भूमाफिया ने बसा दी बस्तियां, अफसर देखते रहे, जानिए चंबल घड़ियाल अभयारण्य का पूरा हाल
Mukesh Sharma | Apr 21, 2026, 17:39 IST
Photograph: (the sootr)
सुप्रीम कोर्ट ने कोटा में चंबल घड़ियाल अभयारण्य को डिनोटिफाइड करने के फैसले पर रोक लगा दी, लेकिन संरक्षित जमीन पर भूमाफिया ने बस्तियां बसा दीं। हालात यह है कि 732 हेक्टेयर क्षेत्र में 40 हजार से ज्यादा मकान बन चुके हैं।
Jaipur: राजस्थान में कोटा के चंबल घडियाल अभयारण्य की संरक्षित जमीन पर घर बसाने वाले हजारों नागरिकों के सपनों पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल ब्रेक लगा दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने दो अप्रैल को चंबल घड़ियाल अभयारण्य की 732 हेक्टेयर क्षेत्र को संरक्षित अभयारण्य क्षेत्र से मुक्त करने की अधिसूचना पर रोक लगा दी है। इस रोक के कारण यहां रहने वालों को जमीन के पट्टे फिलहाल नहीं मिलेंगे।
इस संरक्षित क्षेत्र का अधिकांश हिस्सा पूरी तरह से कंक्रीट हो चुका है। इस इलाके को कंक्रीट में बदलने का काम कोई एक दिन में नहीं, बल्कि भू-माफिया, प्रशासन और नेताओं की मिलीभगत से साल-दर-साल घर बसते गए। यह इलाका एक तरह से शहर का व्यस्त क्षेत्र बन चुका है।
कोटा में किशोरपुरा नाम का एक भीड़-भाड़ से अटे पड़े बाजार और गलियों वाला इलाका है। यह इलाका राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य की सीमा के भीतर आता है। इलाके के लोगों का तर्क है कि हालांकि यह जमीन अभयारण्य के भीतर आती है, लेकिन यहां पूरी तरह से निर्माण हो चुके हैं। उनका दावा है कि यह बस्ती अभयारण्य की 1983 की अधिसूचना से पहले की है। यहां 40,000 से अधिक घर हैं। बरसों पहले ही यह इलाका पूरी तरह से कंक्रीट से अट चुका है, इसलिए घड़ियाल ना तो यहां आते हैं और ना ही रहते हैं।
कोटा के मुख्य वन संरक्षक सुगनाराम जाट के अनुसार 732 हेक्टेयर क्षेत्र को संरक्षित अभयारण्य से बाहर करने का फैसला राष्ट्रीय वन्यजीव बोर्ड (NBWL) की स्थायी समिति की सिफारिशों के आधार पर हुआ था। यह सिफारिश बोर्ड की एक टीम के मौके पर किए गए निरीक्षण के बाद की गई थी।
टीम ने स्वयं देखा था कि उक्त 732 हेक्टेयर क्षेत्र में आवासीय कॉलोनियां और व्यावसायिक निर्माण हो चुके हैं। इसलिए यह इलाका वन्यजीव आवास के रूप में व्यवहार्य नहीं रहा। हालांकि नदी विस्तार, वन भूमि और खुले क्षेत्रों सहित पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों को एनबीएल के निर्देशों के अनुसार अभयारण्य के भीतर ही रखा गया था।
पर्यावरणविदों के अनुसार इस कदम से चंबल पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। कोटा के जेडीबी कन्या महाविद्यालय में वनस्पति विज्ञान के सहायक प्रोफेसर कृष्णेंद्र सिंह नामा कहते हैं कि मौजूदा कॉलोनियों को पट्टे देने के बजाय सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि शेष अभयारण्य क्षेत्र स्पष्ट रूप से सीमांकित हों।
नामा के अनुसार यह कोई साधारण जमीन नहीं है, बल्कि यह एक नाजुक और आपस में जुड़ा हुआ तंत्र है, जो गंभीर रूप से लुप्तप्राय प्रजातियों के लिए है। इसलिए, यदि सरकार ने इसे संरक्षित क्षेत्र से बाहर करने का मन बना लिया है तो इसकी स्पष्ट सीमाएं सुनिश्चित की जाएं और इस क्षेत्र से आगे निर्माण की अनुमति न दी जाए।
राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य 1983 में अधिसूचित हुआ था। यह राजस्थान, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में चंबल नदी के किनारे एक किलोमीटर की संरक्षित पट्टी के रूप में फैला हुआ है।
