PWD में ठेकेदारों की पैरवी! रीवा से उठा विवाद, नियमों में ‘ढील’ देने की सिफारिश पर सवाल
Ramanand Tiwari | Apr 15, 2026, 22:56 IST
Photograph: (the sootr)
मध्य प्रदेश लोक निर्माण विभाग (PWD) में 10 करोड़ से कम के कामों में प्राइस एस्केलेशन देने की सिफारिश पर मचा बवाल। क्या ठेकेदारों के दबाव में बदलेंगे नियम?
प्रदेश में महंगाई को लेकर सरकार जहां हालात सामान्य बता रही है, वहीं PWD का एक पत्र सिस्टम की मंशा पर सवाल खड़ा कर रहा है। रीवा सर्किल से ठेकेदारों के पक्ष में भेजी गई सिफारिश अब मंत्रालय तक पहुंच गई है। बड़ा सवाल- क्या नियम अब फाइलों में तय होंगे या ठेकेदारों के दबाव में?
लोक निर्माण विभाग (PWD) रीवा परिक्षेत्र के मुख्य अभियंता कार्यालय से एक पत्र प्रमुख अभियंता को भेजा गया, जिसमें ठेकेदार संघ की मांग को आगे बढ़ाते हुए 10 करोड़ रुपए से कम लागत वाले प्रोजेक्ट्स में भी “प्राइस एस्केलेशन” देने की सिफारिश की गई।
इस पत्र में ईरान-इजरायल युद्ध का हवाला देते हुए कहा गया कि निर्माण सामग्री (लोहा, सीमेंट, गिट्टी, बजरी और ट्रांसपोर्ट) की लागत बढ़ गई है, जिससे पुराने रेट पर काम करना मुश्किल हो रहा है।
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निर्माण सामग्री की कीमतों में उतार-चढ़ाव कोई असामान्य स्थिति नहीं है। यह पहले भी होता रहा है और आगे भी होता रहेगा। फिर हर बार नियमों में ढील देने की सिफारिश क्यों? वह भी बिना किसी राज्यस्तरीय नीति या व्यापक निर्णय के?
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव खुद समीक्षा बैठकों में कह चुके हैं कि प्रदेश में आपूर्ति सामान्य है और घबराने जैसी कोई स्थिति नहीं है। सरकार यह संदेश दे रही है कि महंगाई नियंत्रण में है।
लेकिन उसी सरकार के अधीन PWD का एक सर्किल ठेकेदारों को अतिरिक्त लाभ देने की वकालत कर रहा है- यह सीधा विरोधाभास है।
सबसे बड़ा सवाल अधिकार का है। क्या एक क्षेत्रीय मुख्य अभियंता रीवा को इस तरह की सिफारिश करने का अधिकार है? क्योंकि अगर महंगाई का असर है, तो वह पूरे प्रदेश पर है- सिर्फ रीवा सर्किल पर नहीं। ऐसे में फैसला भी नीति स्तर पर होना चाहिए, न कि क्षेत्रीय स्तर पर।
ठेकेदार संघ के पत्र के तुरंत बाद उसी मांग को विभागीय पत्र के जरिए आगे बढ़ाना कई संदेह पैदा करता है। आलोचकों का कहना है कि यह “इंजीनियर-ठेकेदार सेटिंग” का मामला हो सकता है, जहां नियमों को सुविधानुसार मोड़ने की कोशिश हो रही है।
पत्र में NHAI के सर्कुलर का जिक्र कर प्राइस एस्केलेशन का आधार बताया गया है। लेकिन NHAI के नियम सीधे तौर पर राज्य PWD पर लागू नहीं होते। ऐसे में इस तर्क की वैधता भी सवालों में है।
इस पूरे विवादित पत्र को प्रमुख अभियंता KPS राणा ने आगे बढ़ाते हुए PWD मंत्रालय को भेज दिया है, ताकि इस पर निर्णय लिया जा सके। यानी अब यह सिर्फ एक सर्किल का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि सरकार के सामने सीधा नीति से जुड़ा सवाल बन गया है।
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यह मामला सिर्फ एक फाइल नहीं, बल्कि सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल है। जब सरकार महंगाई को नियंत्रित बताती है और विभाग ठेकेदारों को राहत देने की पैरवी करता है, तो पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों कटघरे में आ जाते हैं। अब नजर इस बात पर है कि सरकार नियमों को मजबूत रखती है या दबाव के आगे झुकती है।
क्या है पूरा मामला?
इस पत्र में ईरान-इजरायल युद्ध का हवाला देते हुए कहा गया कि निर्माण सामग्री (लोहा, सीमेंट, गिट्टी, बजरी और ट्रांसपोर्ट) की लागत बढ़ गई है, जिससे पुराने रेट पर काम करना मुश्किल हो रहा है।
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यहां उठता है असली सवाल
सरकार बनाम सिस्टम: दो अलग लाइन
लेकिन उसी सरकार के अधीन PWD का एक सर्किल ठेकेदारों को अतिरिक्त लाभ देने की वकालत कर रहा है- यह सीधा विरोधाभास है।
अधिकार से बाहर जाकर सिफारिश?
मिलीभगत की बू क्यों?
NHAI का हवाला-तर्क या बहाना?
मामला पहुंचा मंत्रालय तक
मुख्य बिंदु (Quick Facts):
- रीवा PWD सर्किल से ठेकेदारों के पक्ष में सिफारिश
- 10 करोड़ से कम प्रोजेक्ट्स में भी प्राइस एस्केलेशन की मांग
- वजह: ईरान-इजरायल युद्ध और बढ़ती निर्माण लागत
- ठेकेदार संघ के पत्र के तुरंत बाद विभागीय कार्रवाई
- CM के “स्थिति सामान्य” बयान से टकराव
- प्रमुख अभियंता KPS राणा ने मामला मंत्रालय भेजा
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नीति बनाम दबाव-अब फैसला सरकार के हाथ में
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