भैरू बाबा उत्सव में उमड़ेगी आस्था, जहां जेसीबी और ट्रैक्टर से बन रहा 651 क्विंटल चूरमा

राजस्थान में कोटपूतली के कुहाड़ा गांव में 651 क्विंटल चूरमे की महाप्रसादी तैयार हो रही है। इसे जेसीबी से तैयार किया जा रहा है। यह आयोजन 30 जनवरी को होगा।

author-image
Ashish Bhardwaj
New Update
churam

Photograph: (the sootr)

Listen to this article
0.75x1x1.5x
00:00/ 00:00

News In Detail

  • राजस्थान के कुहाड़ा गांव में 651 क्विंटल चूरमा की महाप्रसादी हो रही  तैयारी
  • यह महाप्रसादी छांपाला भैरू बाबा मंदिर के 30 जनवरी को  मेले में बटेगी ।
  • चूरमा तैयार करने में जेसीबी और ट्रैक्टरों का  किया जा रहा है इस्तेमाल।
  • चूरमा बनाने के लिए इस बार 450 क्विंटल उपले का किया जा रहा उपयोग 
  • भंडारे में लाखों श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना।

News In Detail 

​कोटपूतली. ​राजस्थान की माटी में भक्ति और शक्ति का संगम तो अक्सर देखने को मिलता है, लेकिन कोटपूतली का  कुहाड़ा गांव इस बार अपने विशाल भंडारे का गवाह बनने जा रहा है। दरअसल, यहां पहाड़ी पर बने छांपाला भैरू बाबा मंदिर में 30 जनवरी को सालाना उत्सव है। इसके लिए 651 क्विंटल प्रसादी तैयार हो रही है। प्रसादी में चूरमा बनाने के लिए जिस तरह जेसीबी और ट्रेक्टर का उपयाग हो रहा है। उसकी उसकी चर्चा सोशल मीडिया पर खूब हो रही है।

चूरमा: राजस्थान का पारंपरिक और प्रसिद्ध भोजन 

​'दाल-बाटी-चूरमा' इस विशाल भंडारे का मुख्य आकर्षण है। इस भंडारे की विशालता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यहां 651 क्विंटल प्रसादी तैयार हो रही है। पिछली बार यहां 551 क्विंटल प्रसादी बनी थी। यानी इस बार 100 क्विंटल अधिक प्रसादी बांटी जाएगी। इतनी भारी मात्रा में प्रसादी बनाना किसी चुनौती से कम नहीं है, लेकिन ग्रामीणों का उत्साह और भैरू जी के प्रति अटूट श्रद्धा इस कार्य को मुमकिन बना रही है।

कैसे बना रहे चूरमा 

चूरमा बनाने के लिए इस बार 450 क्विंटल उपले का उपयोग किया गया। करीब 100 मीटर लंबा जगरा लगाया गया हैं। इसमें बाटे (रोट) सेंके गए। इन सेंके गए बाटों को ट्रॉलियों में भरकर थ्रेसर से पीसा गया। फिर, जेसीबी की मदद से चूरमे में मेवा, घी, खांड (बूरा) मिलाया गया। चूरमा और दाल के साथ महाप्रसादी के लिए 80 क्विंटल दूध का दही भी जमाया जाएगा। प्रसादी वितरण के लिए 3 लाख पत्तल और उतने ही दोने मंगवाए गए हैं। पीने के पानी की सुविधा के लिए 25 टैंकर लगाए जाएंगे और चाय के लिए 4 लाख कप भी मंगवाए गए हैं।

चूरमा बनाने में जेसीबी का उपयोग

​इस आयोजन की सबसे रोचक बात यह है कि यहां चूरमा तैयार करने के लिए पारंपरिक बर्तनों या हाथों का नहीं, बल्कि आधुनिक मशीनों का सहारा लिया जा रहा है। चूंकि, चूरमे की मात्रा सैंकड़ों क्विंटल में है, इसलिए इसे मिलाने के लिए जेसीबी और ट्रैक्टरों का उपयोग किया जा रहा है।