कोटा बैराज और राजस्थान तकनीकी विश्वविद्यालय के बीच के 732 हेक्टेयर क्षेत्र में शिवपुरा, किशोरपुरा (208.56 हेक्टेयर), सकतपुरा (186.36 हेक्टेयर), नयागांव, गुमानपुरा और रामपुरा जैसे कुछ क्षेत्र शामिल हैं। रेवेन्यू रिकार्ड के अनुसार इनमें से कई गांव कोटा रियासत के दौर में बसे थे।
वर्ष 1983-84 में इलाके में बेहद मामूली निर्माण थे। लेकिन, समय के साथ भू-माफियाओं की प्रशासन और नेताओं के साथ मिलीभगत से यहां मकान और कमर्शियल निर्माण बढ़ते चले गए। नतीजा यह हुआ कि यह इलाका आज बेहद भीड़-भाड़ वाले बाजारों और गलियों से घिरा हुआ है।
स्थानीय निवासियों के अनुसार यहां करीब 40 हजार आवासीय व कमर्शियल निर्माण हो चुके हैं। लेकिन, किसी के पास भी सरकारी पट्टा नहीं है। इस कारण इनको अपने मकान या दुकान के बदले किसी प्रकार का कर्जा नहीं मिलता। बरसों से यहां मकान बनाकर रहने वाले मध्यमवर्गीय परिवारों को आस बंधाई जाती रही है कि उन्हें हर हाल में जमीन के पट्टे दिलाए जाएंगे
राजस्थान सरकार ने 23 दिसंबर, 2025 को एक सर्कुलर जारी किया। इसमें राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल अभयारण्य की सीमाओं में संशोधन किया था। इसके अनुसार आवास वाले 206 खसरा नंबर अब वन विभाग के अधीन नहीं रहेंगे। इस आदेश ने पर्यावरण संबंधी चिंता उत्पन्न हो गईं। पर्यावरणविदों के अनुसार सरकार का यह आदेश चंबल पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित कर सकता है।
दो अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट राजस्थान में अवैध रेत खनन पर स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई कर रही थी। इसी सुनवाई में कोर्ट अधिसूचना पर रोक लगा दी थी। जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बैंच ने कहा कि घडियाल विलुप्त होने के कगार पर हैं। इसलिए यह इलाका बेहद नाजुक है।
स्थानीय निवासियों का दावा है कि इस क्षेत्र में 1983 में संरक्षित घोषित किए जाने के समय और उससे पहले,कभी भी घड़ियालों का आवास नहीं रहा। इनके अनुसार यह इलाका गलती से संरक्षित क्षेत्र घोषित हो गया था।
क्योंकि अधिकारियों ने 1983 में सही तरीके से सर्वेक्षण नहीं किया था और उन्होंने अपने दफ्तरों में बैठकर अधिसूचना जारी कर दी थी। उस समय आमजन को इसके परिणामों के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं थी।
नतीजतन, यहां के निवासी अपने घरों के स्वामित्व का दावा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इनमें वे लोग भी शामिल हैं जिनके पास 1949 से पूर्व के रियासतकालीन पट्टे हैं। इस इलाके को संरक्षित घड़ियाल अभयारण्य से बाहर निकालने का अर्थ यहां कि निवासियों को पट्टे मिलना और जमीन की आसान बिक्री होना है।
पर्यावरणविद सुप्रीम कोर्ट की रोक का सही बता रहे हैं। इनका कहना है कि इस इलाके में अवैध निर्माणों के लिए कोटा विकास प्राधिकरण और नगर निगम जिम्मेदार हैं। इस मुद्दे ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है।
कोटा में चंबल रिवरफ्रंट के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए लोकसभा अध्यक्ष और कोटा-बूंदी सांसद ओम बिरला ने कहा था कि इस इलाके को संरक्षित क्षेत्र से बाहर करने की मांग लंबे समय से हो रही थी। सरकार का यह अच्छा कदम था। कोटा दक्षिण के भाजपा विधायक संदीप शर्मा कहते हैं कि उन्हें अदालत से अनुकूल फैसले की उम्मीद है। फिलहाल, यह मामला काफी पेचीदा हो चुका है।
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इस संरक्षित क्षेत्र का अधिकांश हिस्सा पूरी तरह से कंक्रीट हो चुका है। इस इलाके को कंक्रीट में बदलने का काम कोई एक दिन में नहीं, बल्कि भू-माफिया, प्रशासन और नेताओं की मिलीभगत से साल-दर-साल घर बसते गए। यह इलाका एक तरह से शहर का व्यस्त क्षेत्र बन चुका है।
