PWD में दोहरा एक्शन का खेल? 3 इंजीनियर सस्पेंड, पुराने मामलों में अब भी नरमी पर सवाल
मध्यप्रदेश के लोक निर्माण विभाग (PWD) में भ्रष्टाचार के मामलों पर बड़ा विरोधाभास सामने आया है। अप्रैल 2026 में लोकायुक्त द्वारा ट्रैप किए गए तीन इंजीनियरों जयदेव गौतम, टीके जैन और अंशु दुबे को कुछ दिन बाद सस्पेंड कर दिया गया। वहीं, 90 हजार की रिश्वत में पकड़े गए दो इंजीनियर आज तक सस्पेंड नहीं हुए। यह अंतर विभाग की नीयत और सिस्टम पर सवाल खड़ा कर रहा है।
इंदौर ट्रैप केस
अप्रैल 2026 में इंदौर में लोकायुक्त ने बड़ी कार्रवाई की। PWD के तीन अधिकारियों को 3.50 लाख की डील के दौरान रंगे हाथ पकड़ा गया।
मामले की मुख्य बातें
कुल रिश्वत डिमांड: ₹3.50 लाख
बरामद रकम: करीब ₹2.5 लाख
शिकायतकर्ता: धार के ठेकेदार राजपाल सिंह पंवार
काम: ₹30-45 लाख के रोड निर्माण बिल पास करने के बदले रिश्वत
आरोपी
जयदेव गौतम (EE) – ₹1.5 लाख लेते पकड़े गए
टी.के. जैन (SDO) – ₹1 लाख लेते पकड़े गए
अंशु दुबे (उपयंत्री) – साजिश में शामिल
सरकार का एक्शन: तीनों पर गिरी गाज
लोकायुक्त ट्रैप के बाद विभाग ने तेजी दिखाते हुए तीनों इंजीनियरों को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड किया। निलंबन के दौरान उनका मुख्यालय ग्वालियर तय किया गया। बाद में प्रशासनिक स्तर पर उनकी नई पदस्थापना भी कर दी गई। कागजों में यह कार्रवाई सख्त दिखती है, लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। पुराने मामले में 90 हजार की रिश्वत के बावजूद आरोपी अभी भी ‘सुरक्षित’ हैं।
इससे पहले, करीब 10 अप्रैल के आसपास लोकायुक्त ने बालकुमार जैन (SDO) और धर्मेंद्र कुमार नेमा (सब इंजीनियर) को 90 हजार की रिश्वत लेते रंगे हाथ पकड़ा था। लेकिन यहां तत्काल सस्पेंशन नहीं हुआ, बल्कि दोनों को सिर्फ इंदौर से ट्रांसफर कर नर्मदापुरम भेज दिया गया। आज तक उनका निलंबन नहीं किया गया। यही अंतर अब सबसे बड़ा विवाद बन गया है।
नियम बनाम हकीकत: कहां टूट रही है प्रक्रिया?
सामान्यत: रेड-हैंडेड ट्रैप में तुरंत सस्पेंशन होना चाहिए, जबकि गैर-ट्रैप मामलों में चालान के बाद कार्रवाई की जाती है। लेकिन यहां उल्टा हो रहा है। रेड-हैंडेड पकड़े गए 2 इंजीनियरों पर ढील दी गई, जबकि दूसरे केस में तुरंत सख्ती दिखाई गई। इसका मतलब है कि नियम एक हैं, लेकिन लागू करने का तरीका अलग-अलग है। 'केपीएस राणा फैक्टर' पर चर्चा इसलिए हो रही है क्योंकि इस मामले में प्रशासनिक फैसलों में असमानता और पक्षपाती व्यवहार नजर आ रहा है।
सूत्रों के मुताबिक विभागीय प्रस्ताव और निर्णय में असामान्य देरी इंजीनियरिंग इन चीफ केपीएस राणा के स्तर पर नरमी की चर्चा इससे यह शक गहराता है कि कुछ मामलों में संरक्षण मिल रहा है। हालांकि, इस पर कोई आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है।
जिम्मेदारों की चुप्पी
जब इस पूरे मामले पर विभागीय अधिकारियों से प्रतिक्रिया मांगी गई, तो किसी ने भी ऑन रिकॉर्ड कुछ कहने से इनकार कर दिया। यह चुप्पी खुद इस विवाद को और गंभीर बना देती है।
PWD की कार्यप्रणाली पर पेशवा जैसे सवाल
पूरे घटनाक्रम ने PWD की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ विभाग सख्ती दिखाकर संदेश देना चाहता है, दूसरी तरफ कुछ मामलों में ढील देकर उसी संदेश को कमजोर भी कर देता है। अब यह सिर्फ भ्रष्टाचार का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि सिस्टम की विश्वसनीयता, पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सीधा सवाल बन चुका है।
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