जनजाति छात्रावासों में बड़ा घोटाला, नियमों को ताक पर रख खर्च कर दिए 70 करोड़ रुपए
News In Short
- जनजाति छात्रावासों में खाद्य सामग्री की खरीद में 70 करोड़ रुपए का घोटाला सामने आया।
- वार्डनों ने करोड़ों रुपए खर्च किए, टेंडर प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।
- घी, दाल, आटा और चावल के दामों में भारी फर्जीवाड़ा पाया गया।
- पूर्व मंत्री अर्जुन बामनिया ने इसे बड़ा घोटाला बताते हुए ठोस सबूत पेश किए।
- जांच कमेटी का गठन हुआ, लेकिन अब तक कोई जांच शुरू नहीं हो पाई है।
News In Detail
राजस्थान के जनजाति छात्रावासों में खाद्य सामग्री की खरीद को लेकर बड़ा घोटाला सामने आया है। सरकारी नियमों के अनुसार छात्रावासों में खाद्य सामग्री की खरीद के लिए 10 हजार रुपए की सीमा तय है, लेकिन वार्डनों ने इस सीमा का उल्लंघन करते हुए करोड़ों रुपए खर्च कर डाले। सबसे चौकाने वाली बात यह है कि जुलाई 2025 से मार्च 2026 के बीच करीब 70 करोड़ रुपए खर्च किए गए, लेकिन न तो टेंडर प्रक्रिया अपनाई गई और न ही किसी स्तर पर जांच या सत्यापन हुआ।
376 छात्रावासों में हुई अवैध खरीदारी
प्रदेश के 376 जनजाति छात्रावासों में बड़े पैमाने पर खाद्य सामग्री खरीदी गई है। इससे यह मामला और भी गंभीर हो गया है। सरकार ने पारदर्शिता के लिए बाद में टेंडर प्रक्रिया शुरू की, लेकिन जब टेंडर जारी किए गए तो सिर्फ एक ही फर्म सामने आई। अब उसकी दरों का बाजार दर से मिलान किया जा रहा है। लेकिन सरकारी नियम के अनुसार जब तक टेंडर प्रक्रिया पूरी नहीं होती है तब तक वार्डन ही खाद्य सामग्री की खरीदारी करेंगे।
सामान के दामों में बड़ा अंतर
जब अलग-अलग छात्रावासों से प्राप्त बिलों की तुलना की गई तो भारी गड़बड़ी सामने आईं। उदाहरण के तौर पर घी 500 से 900 रुपए प्रति किलो तक खरीदी गई, जो कि एक बड़ा फर्जीवाड़ा है। दाल, आटा और चावल के दामों में भी बड़ा अंतर पाया गया।
यह मामला विधानसभा तक पहुंचा, जहां विधायक अर्जुन बामनिया ने इसे बड़ा घोटाला बताते हुए ठोस सबूत पेश किए। इसके बाद 17 फरवरी 2026 को 4 सदस्यीय जांच कमेटी बनाई गई, लेकिन हैरानी की बात यह है कि आज तक इस जांच की शुरुआत भी नहीं हो पाई है।
पारदर्शिता की कमी
जनजाति मंत्री बाबूलाल खराड़ी ने बताया कि उपभोक्ता भंडार से सप्लाई न मिलने के कारण वार्डन को खाद्य सामग्री की खरीद वार्डन स्तर पर करनी पड़ी। हालांकि, उन्होंने यह स्वीकार किया कि खरीद नियमों से अधिक हो गई थी। इसका असर यह हुआ कि कुछ भुगतान वित्त विभाग में अटक गए हैं। वर्तमान में नई खरीद के लिए टेंडर प्रक्रिया जारी है। दरों का बाजार से मिलान किया जा रहा है। यह पूरी प्रक्रिया पारदर्शिता की कमी का परिणाम है।
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