कोटा का भीड़भाड़ वाला इलाका
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कैसे आएगा घड़ियाल
टीम ने स्वयं देखा था कि उक्त 732 हेक्टेयर क्षेत्र में आवासीय कॉलोनियां और व्यावसायिक निर्माण हो चुके हैं। इसलिए यह इलाका वन्यजीव आवास के रूप में व्यवहार्य नहीं रहा। हालांकि नदी विस्तार, वन भूमि और खुले क्षेत्रों सहित पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों को एनबीएल के निर्देशों के अनुसार अभयारण्य के भीतर ही रखा गया था।
पर्यावरणविद हैं खिलाफ हैं लेकिन
नामा के अनुसार यह कोई साधारण जमीन नहीं है, बल्कि यह एक नाजुक और आपस में जुड़ा हुआ तंत्र है, जो गंभीर रूप से लुप्तप्राय प्रजातियों के लिए है। इसलिए, यदि सरकार ने इसे संरक्षित क्षेत्र से बाहर करने का मन बना लिया है तो इसकी स्पष्ट सीमाएं सुनिश्चित की जाएं और इस क्षेत्र से आगे निर्माण की अनुमति न दी जाए।
तीन राज्यों में फैला है चंबल घड़ियाल अभयारण्य
कोटा बैराज और राजस्थान तकनीकी विश्वविद्यालय के बीच के 732 हेक्टेयर क्षेत्र में शिवपुरा, किशोरपुरा (208.56 हेक्टेयर), सकतपुरा (186.36 हेक्टेयर), नयागांव, गुमानपुरा और रामपुरा जैसे कुछ क्षेत्र शामिल हैं। रेवेन्यू रिकार्ड के अनुसार इनमें से कई गांव कोटा रियासत के दौर में बसे थे।
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भू-माफियाओं ने बसा दी कॉलोनियां
स्थानीय निवासियों के अनुसार यहां करीब 40 हजार आवासीय व कमर्शियल निर्माण हो चुके हैं। लेकिन, किसी के पास भी सरकारी पट्टा नहीं है। इस कारण इनको अपने मकान या दुकान के बदले किसी प्रकार का कर्जा नहीं मिलता। बरसों से यहां मकान बनाकर रहने वाले मध्यमवर्गीय परिवारों को आस बंधाई जाती रही है कि उन्हें हर हाल में जमीन के पट्टे दिलाए जाएंगे
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और वह दिन भी आया जब
दो अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट राजस्थान में अवैध रेत खनन पर स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई कर रही थी। इसी सुनवाई में कोर्ट अधिसूचना पर रोक लगा दी थी। जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बैंच ने कहा कि घडियाल विलुप्त होने के कगार पर हैं। इसलिए यह इलाका बेहद नाजुक है।
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घडियाल यहां कभी रहे ही नहीं
क्योंकि अधिकारियों ने 1983 में सही तरीके से सर्वेक्षण नहीं किया था और उन्होंने अपने दफ्तरों में बैठकर अधिसूचना जारी कर दी थी। उस समय आमजन को इसके परिणामों के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं थी।
अब भटकने को हैं मजबूर
पर्यावरणविद सुप्रीम कोर्ट की रोक का सही बता रहे हैं। इनका कहना है कि इस इलाके में अवैध निर्माणों के लिए कोटा विकास प्राधिकरण और नगर निगम जिम्मेदार हैं। इस मुद्दे ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है।
कोटा में चंबल रिवरफ्रंट के एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए लोकसभा अध्यक्ष और कोटा-बूंदी सांसद ओम बिरला ने कहा था कि इस इलाके को संरक्षित क्षेत्र से बाहर करने की मांग लंबे समय से हो रही थी। सरकार का यह अच्छा कदम था। कोटा दक्षिण के भाजपा विधायक संदीप शर्मा कहते हैं कि उन्हें अदालत से अनुकूल फैसले की उम्मीद है। फिलहाल, यह मामला काफी पेचीदा हो चुका है।
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