बच्चों को गिरवी रखने का भयावह सच : 20,000 रुपए में बंधुआ बनते हैं बच्चे, होता है शोषण
राजस्थान के उदयपुर और उसके आस-पास के आदिवासी अंचल में एक भयावह कुचक्र चल रहा है, जिसमें गरीब परिवार अपने बच्चों को गिरवी रखते हैं। 8 से 12 साल के बच्चों को 20,000-25,000 रुपए में गड़रियों (चरवाहों) के पास एक साल के लिए गिरवी रखा जाता है।
वहीं अधिकतम 40-45 हजार रुपए में बच्चे बेचे भी जा रहे हैं। इससे बच्चे न केवल शोषण का शिकार होते हैं, बल्कि उन्हें प्रतिदिन 30-35 किलोमीटर तक पैदल भेड़ों के रेवड़ के साथ चलाया जाता है। न ही उन्हें भरपूर खाना मिलता है और न ही आराम। इस मामले पर दैनिक राजस्थान पत्रिका में पत्रकार मोहम्मद इलियास की रिपोर्ट भी प्रकाशित हुई है।
बच्चों को गिरवी रखने का कुचक्र
गड़रिये बच्चों को गिरवी रखने के बाद उन्हें बंधुआ बाल श्रमिक बना कर शोषण करते हैं। यह बच्चों का शारीरिक और मानसिक शोषण है। बच्चों के पास कोई अधिकार नहीं होते और उनका शोषण किया जाता है। अगर बच्चे बीमार हो जाते हैं, तो उन्हें वही छोड़ दिया जाता है। नाबालिगों से बंधुआ मजदूरी का यह कुचक्र चिंताजनक है।
बंधुआ श्रमिकों को छुड़ाने के प्रयास
मध्यप्रदेश की इंदौर पुलिस और एक स्थानीय संस्था ने हाल ही में गड़रियों से आठ बच्चों को छुड़वाया। ये बच्चे उदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़ और सिरोही जैसे क्षेत्रों के थे। बच्चों को छुड़वाने के बाद, उन्हें सीडब्ल्यूसी (Child Welfare Committee) के समक्ष पेश किया गया और उनके माता-पिता को पाबंद कर उन्हें सुपुर्द किया गया।
इसके अलावा, गुजरात से दो बच्चों को छुड़वाया गया और हाल ही में दो और बच्चों को प्रतापगढ़ और सलूम्बर क्षेत्र से मुक्त किया गया। इन बच्चों को पुनर्वास और सरकारी सहायता प्रदान की गई।
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मुक्ति प्रमाण पत्र और पुनर्वास
जब बच्चों को बंधुआ मजदूरी से मुक्त किया जाता है, तो एडीएम (Additional District Magistrate) से मुक्ति प्रमाण पत्र लिया जाता है। यह प्रमाण पत्र बच्चों को बंधुआ श्रमिक के रूप में मुक्त घोषित करता है और उन्हें सरकारी सहायता प्राप्त करने का अधिकार देता है। इस प्रक्रिया के बाद, बच्चों को सरकार से 30,000 रुपए तक की अंतरिम राहत मिलती है और पुनर्वास के लिए 2.70 लाख रुपए तक की अतिरिक्त सहायता भी दी जाती है।
गड़रिये रखते हैं बच्चों को गिरवी
गड़रिये बच्चों को गिरवी रखने के लिए परिजनों से एडवांस राशि देते हैं। इसके बाद स्थानीय आदिवासी बिचौलिए कमीशन लेते हैं। इस प्रक्रिया को आदिवासी समुदाय में आम बोलचाल में "हाली" भी कहा जाता है।
- 1 साल के लिए बच्चों को 20,000-25,000 में रखा जाता है।
- बच्चों की आयु: 8-12 साल के बीच।
- बच्चों को रोजाना 30-35 किलोमीटर पैदल चलाया जाता है।
- प्रभावित जिले: पाली, उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़।
कड़े कदम उठाने की आवश्यकता
बच्चों के इस शोषण को रोकने के लिए सख्त कानूनी कदम उठाने की आवश्यकता है। यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि ऐसे कृत्य करने वालों को कड़ी सजा मिले, ताकि यह कुप्रथा समाप्त हो सके और बच्चों का बचपन सुरक्षित रहे। सरकार और पुलिस को इस मुद्दे पर और गंभीरता से काम करने की जरूरत है।
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FAQ
- 1. बंधुआ श्रमिकों को छुड़ाने के लिए कौन से कदम उठाए गए हैं?
पुलिस और अन्य संस्थाओं ने बंधुआ श्रमिकों को छुड़वाने के लिए कई प्रयास किए हैं। बच्चों को सीडब्ल्यूसी (Child Welfare Committee) के पास पेश किया गया और उनके माता-पिता को पाबंद कर उन्हें पुनर्वास के लिए भेजा गया। - 2. बंधुआ मजदूरी से मुक्त बच्चों को क्या मदद मिलती है?
बच्चों को बंधुआ मजदूरी से मुक्त करने के बाद, उन्हें मुक्ति प्रमाण पत्र दिया जाता है, जिससे वे सरकारी सहायता प्राप्त कर सकते हैं। उन्हें 30,000 रुपए की अंतरिम राहत और पुनर्वास के लिए 2.70 लाख रुपए तक की मदद दी जाती है। - 3. इसको रोकने के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए?
इसको रोकने के लिए सख्त कानूनी कार्रवाई की आवश्यकता है। बच्चों के शोषण करने वालों को कड़ी सजा मिलनी चाहिए और इस संबंध में लोगों में जागरूकता फैलानी चाहिए।