दूसरे राज्यों के SC, ST, OBC छात्रों को नहीं मिलेगा आरक्षण, हाई कोर्ट का आया फैसला
News In Short
- दूसरे राज्यों के आरक्षित छात्रों को राज्य में आरक्षण का लाभ न देने काराजस्थान हाईकोर्ट का फैसला।
- बाहर के आरक्षित वर्ग के छात्रों को पीजी मेडिकल सीटों पर सामान्य श्रेणी में प्रतिस्पर्धा करनी होगी।
- फेडरेशन ऑफ प्राइवेट मेडिकल एंड डेंटल कॉलेज ने हाई कोर्ट दायर की थी याचिका।
- याचिका में खाली सीटों को भरने के लिए कम परसेंटाइल का तर्क दिया गया था।
- कोर्ट ने कहा कि आरक्षण नीतियां राज्य-विशिष्ट होती हैं, दूसरे राज्य में लागू नहीं हो सकतीं।
News In Detail
Jaipur: राजस्थान हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ कर दिया है कि एक राज्य में मिलने वाला आरक्षण का लाभ दूसरे राज्य में वैध नहीं होगा। यानी अगर कोई छात्र उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली या किसी अन्य राज्य में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) या अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) का आरक्षित अभ्यर्थी है, तो वह राजस्थान में पीजी मेडिकल सीटों पर प्रवेश के दौरान आरक्षित वर्ग के कम परसेंटाइल (पात्रता प्रतिशत) का लाभ नहीं उठा सकेगा। ऐसे छात्रों को केवल सामान्य (अनारक्षित) श्रेणी में ही प्रतिस्पर्धा करनी होगी।
यह फैसला राजस्थान के प्राइवेट मेडिकल एंड डेंटल कॉलेजों संगठन की याचिका को खारिज करते हुए सुनाया गया। जस्टिस संजीत पुरोहित की एकलपीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि आरक्षण नीतियां राज्य-विशिष्ट होती हैं और उन्हें राज्य की सीमाओं के पार नहीं ले जाया जा सकता।
क्या है पूरा मामला?
मामला राजस्थान में पोस्टग्रेजुएट मेडिकल प्रवेश काउंसलिंग को लेकर उठा। फेडरेशन ऑफ प्राइवेट मेडिकल एंड डेंटल कॉलेज ऑफ राजस्थान ने हाई कोर्ट में एक याचिका दायर कर मांग की थी कि 18 फरवरी 2026 को हुई काउंसलिंग बोर्ड की बैठक के उस फैसले को रद्द किया जाए, जिसमें अन्य राज्यों के आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को राजस्थान में आरक्षण का लाभ देने से इनकार किया गया था।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि केंद्र सरकार की अधिसूचना के अनुसार नीट-पीजी (NEET-PG) के क्वालीफाइंग परसेंटाइल (पात्रता प्रतिशत) को कम करने का उद्देश्य खाली सीटों को भरना था। यदि बाहरी राज्यों के आरक्षित छात्रों को कम परसेंटाइल का लाभ नहीं दिया जाता तो यह लक्ष्य पूरा नहीं होगा।
काउंसलिंग के बीच में नियम बदलना खेल के नियम बदलने जैसा है। यह नीति अप्रत्यक्ष रूप से 100 फीसदी डोमिसाइल (मूल निवास) आधारित आरक्षण लागू करने के समान है, जो असंवैधानिक है।
कोर्ट ने क्या कहा?
हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता की सभी दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि संवैधानिक योजना के अनुसार किसी विशेष जाति या वर्ग को आरक्षित श्रेणी में रखना उस राज्य की स्थानीय सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है। जो जाति राजस्थान में पिछड़ी है, हो सकता है वह दूसरे राज्य में सामान्य हो, और इसका उल्टा भी हो सकता है। इसलिए एक राज्य की आरक्षण नीति को दूसरे राज्य में लागू करना असंवैधानिक होगा।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरक्षित वर्ग के लिए तय किए गए कम परसेंटाइल एक विशेष सुविधा है। यह सुविधा केवल उसी राज्य के आरक्षित छात्रों के लिए है जिसने उन्हें पिछड़ा घोषित किया है। दूसरे राज्य के आरक्षित अभ्यर्थी इस शिथिल मानक का उपयोग करके राजस्थान की आरक्षित श्रेणी की सीटों पर अधिकार नहीं जता सकते।
अदालत ने यह भी कहा कि प्रशासनिक लक्ष्य (खाली सीटें भरना) निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन यह कानूनी और संवैधानिक मानकों पर हावी नहीं हो सकता। सिर्फ इसलिए कि सीटें खाली रह जाती हैं, असंवैधानिक तरीके से सीटें नहीं भरी जा सकतीं।
याचिकाकर्ता के इस तर्क को भी खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि बाहरी राज्यों के अभ्यर्थी सामान्य/अनारक्षित पूल की सीटों पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं। उन पर कोई प्रतिबंध नहीं है। बस उन्हें वह अतिरिक्त लाभ (कम परसेंटाइल) नहीं दिया जा रहा जो सिर्फ राजस्थान के मूल निवासियों के लिए है। इसे 100% डोमिसाइल आरक्षण कहना गलत होगा।
दिया सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई पुराने निर्णयों का भी जिक्र किया, जिनमें यह सिद्धांत स्थापित हुआ कि आरक्षण का लाभ उसी राज्य के नागरिकों को दिया जा सकता है जिसने उस वर्ग को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा घोषित किया है। अदालत ने कहा कि अगर हर राज्य के आरक्षित अभ्यर्थी दूसरे राज्यों में भी आरक्षण का लाभ मांगने लगें तो पूरी व्यवस्था अराजकता में बदल जाएगी।
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