परंम्परा और तकनीक की रसोई

​नजारा ऐसा है मानो कोई निर्माण चल रहा हो, लेकिन असल में यह आस्था की वो 'रसोई' है, जहां जेसीबी के विशाल पंजे शुद्ध देसी घी और चीनी को चूरमे में मिलाकर उसे प्रसाद का रूप दे रहे हैं। देखने वाले दंग हैं कि कैसे तकनीक और परंपरा का यह अनूठा मेल एक बड़े लक्ष्य को पूरा कर रहा है। ट्रैक्टरों के माध्यम से बड़े-बड़े कड़ाहों और मिश्रणों को संभाला जा रहा है, जो इस भंडारे को "हाई-टेक ग्रामीण आयोजन" की श्रेणी में खड़ा कर देता है।

​गांव बना 'भक्ति की नगरी'

​30 जनवरी के इस कार्यक्रम के लिए कुहाड़ा गांव को दुल्हन की तरह सजाया गया है। श्री भैरू जी के दरबार में मत्था टेकने के लिए न केवल कोटपूतली, बल्कि आसपास के कई जिलों और हरियाणा-दिल्ली तक से श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है।

भंडारा नहीं, भैरू बाबा का आशीर्वाद

भंडारे की व्यवस्था देख रहे स्वयंसेवकों का कहना है कि यह केवल भोजन नहीं, भैरू बाबा का आशीर्वाद है। 651 क्विंटल चूरमा बनाना हमारे लिए सौभाग्य की बात है। मशीनों का उपयोग इसलिए किया जा रहा है ताकि स्वच्छता बनी रहे और समय पर सभी भक्तों को प्रसादी मिल सके।

​सुरक्षा और व्यवस्था चाक-चौबंद

​उत्सव में पार्किंग, बैठने की व्यवस्था और भीड़ प्रबंधन के लिए विशेष इंतजाम किए गए हैं। दाल की खुशबू और देसी घी के चूरमे की महक पूरे गांव की हवाओं में घुली हुई है। स्थानीय प्रशासन और ग्रामीण तालमेल बिठाकर यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि आने वाले किसी भी श्रद्धालु को असुविधा न हो।

कहां है मंदिर

भैरव जी का मंदिर कोटपूतली-सीकर स्टेट हाईवे पर स्थित है। मंदिर तक पहुंचने के लिए मुख्य सड़क से 2 किलोमीटर अंदर जाना पड़ता है। इसमें 3 भव्य दरवाजों से गुजरना होता है। पहाड़ चढ़ते हुए करीब 116 सीढ़ियां चढ़कर मंदिर परिसर तक पहुंचा जा सकता है। मंदिर परिसर में सवाई भोज, शेड माता और हनुमान जी की मूर्तियां स्थापित हैं।

महाप्रसादी की परंपरा 

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सोनगिरी पोसवाल नामक व्यक्ति भैरव जी के भक्त थे। वह भैरव बाबा की मूर्ति को ग्राम कुहाड़ा में स्थापित करना चाहते थे। इस दौरान भैरव बाबा ने उन्हें सपने में दर्शन दिए और अपने बड़े बेटे की बलि मांगी। भक्त ने अपने बेटे की बलि देकर भैरव बाबा की मूर्ति को काशी से लाया। इसके बाद, भैरव बाबा ने बेटे को जीवित कर दिया। इसके बाद भक्त और उनके बेटे ने पंच पीरों के साथ गांव में मूर्ति की विधिपूर्वक स्थापना की। आज भी प्राचीन पंचदेव खेजड़ी वृक्ष की पूजा की जाती है।

ये भी पढे़:-

एमपी, सीजी और राजस्थान में कड़ाके की ठंड के बीच बारिश और ओलावृष्टि का अलर्ट जारी

राजस्थान में 804 पदों पर बंपर भर्ती, 12वीं से ग्रेजुएट तक करें अप्लाई

गूगल की मदद से 30 साल बाद फ्रांसीसी दंपती पहुंचे राजस्थान के गांव, जानें क्या है मामला

ईयू समझौता से राजस्थान के निर्यातकों को होगा कितना फायदा, जानें पूरी रिपोर्ट

राजस्थान जेसीबी दाल-बाटी-चूरमा कोटपूतली 651 क्विंटल चूरमा
Advertisment