129 बीघा सरकारी जमीन वक्फ के नाम, जजों के बंगले-गीता भवन-स्कूल-कॉलेज शामिल
समझें क्या है पूरा मामला
- जोधपुर में 129 बीघा सरकारी भूमि वक्फ बोर्ड के नाम दर्ज
- दर्ज भूमि में जजों के बंगले-गीता भवन-स्कूल-कॉलेज शामिल
- 250 साल पुराना तुंवरजी का झालरा भी ताजिया के नाम से दर्ज
- उम्मीद पोर्टल पर बिना मुतवल्ली के अपलोड हुई संपत्तियां
- वक्फ सीईओ बोले- गीता भवन शामिल, कलेक्टर से मांगा रिकॉर्ड
राजस्थान के जोधपुर शहर में वक्फ बोर्ड की कार्यप्रणाली और प्रविष्टियों (Entries) पर एक बहुत बड़ा खुलासा हुआ है। शहर की सरकारी जमीन को उम्मीद पोर्टल पर वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज कर दिया गया है।
इसमें प्रमुख धार्मिक केंद्र गीता भवन, सोहनलाल मनिहार स्कूल, शाह गोवर्धन काबरा कॉलेज, दो उच्च न्यायालय के जजों के बंगलों, 4 प्रसिद्ध मंदिरों और 2 न्याति भवनों सहित एक घनी आबादी वाले आवासीय व व्यावसायिक क्षेत्र की 129 बीघा जमीन शामिल है।
मामला ग्राम जोधपुर के खसरा नंबर 482, 485 और 490 से जुड़ा है। राजस्व विभाग की जमाबंदी में यह जमीन जोधपुर नगर निगम के नाम दर्ज है, लेकिन वक्फ के 1965 के गजट और आधुनिक डिजिटल डेटाबेस में इसे वक्फ संपत्ति बताया गया है।
ऐतिहासिक धरोहर तुंवरजी का झालरा भी वक्फ सूची में
चौंकाने वाली बात यह है कि जोधपुर के महाराजा अभय सिंह राठौर के शासनकाल में (लगभग 250 साल पूर्व) निर्मित प्रसिद्ध ऐतिहासिक जल स्रोत तुंवरजी का झालरा भी 1965 के वक्फ गजट में झालरा फॉर ताजिया के नाम से दर्ज कर दिया गया।
इस प्रविष्टि का खुलासा 61 साल बाद हुआ है, जिससे प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है।
खसरा नंबर 490 और वीआईपी संपत्तियां
राजस्व रिकॉर्ड के अनुसार, खसरा नंबर 490 की 36.01 बीघा जमीन का नामांतरण 12 मार्च 2016 को नगर निगम के नाम हुआ था।
हालांकि, कागजों में किस्म कब्रिस्तान दर्ज होने के कारण इस खसरे में स्थित जस्टिस विनीत माथुर व पूर्व जस्टिस प्रकाश टाटिया के सरकारी बंगले, गीता भवन, काबरा मातुश्री कला मंदिर, अग्रवालों की बगीची, अग्रवाल महावीर मंदिर, सतगुरु कबीर आश्रम और गीतेश्वर महादेव मंदिर को वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज कर दिया गया।
इसी तरह खसरा नंबर 482 (37.06 बीघा) और 485 (74.11 बीघा) में भी मारू लोहार सिकलीगरों का मंदिर और जीनगर न्याति बगीची स्थित हैं, जिन्हें वक्फ सूची में चढ़ा दिया गया है।
तीन स्तरों पर हुई बड़ी चूक
दस्तावेजों और प्रक्रियाओं की पड़ताल से पता चलता है कि डाटा अपलोड करने में तीन स्तरों पर अनदेखी की गई:
मेकर की अनुपस्थिति: नियमों के मुताबिक वक्फ संपत्ति के प्रबंधन के लिए मेकर (मुतवल्ली) आवश्यक होता है, लेकिन बिना मुतवल्ली ही एंट्री की गई।
चेकर का खेल: वक्फ कार्यालय प्रभारी को चेकर बनाया गया था। डाटा अपलोडिंग का कार्य जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी कार्यालय के बजाय एक निजी सोसायटी के परिसर में बैठकर किया गया।
लापरवाह अप्रूवल: बोर्ड स्तर पर बिना प्राथमिक राजस्व रिकॉर्ड (जमाबंदी) की पड़ताल किए 595 में से 571 संपत्तियों को अप्रूव कर दिया गया।
वक्फ बोर्ड का पक्ष
इस पूरे मामले पर वक्फ बोर्ड के सीईओ अबु सूफियान ने स्वीकार किया कि गीता भवन सहित कई संपत्तियां 1965 के गजट में ही शामिल कर ली गई थीं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि जोधपुर कलेक्ट्रेट से 1928 और 1956 के पुराने राजस्व रिकॉर्ड मांगे गए हैं। यदि इन भूखंडों पर किसी की निजी खातेदारी दर्ज पाई जाती है, तो वक्फ दावे को रिजेक्ट किया जाएगा, हालांकि सरकारी किस्म कब्रिस्तान होने के कारण विधिक जांच के बाद ही अंतिम फैसला लिया जाएगा।
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