PWD में एक्शन का खेल: जांच पहले, सूचना बाद में… फिर नोटिस देकर फाइल बंद?
भोपाल में PWD ने हालिया जांच के बाद कार्रवाई का दावा किया है, लेकिन अंदरखाने कहानी उलटी नजर आती है। पहले निरीक्षण की भनक मिली, फिर औपचारिक जांच हुई और बाद में नोटिस दिए गए। 35 कामों की जांच में खामियां मिलीं। एक ठेकेदार पर ब्लैकलिस्ट होने का खतरा है। कई इंजीनियरों को नोटिस थमाए गए। बड़ा सवाल यह है कि क्या यह असली कार्रवाई है या सिर्फ दिखावे के लिए?
7 टीमों ने 7 जिलों में 35 निर्माण कार्य जांचे
21 सड़क/पुल, 6 PIU भवन, 7 MPRDC और 1 भवन विकास निगम के काम शामिल थे। पन्ना में सड़क निर्माण बेहद घटिया पाया गया। संबंधित इंजीनियरों को नोटिस दिया गया, ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट करने के निर्देश दिए गए। 31 कामों में सिर्फ "सुधार करो" कहकर मामला सीमित किया गया।
जांच नहीं, पहले से तय स्क्रिप्ट?
विभागीय सिस्टम पर आरोप यही लग रहे हैं कि निरीक्षण अब सरप्राइज नहीं रह गए। मैदान में काम करने वाले पहले से अलर्ट हो जाते हैं, फिर औपचारिक जांच होती है। इस पूरी प्रक्रिया में असली खामियां छिप जाती हैं और जो सामने आता है, वह सिर्फ “मैनेज्ड रियलिटी” होती है।
कार्रवाई का पैटर्न
- PWD विभाग में कार्रवाई का पैटर्न हमेशा एक जैसा रहा है..
- गड़बड़ी मिली।
- नोटिस जारी किए गए।
- सुधार के निर्देश दिए गए।
लेकिन असल में कार्रवाई न के बराबर होती है। कोई सस्पेंशन, ब्लैकलिस्टिंग या रिकवरी का ठोस अमल नहीं होता। इस प्रक्रिया से यह सवाल उठता है कि क्या यह असल में कार्रवाई है या सिर्फ खानापूरी?
इंजीनियरिंग इन चीफ और मंत्री पर सीधा सवाल
बारम्बार खामियां मिलना सिर्फ फील्ड की समस्या नहीं है, यह सीधे तौर पर टॉप लीडरशिप की निगरानी पर सवाल खड़े करता है। इंजीनियरिंग इन चीफ की मॉनिटरिंग कितनी प्रभावी? मंत्री राकेश सिंह की समीक्षा बैठकों का असर कहां है? क्या फैसले सिर्फ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग तक सीमित हैं? अगर सिस्टम सही चलता, तो हर जांच में इतनी खामियां क्यों मिलतीं?
MPRDC की बैठक में भी उठा मुद्दा
हाल ही में MPRDC की वर्चुअल समीक्षा बैठक में यही सवाल गूंजे। गुणवत्ता, मॉनिटरिंग और लंबित सुधार पर चर्चा हुई। लेकिन यह पहली बार नहीं है। हर बैठक में यही मुद्दे उठते हैं, लेकिन फील्ड में बदलाव नहीं दिखता।
पुराने केस: सबक नहीं, सिर्फ फाइल बंद
PWD के इतिहास में ऐसे कई मामले दबाए गए हैं। सतना मेडिकल बिल्डिंग में गुणवत्ता परिषद ने अनियमितता और नुकसान बताया, लेकिन बाद में भवन विकास निगम ने खुद ही क्लीन चिट दे दी।
श्योपुर (हिरनीखेड़ा सड़क): शिकायतें लगातार, कार्रवाई शून्य। इन मामलों में न जिम्मेदारी तय हुई, न सख्त एक्शन।
ग्राउंड रियलिटी: स्टाफ कम, काम ज्यादा।
जिलों की असल स्थिति चिंताजनक है।
एक इंजीनियर कई प्रोजेक्ट संभाल रहा है।
PIU में "इक्का-दुक्का" स्टाफ है।
सब-इंजीनियर भी अतिरिक्त प्रभार में हैं।
ऐसे में गुणवत्ता नियंत्रण सिर्फ कागजी दावा बनकर रह जाता है।
सिस्टम की बड़ी खामियां
PWD में लगातार सामने आ रही समस्याएं।
निरीक्षण से पहले ही सूचना लीक।
नोटिस आधारित कार्रवाई, सख्ती गायब।
शिकायतों पर लीपापोती
दो से चार दिन की सुर्खियों के बाद मामला ठंडा हो जाता है। फील्ड मॉनिटरिंग लगभग नगण्य है। चुनिंदा लोगों पर एक्शन होता है, बाकी बच जाते हैं।
सबसे बड़ा सवाल अगर हर बार
जांच होगी, नोटिस मिलेगा, और मामला खत्म हो जाएगा, तो फिर निर्माण गुणवत्ता कैसे सुधरेगी? सिस्टम को बैठकों से बाहर निकालकर जमीन पर लाना होगा। वरना PWD की “कार्रवाई” सिर्फ खबरों तक सीमित रह जाएगी।
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