सुलह हमारी रगों में, सीजेआई सूर्यकांत ने बताया मिडिएशन का सांस्कृतिक महत्व

Mukesh Sharma | Aug 01, 2026, 15:55 IST
सीजेआई सूर्यकांत
राजस्थान के जयपुर में सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि मध्यस्थता भारतीय सभ्यता का अभिन्न अंग है। कौटिल्य के साम सिद्धांत और महात्मा गांधी के अनुभवों का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि आपसी बातचीत से ही विवाद सुलझाना बेहतर विकल्प होता है।

समझें क्या है पूरा मामला

  • सीजेआई सूर्यकांत ने मिडिएशन को बताया भारतीय संस्कृति का हिस्सा
  • जयपुर में कॉमनवेल्थ मिडिएशन सेमिनार में बोले सीजेआई
  • संतरे की कहानी से समझाया समझौते का महत्व
  • गांधी के अनुभवों का दिया मध्यस्थता से जुड़ा उदाहरण
  • कौटिल्य के साम सिद्धांत को बताया सुलह का आधार

सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि समझौते व मिडिएशन के जरिए आपसी विवाद सुलझाना हमारे सथ्यता की जड़ों में है। महात्मा गांधी ने भी अपने वकालत जीवन का सबसे संतोषजनक अनुभव दो पक्षों के बीच आपसी समझौते में मददगार बनने को बताया था। मिडिएशन कानून बनने से पहले भी मिडिएशन हमारी रगों में दौड़ता रहा है। सीजेआई जयपुर में कॉमनवेल्थ देशों की मिडिएशन सेमिनार के दूसरे दिन के सेशन में बोल रहे थे।



सीजेआई सूर्यकांत ने दो बहनों के बीच संतरे की लड़ाई की कहानी के जरिए आपसी समझौते से विवाद निपटाने का महत्व बताया। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि दो बहनों और संतरे की कहानी को कई बार दोहराया जा चुका है। दो बहनें एक संतरे के लिए आपस में लड़ रही थीं। दोनों ही खुद को उस संतरे का असली हकदार बता रही थीं। दोनों अपनी-अपनी बात पर अड़ी हुई थीं। बड़ी बहन खुद के उम्र में बड़ी होने का तर्क देते हुए खुद को संतरे का असली हकदार बता रही थी। छोटी बहन का तर्क था कि वो छोटी है, इसलिए संतरे की ज़्यादा हकदार है। काफी देर तक बहस चलती रही लेकिन कोई नतीजा नहीं निकल रहा था क्योंकि दोनों जिद पर अड़ी थी।



लंबी बहस के बाद भी बहस का समाधान नहीं निकलने पर दोनों ने आखिरकार समझौता करने का फैसला किया और संतरे को बीच से आधा-आधा काट दिया। दोनों बहनें आधा-आधा संतरा लेकर चली गईं। आधा संतरा हाथ में आने के बाद पहली बहन ने उसे छीला और छिलका फेंक दिया, अंदर का फल खा लिया। दूसरी बहन ने अपने हिस्से के आधे संतरे को छीलकर अंदर का फल फेंक दिया और उसके छिलके से केक बनाया।



सीजेआई ने कहा इन दोनों बहनों ने जिद छोड़ एक दूसरे की ज़रूरत को समझा होता और आपस में बातचीत की होती तो दोनों को बिल्कुल वही मिलता जो वे चाहती थीं। जिस बहन को फल खाना था, उसे आधा नहीं बल्कि पूरा संतरा खाने को मिलता। जिस बहन को केक बनाना था उसे पूरे संतरे का छिलका मिल जाता। असली जिंदगी में भी मिडिएशन के बिना इसी तरह बातचीत अधूरी रह जाती है।



मध्यस्थता वेदों और भारतीय इतिहास में मौजूद

सीजेआई ने कहा मिडिएशन आज से नहीं हो रहा है। विवादों को आपसी समझौते से सुलझाने की प्रवृत्ति हमारी सभ्यताओं में गहराई से रची-बसी है। कल उद्घाटन सत्र में यह बहुत ही सही तरीके से बताया था कि मध्यस्थता जो वेदों में और भारत के इतिहास में मौजूद है। रामायण, महाभारत और हमारी पुरानी ऐतिहासिक कहानियां हैं। हर कहानी मध्यस्थता का एक नया आयाम बताती है जिसे मुझे दोहराने की आवश्यकता नहीं है। कल उद्घाटन भाषण में इस पर बहुत सोच-समझकर विचार किया गया था।



कौटिल्य ने कानून के राज के लिए बताए थे चार तरीके

सीजेआई ने कहा कौटिल्य ने कानून के शासन के लिए चार तौर-तरीके बताए थे। यह चार तरीके साम, दाम, दंड और भेद के नाम से जाने जाते है। कौटिल्य ने तय किया कि राजा का अंतिम फैसला चौथा यानी दंड है, तो साम क्या है? साम का अर्थ है समझाना-बुझाना। दाम का अर्थ है प्रोत्साहन या कीमत। दंड का अर्थ है सजा या बल का प्रयोग और भेद का अर्थ है विभाजन या फायदा उठाना। यह राजा के लिए नियम था,राजा के लिए फूट डालो और राज करो का नियम था।



सुलह था सबसे अच्छा विकल्प

सीजेआई ने कहा कौटिल्य इतिहास में मेरे द्वारा पढ़े गए सबसे महान दार्शनिकों में से एक हैं। कौटिल्य जो पहला विकल्प देते हैं वह साम है मतलब समझाना-बुझाना या सुलह। मूल रूप से मध्यस्थता का सिद्धांत उसी दर्शन से आया है। उसी दर्शन ने वास्तव में शासन के संहिताबद्ध सिद्धांतों को तैयार करने का रास्ता साफ किया।



राजा का फैसला अं​तिम होता था

सीजेआई ने कहा कौटिल्य के सैकड़ों साल बाद एक और दर्शन आया जिसने न्यायिक फैसलों के लिए पदानुक्रम तय किया। इस पदानुक्रम में पहले कुल फिर श्रेणी इसके बाद पूग और आखिर में खुद राजा का फैसला था। यहां भी चार सिद्धांत थे। पहला सिद्धांत फिर से एक साथ बैठने और अपने विवादों को आपस में सुलझाने की बात करता है।



समझौते से विवाद सुलझाने संतोषजनक अनुभव

सीजेआई ने कहा कि हम सभी ने महात्मा गांधी के बारे में पढ़ा है। गांधीजी ने भी स्वीकार किया था कि एक वकील के रूप में उनका सबसे संतोषजनक अनुभव दो पक्षों के बीच मध्यस्थता करवाना था। इससे स्पष्ट है कि मध्यस्थता भारत में 2023 में एक कानून का रूप आने से पहले ही हमारे रगों में दौड़ रही है। यह हमारी संस्कृति का एक हिस्सा है। अब न केवल यह हमारी संस्कृति का एक हिस्सा है, बल्कि अब विधायिका और ज्यूडिशिरी ने भी इसमें अहम भूमिका निभाई है।



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