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Photograph: (the sootr)
News In Short
- राजस्थान विधानसभा ने पारित राजस्थान जन विश्वास संशोधन विधेयक।
- कांग्रेस का आरोप, संशोधन विधेयक पारित हुआ तो नौकरशाह होंगे निरंकुश।
- कांग्रेस ने की बिल को जनमत जानने और पुनर्विचार के लिए भेजने की मांग।
- अब वन अधिनियम सहित 11 कानून में सजा खत्म, केवल जुर्माने का प्रावधान।
- कांग्रेस विधायक के बोलने के दौरान रोकने की घंटी बजाने पर गर्मागर्मी
News In Detail
Jaipur: राजस्थान विधानसभा में गुरुवार को 'राजस्थान जन विश्वास उपबंध (संशोधन) विधेयक' पर चर्चा के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस देखने को मिली। कांग्रेस ने इस बिल को जनविरोधी और नौकरशाही को निरंकुश बनाने वाला करार देते हुए इसे जनमत जानने के लिए भेजने की मांग की। पीसीसी चीफ गोविंद सिंह डोटासरा ने सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि कोर्ट की शक्ति कम करके अफसरों को बेलगाम किया जा रहा है। हंगामे के बीच यह विधेयक पारित कर दिया गया।
​11 कानूनों से सजा का प्रावधान खत्म
सरकार द्वारा पेश इस संशोधन विधेयक के तहत राजस्थान वन अधिनियम सहित 11 विभिन्न कानूनों में बदलाव का प्रस्ताव है। सबसे बड़ा विवाद इस बात पर है कि इन कानूनों के तहत अब अदालती सजा के प्रावधान को खत्म कर केवल जुर्माने का प्रावधान रखा गया है।
विपक्ष का तर्क है कि अब तक लोगों में कोर्ट और जेल जाने का जो डर था, वह खत्म हो जाएगा। कांग्रेस विधायक डूंगर राम गेदर ने आरोप लगाया कि यह बिल चंद उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने के लिए लाया गया है, जिससे वे जुर्माना भरकर पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर सकें।
​डोटासरा बोले, चरवाहा कहां से लाएगा 25 हजार
कांग्रेस के गोविंद सिंह डोटासरा ने बिल की विसंगतियों को उजागर करते हुए कहा कि जुर्माने की राशि अव्यावहारिक रूप से बढ़ा दी गई है। धारा 6 में संशोधन कर जुर्माने की राशि इतनी बढ़ा दी गई है कि यदि किसी गरीब चरवाहे के मवेशी दूसरी जमीन पर चरते हैं, तो उस पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगेगा। डोटासरा ने तंज कसा, एक गरीब चरवाहा साल भर में इतना नहीं कमाता, वह यह जुर्माना कहां से देगा। 1956 के इस कानून में जुर्माने को 5 हजार से सीधे 50 हजार रुपये कर दिया गया है।
डोटासरा ने कहा कि सजा का डर उद्योगपतियों को अनुशासन में रखता था। अब उनके लिए 25-50 हजार का जुर्माना कोई मायने नहीं रखता, वे पर्यावरण को नुकसान पहुंचाएंगे और जुर्माना देकर छूट जाएंगे।
नौकरशाही बनेगी निरंकुश, कोर्ट का दरवाजा बंद
विपक्ष का आरोप है कि न्यायिक प्रक्रिया को हटाकर अधिकारियों को जुर्माना वसूलने की शक्ति देना लोकतंत्र के लिए खतरा है। डोटासरा ने सदन में कहा, अगर देश में कोर्ट नहीं होंगे तो सब निरंकुश हो जाएंगे। जनता को उम्मीद होती है कि गलत होने पर कोर्ट न्याय देगा, लेकिन सरकार अब सारा पावर अफसरों की जेब में डाल रही है।
​विधायक डूंगर राम गेदर ने मुख्यमंत्री के पुराने वादों की याद दिलाते हुए कहा कि एक तरफ सरकार 'मां के नाम एक पेड़' अभियान चला रही है, वहीं दूसरी तरफ वन माफियाओं को रास्ता देने के लिए कानून बदल रही है। उन्होंने कहा कि सौर ऊर्जा प्लांट लगाने वाले बड़े घराने अब बिना किसी अदालती डर के पेड़ काट सकेंगे, क्योंकि उनके लिए जुर्माना देना 'लाइसेंस' लेने जैसा होगा।
सभापति और डोटासरा के बीच बहस
​चर्चा के दौरान माहौल तब और गरमा गया जब डोटासरा के बोलने के दौरान समय सीमा को लेकर सभापति ने घंटी बजाई। इस पर डोटासरा और विपक्षी विधायकों ने कड़ी आपत्ति जताई। विपक्ष का कहना था कि इतने महत्वपूर्ण बिल पर चर्चा के दौरान उनकी आवाज को दबाया जा रहा है।
कांग्रेस ने एक सुर में इस बिल को पुनर्विचार और जनमत के लिए भेजने की मांग की। विपक्ष का स्पष्ट मानना है कि ​जुर्माने की राशि को तर्कसंगत बनाया जाए। ​गंभीर मामलों में जेल/सजा का प्रावधान बना रहना चाहिए ताकि कानून का इकबाल कायम रहे। ​न्यायिक हस्तक्षेप को खत्म करना आम आदमी के अधिकारों का हनन है।
चुनाव में संतान संबंधी बाध्यता खत्म का बिल पारित
विधानसभा ने पंचायत और नगरीय निकाय चुनाव लड़ने के लिए दो संतान होने की बाध्यता को हटाने संबंधित विधेयक को भी पारित कर दिया। अब चुनाव लड़ने के लिए संतान संबंधित बाध्यता नहीं रहेगी। वर्ष 1995 में भाजपा के दिग्गज नेता भैरोसिंह शेखावत के सीएम कार्यकाल में यह कानून बनाया गया था कि जिनके दो से अधिक संतान होंगी, वे पंचायत और निकाय चुनाव नहीं लड़ पाएंगे। अब यह बाध्यता खत्म हो जाएगी।
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