जन्म से ही जिंदा रहने की जंग, 100 दिन में जीती, ट्विंस बेबी की कहानी

इंदौर में अक्टूबर 2023 में जन्मे जुड़वा बेबी ( भाई-बहन ) चर्चा में हैं। जन्म से ही शुरू हुई जिंदा रहने के संघर्ष की कहानी हैरान करने वाली है। सिर्फ साढ़े छह महीने में मां के गर्भ से बाहर आए। दोनों बेबी ( twin baby ) इतने छोटे थे कि हथेली में ही उठा लें।

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BP shrivastava
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इंदौर में एक निजी हॉस्पिटल में जन्में जुड़बा बेबी की कहानी आजकल खूब चर्चा में है।

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INDORE. इंदौर में अक्टूबर 2023 में जन्मे जुड़वा बेबी ( भाई-बहन ) चर्चा में हैं। जन्म से ही शुरू हुई जिंदा रहने के संघर्ष की कहानी हैरान करने वाली है। सिर्फ साढ़े छह महीने में मां के गर्भ से बाहर आए। दोनों बेबी ( twin baby ) इतने छोटे और कमजोर थे कि हथेली में ही उठा लें। दोनों का कुल वजन 1730 ग्राम। अंग भी विकसित नहीं। देखकर डॉक्टर भी घबरा गए कि आगे क्या होगा ? लेकिन रोने की आवाज ने डॉक्टर्स को आशा की बड़ी किरण दिखा दी, उन्हें लगा बेबी को बचाया जा सकता है। यहीं से शुरू हुई 100 दिन के संघर्ष की कहानी...

50 दिन तक वेंटिलेटर पर रहे

50 दिन तक दोनों भाई-बहन को वेंटिलेटर पर रखकर सांस देनी पड़ी। मां का दूध कम पड़ जाए तो अस्पताल में भर्ती दूसरी मांओं से आग्रह कर दोनों को दूध पिलवाया। इसके बाद एनआईसीयू में लाए। अंतत: 100 दिन बाद दोनों को डिस्चार्ज कर दिया गया। अब दोनों घर पर हैं। किलकारी से पूरा घर चहक रहा है।

जन्म के समय लड़के का वजन 950 था। जुड़वा बहन का 780 ग्राम। अब यह बढ़कर ढाई किलो और डेढ़ किलो हो गया है।

एक अखबार ने दंपती आनंद-विनीता जैन से बात की। उन्होंने संघर्ष की पूरी कहानी बताई। कहा- तीसरी बार गर्भवती हुई विनीता को साढ़े छह महीने में ही प्रसव पीड़ा हुई थी। 30 अक्टूबर 2023 को प्राइवेट अस्पताल में डिलीवरी कराना पड़ी। जुड़वा बच्चे हुए। इलाज में 25 लाख खर्च हुए। इनकी जिंदगी बचाने के लिए 22 लाख का लोन भी लेना पड़ा।

अबॉर्शन कैटेगरी के इन बच्चों के लिए चुनौतियां

इलाज करने वाले डॉ. मुकेश बिरला ने बताया कि इतने कम वजन के ये बच्चे अबॉर्शन कैटेगरी के थे। जब इन बच्चों ने हरकत की और रोए तब हमें भी उम्मीद बंधी।

पहली चुनौती थी कि इनके फेफड़े पूरी तरह नहीं बने थे।

सांस लेने में परेशानी थी।

आंखें, दिमाग, आंतें सहित अन्य अंग काफी कमजोर थे।

ब्लड प्रेशर और सेचुरेशन भी काफी कम हो गया था। कभी सांस लेते तो काफी समय तक छोड़ देते थे।

