गुलाल गोटा जिसे बनाते है मुस्लिम कारीगर, रजवाड़ों की शाही होली होती है इसके बिना अधूरी

राजस्थान में जयपुर की शाही होली की 300 साल पुरानी परंपरा है। इसमें गुलाल गोटा का इस्तेमाल किया जाता है। इसे मुस्लिम कारीगर लाख से तैयार करते है। रजवाड़ों से लेकर आमजन तक आज भी यह परंपरा जीवित है।

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Purshottam Kumar Joshi
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gulal gota jaipur

Photograph: (the sootr)

News in Short 

  • जयपुर में गुलाल गोटे से होली खेलने की 300 साल पुरानी परंपरा जीवित है।

  • गुलाल गोटे लाख से बनते हैं, जो हल्के होते हैं और सुरक्षित होते हैं।

  • सवाई जयसिंह द्वितीय के समय से यह परंपरा शुरू हुई थी।

  • सिटी पैलेस में आज भी गुलाल गोटे से होली खेली जाती है।

  • मुस्लिम कारीगरों द्वारा बनाए गए गुलाल गोटे जयपुर की गंगा-जमुनी तहजीब का प्रतीक हैं।

News in detail

राजस्थान की राजधानी जयपुर की होली देशभर में अपनी खासियत के लिए जानी जाती है। यहां होली केवल रंगों का त्योहार नहीं है, बल्कि यह एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा है। खासकर गुलाल गोटे से होली खेलने की परंपरा 300 साल पुरानी है। यह जयपुर के रजवाड़ों से लेकर आम जनता तक सभी के बीच समान रूप से प्रचलित है। गुलाल गोटे को बनाने का तरीका बहुत ही विशिष्ट है और इसका निर्माण लाख से किया जाता है। यह हल्का होने के बावजूद सुरक्षित होता है।

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Photograph: (the sootr)

गुलाल गोटे की शुरुआत और शाही इतिहास

यह परंपरा सवाई जयसिंह द्वितीय के समय से शुरू हुई थी। उन्होंने जब जयपुर नगर की स्थापना की थी। सवाई जयसिंह ने विभिन्न कारीगरों को जयपुर के मोहल्लों में बसाया था, जिनमें से एक मोहल्ला मनिहारों का था। इन मुस्लिम कारीगरों ने होली पर गुलाल गोटे बनाए, जो सवाई जयसिंह को भेंट किए गए थे। यह परंपरा सवाई जयसिंह द्वितीय के हाथी पर सवार होकर शहर में गुलाल गोटे फेंकने के बाद से शुरू हुई और आज तक जारी है।

jaipur maniharo ka rasta
Photograph: (the sootr)

आज भी शाही परंपरा को जीवित रखे हुए है सिटी पैलेस

आज भी सिटी पैलेस में शाही होली की परंपरा जीवित है। गुलाल गोटे से होली खेलना अब सिर्फ शाही परिवार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह आम आदमी तक भी पहुंच चुका है। पहले यह विशेष रूप से शाही परिवार और उच्च वर्ग के लोग इस्तेमाल करते थे, लेकिन अब यह आम जनता के बीच भी प्रसिद्ध हो गया है।

गुलाल गोटे की कारीगरी और प्रक्रिया

गुलाल गोटे महज 5 ग्राम लाख से तैयार होते हैं। कारीगर इसे हाथ से आकार देते हैं और फिर फूंकनी की मदद से इसमें हवा भरकर गोलाकार बनाते हैं। इसके बाद इसे ठंडा होने के लिए पानी में डाला जाता है। इस पूरी प्रक्रिया के बाद, इसमें अरारोट से बना हर्बल कलर डाला जाता है। इस तरह से तैयार हुए गुलाल गोटे सुरक्षित होते हैं और शरीर पर टकराने के बाद टूटकर रंग छोड़ देते हैं।

रंगों में घुली सौहार्द की मिसाल

गुलाल गोटे केवल एक होली की सामग्री नहीं बल्कि जयपुर की गंगा-जमुनी तहजीब का प्रतीक हैं। मुस्लिम कारीगरों द्वारा बनाए गए गुलाल गोटे, राजघरानों की शाही होली का हिस्सा बनते रहे हैं, जो कला और आपसी भाईचारे का अद्भुत उदाहरण पेश करते हैं। होली के दिन जब जयपुर की हवाओं में गुलाल उड़े होते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे मानव इतिहास रंगों में भीगकर मुस्करा रहा हो।

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