दशहरे पर रावण दहन के बाद शोक मनाता है जोधपुर का यह समुदाय, खुद को मानता है रावण का वंशज
Jyoti Mahender Bhardwaj | Oct 20, 2026, 12:29 IST
दशहरे पर रावण दहन के बाद शोक मनाता है जोधपुर
जोधपुर का दवे गोधा समुदाय दशहरे पर रावण दहन के बजाय शोक मनाकर विशेष पूजा करता है। समुदाय रावण को अपना पूर्वज मानता है और उसकी विद्वता तथा संगीत के ज्ञान का सम्मान करता है। इसकी परंपरा मंडोर में रावण और मंदोदरी के विवाह से जुड़ी स्थानीय मान्यता पर आधारित है।
देशभर में दशहरे पर रावण के पुतले जलाकर बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न मनाया जाता है, लेकिन राजस्थान के जोधपुर में एक ऐसा समुदाय भी है जो इस दिन उत्सव नहीं, बल्कि शोक मनाता है। यह समुदाय रावण को अपना पूर्वज मानता है और उसकी याद में विशेष पूजा-अर्चना करता है। समुदाय की मान्यता है कि रावण केवल रामायण का खलनायक नहीं, बल्कि विद्वान, संगीतकार और वेदों का जानकार भी था। यह जानकारी द टाइम्स ऑफ इंडियाकी 20 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट में दी गई है।
जोधपुर का दवे गोधा समुदाय दशहरे को दूसरे लोगों से अलग तरीके से मनाता है। रावण दहन के बाद समुदाय के पुरुष स्नान करते हैं, अपना जनेऊ बदलते हैं और मंदिर में एकत्र होकर विशेष पूजा करते हैं। इस दौरान रावण की आत्मा की शांति के लिए फूल, मिठाई और भोजन अर्पित किए जाते हैं। समुदाय के लिए यह दिन रावण को याद करने और उसके प्रति श्रद्धा जताने का अवसर है।
दवे गोधा समुदाय खुद को श्रीमाली ब्राह्मणों का एक गोत्र बताता है और अपनी परंपरा में रावण को पूर्वज मानता है। समुदाय के मंदिर के मुख्य पुजारी कमलेश कुमार दवे के अनुसार, वे रावण की पूजा करते हैं और उसके अच्छे गुणों को अपनाने की कोशिश करते हैं। समुदाय की मान्यता आमतौर पर प्रचलित उस छवि से अलग है, जिसमें रावण को केवल बुराई के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
समुदाय के सदस्य रावण को वेदों और पुराणों का ज्ञाता, कुशल शासक और वीणा का माहिर संगीतकार मानते हैं। कमलेश दवे के बेटे अजय दवे का कहना है कि रावण की विद्वता और मंत्रों के ज्ञान के कारण भी उसका सम्मान किया जाता है। उनके लिए रावण की पहचान केवल सीता हरण की घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके ज्ञान और संगीत से भी जुड़ी है।
इस समुदाय की परंपरा जोधपुर के पास स्थित मंडोर से जुड़ी एक स्थानीय मान्यता पर आधारित है। मान्यता के अनुसार, मंदोदरी का विवाह रावण से मंडोर में हुआ था। कहा जाता है कि रावण लंका से बारात लेकर यहां आया था और उसके साथ आए कुछ रिश्तेदार विवाह के बाद यहीं रह गए। समुदाय अपनी उत्पत्ति को उन्हीं लोगों से जोड़ता है। हालांकि, यह समुदाय की पारंपरिक मान्यता है।
जोधपुर में मेहरानगढ़ किले की तलहटी के पास समुदाय का मंदिर स्थित है। इसका निर्माण वर्ष 2008 में हुआ था। मंदिर में रावण और मंदोदरी की मूर्तियां स्थापित हैं। इसके अलावा समुदाय की कुलदेवी मानी जाने वाली खरानना की प्रतिमा भी है। मंदिर बनने से पहले परिवार अपने-अपने घरों में रावण की पूजा करते थे। अब दशहरे के अवसर पर यहां विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, जोधपुर में दवे गोधा समुदाय के करीब 100 परिवार रहते हैं। इनमें ज्यादातर परिवार पुराने शहर के चांदपोल और ब्रह्मपुरी इलाकों में बसे हैं। इस समुदाय के कुछ परिवार फलोदी जिले में भी रहते हैं। पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा के तहत परिवार दशहरे पर रावण की पूजा करते हैं और इसे शोक तथा स्मरण के दिन के रूप में देखते हैं।
मंडोर की पहाड़ियों पर एक स्थान को स्थानीय तौर पर रावण की चंवरी कहा जाता है। समुदाय की मान्यता है कि इसी जगह रावण और मंदोदरी के विवाह की रस्में हुई थीं। मंडोर का ऐतिहासिक महत्व भी रहा है। यह क्षेत्र कभी मारवाड़ की राजधानी था, जहां से बाद में राठौड़ शासकों ने अपनी राजधानी जोधपुर स्थानांतरित की। इस तरह यहां की स्थानीय लोककथाएं और इतिहास समुदाय की परंपरा से जुड़े हुए हैं।
दशहरा जहां देश के अधिकतर हिस्सों में रावण दहन और उत्सव का प्रतीक है, वहीं जोधपुर का दवे गोधा समुदाय इस दिन शोक और पूजा की परंपरा निभाता है। समुदाय के सदस्य रावण के विद्वान और संगीतकार रूप को महत्व देते हैं और उसे अपने पूर्वज के तौर पर याद करते हैं। यह परंपरा दिखाती है कि भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में रामायण से जुड़ी मान्यताएं और सांस्कृतिक परंपराएं अलग-अलग रूपों में आज भी जीवित हैं।
दशहरे पर रावण दहन के बाद होती है विशेष पूजा
खुद को रावण का वंशज मानता है दवे गोधा समुदाय
रावण को विद्वान और महान संगीतकार मानते हैं
रावण और मंदोदरी के विवाह से जुड़ी है मान्यता
मेहरानगढ़ किले के पास बना है रावण का मंदिर
चांदपोल और ब्रह्मपुरी में रहती हैं करीब 100 परिवार
मंडोर की पहाड़ियों से भी जुड़ी है रावण की कहानी
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