95 दिन बच्चों को ऑक्सीजन देनी पड़ी

100 दिनों में से 95 दिन बच्चों को ऑक्सीजन देनी पड़ी।

इतने छोटे बच्चों को सौ दिनों तक एनआईसीयू में ही गर्भ जैसा माहौल देना।

मां को समस्या हुई तो दूसरी माताओं का दूध पिलाया

दूध के लिए दूसरी माताओं की मदद ली

डॉ. मुकेश बिरला के मुताबिक उस दौरान कुछ गायनिक समस्या के चलते इन बच्चों को मां का दूध उतना नहीं मिल पाया। दोनों बच्चों को दूध की पूर्ति नहीं हो पा रही थी। उनकी आंतें इतनी कमजोर थी कि वे कुछ और पचा ही नहीं पाते और तबीयत बिगड़ सकती थी।

बच्चों को दूध पिलाने के लिए दूसरी माताओं ( जिनकी उस दौरान डिलीवरी हुई थी ) की मदद ली गई। दंपती ने इनके नाम विआन और नम: रखे हैं।



साढ़े छह साल पहले हुई थी शादी

आनंद जैन इंदौर की कंपनी में इंजीनियर हैं। उनकी शादी साढ़े छह साल पहले हुई थी। पत्नी पहले जॉब करती थी। दो साल पहले वह गर्भवती हुई थीं, लेकिन पांचवें माह में ही गर्भपात हो गया। उस दौरान भी जुड़वा बच्चे ही हुए थे। इसके बाद से उन्होंने जॉब छोड़ दी। इस बार 30 अक्टूबर को डिलीवरी हुई। दंपती बताते हैं कि उन्हें इस बात का अहसास नहीं था कि इस बार डिलीवरी के बाद में बच्चों को ऐसी तकलीफों का सामना करना पड़ेगा।

पूरे इलाज में ही करीब 25 लाख रुपए लग गए। अस्पताल का बिल चुकाने के लिए 22 लाख रुपए बैंक लोन लेना पड़ा। मुख्यमंत्री सहायता योजना से 2.40 लाख रुपए भी मिले।

बच्चों के लिए पूरे तीन माह की ली छुट्‌टी, कंपनी का सहयोग

जैन ने बताया कि इस दौरान हम लगभग पूरे समय हॉस्पिटल में रहे। चूंकि बच्चों के इलाज के लिए समय के साथ पैसों का इंतजाम भी करना था, इसलिए वे तीन माह पर अवकाश पर रहे। कंपनी की ओर से 14 हफ्तों की मेटरनिटी लीव का प्रावधान है, वह पूरी ली गई। इसके अलावा साथियों की भी सहानुभूति रही।  माता-पिता और दोनों भाइयों के परिवार ने काफी हिम्मत दी।

डॉक्टरों ने हमें कहा कि ये बहुत ही छोटे और कम वजन के हैं। बच्चों की ऐसी स्थिति तब होती है जब किसी कारण से गर्भपात हुआ हो। ऐसी स्थिति में अंग पूरी तरह विकसित नहीं होते हैं। अंग इतने छोटे थे कि इन्हें सांस लेने, फीडिंग सहित कई समस्याएं आईं। इसके बावजूद रिस्क लेकर इलाज कर दोनों को नया जीवन मिल गया है।

गार्ड से लेकर डॉक्टर तक की मेहनत रंग लाई

इस केस में डॉ. पराग गांधी, डॉ. अनिल प्रसाद, डॉ. अरुण भार्गव, डॉ. योगिता परिहार, डॉ. शुभांगी निरखीवाला सहित पूरी टीम यहां तक कि गार्ड की भी भूमिका अहम रही। डॉ. बिरला ने बताया कि स्टाफ तो बच्चों की तबीयत बिगड़ने पर आधी रात को फोन कर डॉक्टरों को बुलवा लेते थे। गार्ड की भूमिका भी इसलिए अहम है क्योंकि जब भी दूध की जरूरत पड़ी तो उन्हें अन्य माताओं से दूध मंगवाने के लिए आधी रात को भेजा गया और व्यवस्था की गई। डॉ. बिरला के मुताबिक मेरे 30 साल के सेवाकाल में यह पहला मौका है जब 100 दिनों तक किसी न्यू बोर्न बेबी को आईसीयू में रखा गया।

 

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