पंचायत चुनावों से पहले भाजपा सरकार बांटेगी सियासी रेवड़ियां?
समझें क्या है पूरा मामला
- चुनाव नजदीक आते ही बोर्ड-आयोगों में राजनीतिक नियुक्तियों की सुगबुगाहट तेज।
- लोकायुक्त सहित कई महत्वपूर्ण आयोगों और संस्थाओं के शीर्ष पद अभी भी रिक्त।
- बीस सूत्री कार्यक्रम और खादी बोर्ड जैसे तीन अहम पदों पर सबकी नजरें।
- चुनावी समर से पहले नियुक्तियों के जरिए सियासी और सामाजिक संतुलन साधेगी सरकार।
राजस्थान में पंचायत और निकाय चुनाव के आगाज के साथ ही सियासी हलचल तेज होने लगी हैं। ढाई साल से लंबित राजनीतिक नियुक्तियों की चर्चाएं तेज हो गई हैं। निगम, बोर्ड, आयोग और विभिन्न संस्थानों में खाली पड़े अध्यक्षों और सदस्यों के पदों को भरने की चर्चाएं शुरू हो गई है।
राजस्थान में भजनलाल सरकार बने हुए ढाई साल से ज्यादा का समय हो गया है। लेकिन अब तक अधिकांश बोर्ड, निगम, आयोग और अन्य संस्थानों में खाली पद पर नियुक्तियां नहीं हुई हैं। अब पंचायत और निकाय चुनाव का आगाज होते ही सियासी हलचल तेज होने लगी है।
भाजपा के सत्ता में आने के बाद से ही संगठन से जुड़े कार्यकर्ता राजनीतिक नियुक्तियों का इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि सरकार चुनावी तैयारियों के साथ इन नियुक्तियों के जरिए पार्टी के निष्ठावान कार्यकर्ताओं को राजनीतिक नियुक्तियों से नवाज सकती है।
लोकायुक्त सहित कई प्रमुख आयोग में नियुक्त्यिों का इंतजार
राजस्थान में लोकायुक्त सहित करीब नौ प्रमुख आयोगों और संस्थाओं के पद खाली हैं। इससे पहले भी ऐसी स्थिति उत्पन्न होने पर राजस्थान हाई कोर्ट को दखल देना पड़ा था। कोर्ट का मानना था कि बोर्ड व निगम सरकार की प्रशासनिक रुप से मदद करते हैं। लंबे समय तक इन्हें खाली रखने से आमजन का नुकसान होता है।
इिसंबर 2023 में भाजपा सरकार के गठन के बाद से राजनीतिक नियुक्तियों को लेकर चर्चाएं होती रही हैं। लेकिन बोर्ड-आयोगों में बड़े पैमाने पर नियुक्तियां अब तक नहीं हो सकी हैं।
भजनलाल सरकार का आधा कार्यकाल खत्म हो चुका है। ऐसे में पार्टी के भीतर यह सवाल भी उठता रहा है कि लंबे समय से संगठन के लिए काम कर रहे कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी कब मिलेगी।
तीन पद पर रहती है बडे नेताओं की नजर
राजनीतिक नियुक्तियां सत्ता और संगठन के बीच समन्वय का महत्वपूर्ण माध्यम मानी जाती हैं। सरकार के पास ऐसे पदों के जरिए पार्टी के वरिष्ठ नेताओं, पूर्व जनप्रतिनिधियों और लंबे समय से संगठन में सक्रिय कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी देने का मौका होता है।
इन नियुक्तियों का प्रभाव संगठन कार्यकर्ताओं के मनोबल और आगामी चुनावों की तैयारियों पर भी होता है। सरकार के पास ऐसे तीन महत्वपूर्ण पद हैं जिन पर अधिकांश बड़े नेताओं की नजर रहती है। फिर चाहे सरकार कांग्रेस की हो या भाजपा की।
इनमें बीस सूत्री कार्यक्रम एवं समन्वय समिति, राजस्थान खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड तथा राजस्थान स्टेट एग्रो इंडस्ट्रीज डेवलपमेंट बोर्ड शामिल हैं। इन पदों पर होने वाली नियुक्तियां राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।
यदि सरकार आगामी चुनावों से पहले इन पदों के साथ अन्य बोर्ड और आयोगों में नियुक्तियां करती है तो इससे भाजपा के भीतर लंबे समय से चल रही राजनीतिक नियुक्तियों की प्रतीक्षा खत्म हो सकती है।
कांग्रेस ने अंतिम समय में की थी नियुक्तियां
पिछली कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में बोर्ड, आयोग और अकादमियों में 100 से अधिक राजनीतिक नियुक्तियां हुई थीं। इनमें चार नेताओं को कैबिनेट मंत्री और 31 से अधिक नेताओं को राज्यमंत्री का दर्जा दिया था।
इनमें से कई नियुक्तियां विधानसभा चुनाव से ठीक पहले हुई थीं। अब भाजपा सरकार के सामने भी राजनीतिक नियुक्तियों को लेकर यही चुनौती है कि वह इन पदों को कब तक भरती है। पंचायत और निकाय चुनाव से पहले नियुक्तियां होने से सत्ताधारी दल को चुनावी फायदा होने के रुप में देखा जाता है।
जानिए कहां नियुक्तियां हुई और कहां होना है बाकी
राजस्थान में भाजपा सरकार बनने के बाद अब तक राजस्थान धरोहर संरक्षण प्राधिकरण, किसान आयोग, राज्य जीव-जन्तु कल्याण बोर्ड, सैनिक कल्याण सलाहकार समिति, अनुसूचित जाति वित्त और विकास आयोग, देवनारायण बोर्ड, श्रीयादे माटी कला बोर्ड, विश्वकर्मा कौशल विकास बोर्ड और राज्य वित्त आयोग में नियुक्तियां की जा चुकी हैं।
इसके अलावा आरपीएससी और राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड जैसे महत्वपूर्ण संस्थानों में भी नियुक्तियां हुई हैं। इसके बावजूद कई बोर्ड, निगम, आयोग और अकादमियों में अध्यक्ष और सदस्यों के पद अभी भी खाली हैं। अब सरकार के सामने इन पदों को भरने के साथ ही राजनीतिक और सामाजिक संतुलन साधने की चुनौती भी होगी।
सरकार देगी सियासी संदेश
पंचायत और निकाय चुनाव आगामी राजनीतिक गतिविधियों के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। राजनीतिक नियुक्तियों को केवल खाली पद भरने की कवायद के तौर पर नहीं देखा जाएगा। भाजपा के लिए सक्रिय नेताओं और कार्यकर्ताओं को जिम्मेदारी देने का मौका होगा।
आधा कार्यकाल निकलने के बावजूद नियुक्तियां होने से सियासी संदेश जाएगा। इससे लंबे समय से इंतजार कर रहे कार्यकर्ताओं को सरकार में भागीदारी मिलेगी। चुनाव से पहले पार्टी संगठन को स्थानीय स्तर पर मजबूत करने में मदद मिल सकती है। सरकार बोर्ड-आयोगों के जरिए अलग-अलग सामाजिक वर्गों और क्षेत्रों के प्रतिनिधित्व का संतुलन साध सकती है।
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