बाद की स्थिति इस पूरी प्रक्रिया की दिशा तय कर सकती है।
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