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नई दिल्ली। मध्य प्रदेश में ओबीसी आरक्षण को लेकर वर्षों से चल रहा कानूनी विवाद अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गया है। Supreme Court of India ने टिप्पणी की कि यह मामला “पिंग पोंग बॉल” बन गया है और इसे अधिक समय तक लटकाए रखना उचित नहीं है।
लगभग 15 मिनट की सुनवाई, लेकिन बड़ा संदेश
सुप्रीम कोर्ट की बेंच में सुबह करीब 15 मिनट तक बहस चली। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि यह मामला लंबे समय से एक अदालत से दूसरी अदालत में “पिंग पोंग बॉल” की तरह घूम रहा है।
कोर्ट ने माना कि उम्मीदवार वर्षों से इंतजार कर रहे हैं और इस प्रकार की अनिश्चितता न्याय के हित में नहीं है। हालांकि इसके बाद कोर्ट ने से दोपहर में दोबारा सुनवाई की बात की थी लेकिन लंच के पहले यह जानकारी सामने आ गई कि सभी मामले हाईकोर्ट को रिमाइंड कर दिए गए हैं।
हालांकि अनारक्षित वर्ग की ओर से आपत्ति जताई गई कि अलग-अलग प्रकार की याचिकाएं लंबित हैं। चूंकि अंतरिम राहत हाईकोर्ट ने दी थी, इसलिए सर्वोच्च न्यायालय को ही अंतिम सुनवाई करनी चाहिए। इसके बावजूद कोर्ट ने समग्र रूप से सभी मामलों को वापस हाईकोर्ट भेजने का निर्णय लिया।
14% से 27% तक का सफर और 87-13 फॉर्मूला
मध्य प्रदेश में ओबीसी आरक्षण 14% से बढ़ाकर 27% किया गया था। इस बढ़ोतरी के बाद शासन ने 87-13 फीसदी का फॉर्मूला अपनाते हुए 13% पदों को होल्ड पर रख दिया था।
हाईकोर्ट ने पूर्व में 50% आरक्षण सीमा से जुड़े आदेशों के आधार पर 27% आरक्षण पर अंतरिम रोक से संबंधित आदेश पारित किए थे। इसी को लेकर लगातार भर्ती प्रक्रियाएं और नियुक्तियां विवादों में फंसी रहीं। हजारों अभ्यर्थी वर्षों से नियुक्ति और चयन सूची के अंतिम निर्णय का इंतजार कर रहे हैं।
छत्तीसगढ़ केस का हवाला और समानता पर सवाल
सुनवाई के दौरान यह भी मुद्दा उठा था कि मध्य प्रदेश सरकार ने छत्तीसगढ़ के आरक्षण मामलों का हवाला देते हुए प्रकरण सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर कराए थे।
ओबीसी पक्ष के अधिवक्ता वरुण ठाकुर और रामेश्वर ठाकुर के अनुसार छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के मामलों में समानता नहीं है। छत्तीसगढ़ में अनुसूचित जनजाति (ST) आरक्षण में वृद्धि का मामला था, जिसकी वैधानिकता पर वहां के हाईकोर्ट ने निर्णय देते हुए कानून को निरस्त किया था।
वहीं मध्य प्रदेश में मामला ओबीसी आरक्षण को 14% से 27% तक बढ़ाने से जुड़ा है, जिसकी संवैधानिक वैधता पर अभी तक अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।
13% पद अनहोल्ड पर दोनों पक्षों के अलग-अलग मत
सुनवाई के दौरान यह भी स्पष्ट किया गया कि छत्तीसगढ़ मामलों में जस्टिस गवई द्वारा दिए गए अंतरिम आदेश के पैटर्न पर, मध्य प्रदेश सरकार चाहें तो 13% होल्ड किए गए पदों को अनहोल्ड कर सकती है और 27% आरक्षण के अनुसार भर्तियां जारी रख सकती है। जो अंतिम निर्णय के अधीन रहे।
हालांकि इस पर भी मतभेद सामने आए। आरक्षित वर्ग का दावा है कि हाईकोर्ट ने शेष मामलों में कोई पूर्ण रोक नहीं लगाई थी। वहीं अनारक्षित वर्ग का कहना है कि केवल 14% आरक्षण की अनुमति थी, उसके बावजूद 27% लागू कर दिया गया।
अब दो महीने में होगा निर्णायक फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि मध्य प्रदेश हाईकोर्ट दो महीने के भीतर सभी संबंधित याचिकाओं की सुनवाई कर राज्य के कानून की वैधानिकता पर निर्णय दे।
अब नजरें हाईकोर्ट पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि 27% ओबीसी आरक्षण संवैधानिक कसौटी पर खरा उतरता है या नहीं। वर्षों से इंतजार कर रहे अभ्यर्थियों के लिए यह सुनवाई बेहद अहम साबित हो सकती है।
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