बी-2 बाईपास की जमीन से फिलहाल नहीं टूटेंगे मकान, एकलपीठ के आदेश पर रोक
News In Short
- श्रीराम कॉलोनी-बी के विवाद में आवासन मंडल को यथास्थिति बहाल करने का आदेश।
- राजस्थान हाईकोर्ट ने श्रीराम कॉलोनी-बी विकास समिति की अपील पर यह आदेश दिया।
- यह आदेश चीफ जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस शुभा मेहता की खंडपीठ ने दिया।
- एकलपीठ के फैसले के बाद आवासन मंडल ने निर्माण ध्वस्त की प्रक्रिया शुरू कर दी थी।
- हाई कोर्ट के इस बड़े फैसले से इस क्षेत्र में रहने वाले 200 परिवारों को मिली राहत।
News In Detail
Jaipur: राजस्थान हाई कोर्ट की खंडपीठ ने जयपुर शहर में बी-2 बाईपास स्थित 42 बीघा जमीन मामले में एकलपीठ के आदेश पर रोक लगा दी है। इस फैसले सेराजस्थान आवासन मंडल को बड़ा झटका लगा, जिसने एकलपीठ के फैसले के बाद निर्माणों को ध्वस्त करने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी।
अब उसे वहां यथास्थिति बहाल करनी होगी।
यह आदेश राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और न्यायाधीश शुभा मेहता की खंडपीठ ने श्रीराम कॉलोनी-बी विकास समिति की अपील पर दिया है। पूर्व के एकलपीठ के फैसले के तुरंत बाद आवासन मंडल एक्शन मोड में आ गया था। 16 अप्रैल को बुलडोजर लेकर पहुंची मंडल की टीम ने करीब 20 परिवारों के निर्माण ध्वस्त कर दिए थे और जमीन पर कब्जे की प्रक्रिया शुरू कर दी थी। लेकिन अब खंडपीठ के आदेश के बाद मंडल को पीछे हटना होगा और वहां यथास्थिति बनाए रखनी होगी।
क्या है पूरा विवाद?
मामला करीब चार दशक पुराना है। साल 1981 के विक्रय समझौतों के आधार पर श्रीराम कॉलोनी-बी के करीब 200 परिवार यहां बस गए थे। विवाद तब गहराया जब एकलपीठ ने 9 अप्रैल को इस जमीन का मालिकाना हक आवासन मंडल का माना और जेडीए द्वारा 1995 में दी गई योजना स्वीकृति को अवैध करार दे दिया।
अपील में दी गई ये दलीलें
श्रीराम कॉलोनी-बी विकास समिति ने खंडपीठ के सामने मुख्य रूप से तीन बातें रखीं। समिति ने कहा कि जिन मुद्दों पर एकलपीठ ने फैसला दिया, उन्हें सुप्रीम कोर्ट पहले ही तय कर चुका है।
आवासन मंडल ने समिति पर धोखाधड़ी के जो आरोप लगाए थे, उन पर भी पहले निर्णय हो चुका है। चार दशकों से रह रहे परिवारों के आशियानों को अचानक शून्य घोषित करना उनके साथ सरासर अन्याय है।
जब कमिश्नर ने रोक दी थी एनओसी
दिलचस्प बात यह है कि साल 2019 में जेडीए इस कॉलोनी के नियमन के लिए शिविर लगाना चाहता था, लेकिन आवासन मंडल के तत्कालीन आयुक्त पवन अरोड़ा ने एनओसी देने से साफ इनकार कर दिया था। मंडल का तर्क था कि मौके पर 50 प्रतिशत निर्माण नहीं है, इसलिए नियमन नहीं हो सकता। यह मामला इतना बढ़ा कि एसीबी तक पहुंच गया था।
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