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Photograph: (the sootr)
News in Short
- अफीम के खेतों में डोडे खाकर नशेड़ी बन रहे तोते
- नशे से बदला व्यवहार, उड़ने के बजाय हो जाते सुस्त
- नशे की हालत में ये तोते दिखते हैं तारों पर उल्टे लटके
- तातों से अफीम की खेती को नुकसान, छोड़ देते हैं अधखाया डोडा
- राजस्थन में काफी बड़े एरिया में होती हैं अफीम की खेती
News in Detail
राजस्थान के मेवाड़ और हाड़ौती अंचल में इन दिनों अजीबोगरीब मंजर देखने को मिल रहा है। यहां आसमान में ऊंची उड़ान भरने वाले तोते अब पेड़ों की डालियों पर नहीं, बल्कि अफीम के खेतों में डोडे पर झपट्टा मारते दिखते हैं। हालात यहां तक पहुंच गए हैं कि ये तोते अफीम के इतने शौकीन हो चुके हैं कि नशे की हालत में ये तारों पर उल्टे लटक जाते हैं और उड़ान भरने की सुध तक खो बैठते हैं।
बेसुध हो जाते हैं 'अफीमची' तोते
राजस्थान में भीलवाड़ा, चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़ और झालावाड़ जैसे जिलों में अफीम की खेती बड़े पैमाने पर होती है। यहां के तोतों ने अब अफीम के डोडों का स्वाद चख लिया है। ये अफीम के डोडों को काटकर उसके अंदर मौजूद नशीले दूध और दानों को खा जाते हैं।
​अफीम का सेवन करने के बाद इन तोतों का व्यवहार पूरी तरह बदल रहा है। ये सामान्य पक्षियों की तरह चहकने या उड़ने के बजाय सुस्त हो जाते हैं। नशे में धुत ये तोते अक्सर बिजली के तारों पर बेतरतीब ढंग से लटके मिलते हैं या फिर खेतों के बीच लड़खड़ाते हुए गिरते-पड़ते दिखाई देते हैं।
​किसानों की कमाई पर 'सर्जिकल स्ट्राइक'
​यह मामला सिर्फ पक्षियों के नशे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह किसानों के लिए एक बड़ी आर्थिक आपदा बन गया है। एक अनुमान के मुताबिक, ये तोते अफीम की फसल को करीब 20 प्रतिशत तक नुकसान पहुंचा रहे हैं। तोते डोडों में चोंच मारने के बाद अधखाया छोड़ देते हैं, जिससे अफीम की गुणवत्ता खराब हो जाती है और किसानों को सरकारी मापदंडों को पूरा करने में मुश्किल आती है। अफीम एक महंगी फसल है, और इन 'हवाई लुटेरों' की वजह से किसानों को हर साल लाखों रुपयों का घाटा सहना पड़ रहा है।
​शिकारी जानवरों का 'आसान शिकार'
​नशे की हालत में ये तोते अपनी सुरक्षा के प्रति बिल्कुल लापरवाह हो जाते हैं। उड़ने में असमर्थ होने के कारण ये जमीन पर गिर जाते हैं, जहां आवारा कुत्ते और अन्य शिकारी जानवर इन्हें आसानी से अपना निवाला बना लेते हैं। यानी नशे की लत इन पक्षियों की जान की दुश्मन बन जाती है। अफीम की खेती करने वाले एक किसान बताते हैं, ये तोते इतने शातिर हो गए हैं कि अब शोर मचाने या पटाखों की आवाज से भी नहीं डरते। वे चुपचाप आते हैं, डोडा काटते हैं और उसे लेकर उड़ जाते हैं।
​नाकाम हो रहे बचाव के तरीके
​किसानों ने अपनी फसल बचाने के लिए कई जतन किए, लेकिन सब बेअसर साबित हो रहे हैं। किसानों का कहना है कि पहले तोते शोर सुनकर भाग जाते थे, लेकिन अब वे इसके आदी हो चुके हैं। तोतों से फसल को बचाने के लिए खेतों में डरावने पुतले और चमकने वाली टेप लगाई गई, पर तोतों की 'नशे की तलब' के आगे ये सब फेल हैं। अब किसानों के पास आखिरी रास्ता केवल जाल बचा है। एक हेक्टेयर में जाल लगाने का खर्च करीब 35 हजार रुपये तक आता है, जो किसानों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ है।
​आंकड़ों की नजर में अफीम बेल्ट
राजस्थान में चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़, भीलवाड़ा, झालावाड़, कोटा, बारां और उदयपुर में अफीम की खेती होती है। इन क्षेत्रों में 49,140 लाइसेंस अफीम की खेती के लिए दिए गए हैं। साथ ही 34,776 लाइसेंस अफीम गोंद उत्पादन के लिए दिए गए हैं। इतनी बड़ी संख्या में खेतों की सुरक्षा करना प्रशासन और किसान दोनों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।
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