एसडीएम का कारनामा: गोचर भूमि की किस्म ही बदल दी, कलेक्टर ने यह लिया एक्शन

Ashish Bhardwaj | Jan 13, 2026, 14:41 IST
Photograph: (The Sootr)
राजस्थान के मेड़ता में एसडीएम ने एक निजी कंपनी पर मेहरबानी करते हुए 10 हजार बीघा गौचर भूमि की किस्म ही बदल दी। कलेक्टर ने पद का दुरूपयोग मानते हुए आदेश खारिज कर दिया।

राजस्थान में नागोर के कलेक्टर अरुण कुमार पुरोहित ने मेड़ता सिटी की एसडीएम पूनम चोयल द्वारा एक राजस्व नियमों में गड़बड़ी पर कड़ा संज्ञान लिया है। यह मामला धनापा गांव की लगभग 10 हजार बीघा गोचर भूमि को बदलने से जुड़ा है। एसडीएम ने बिना विधिक अधिकार के भूमि को 'मगरा' और 'पहाड़' के रूप में वर्गीकृत करने का आदेश दिया था। कलेक्टर ने इसे क्षेत्राधिकार से बाहर जाकर लिया गया फैसला मानते हुए तत्काल सक्षम न्यायालय में अपील दायर करने के आदेश दिए हैं।



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एसडीएम के फैसले की कानूनी वैधता पर सवाल

कलेक्टर ने स्पष्ट किया कि राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम और उच्च न्यायालय के विभिन्न फैसलों के तहत गोचर भूमि के वर्गीकरण को बदलने का अधिकार केवल कलेक्टर के पास है, न कि एसडीएम के पास। एसडीएम ने 10 नवंबर 2025 को पारित अपने आदेश में न केवल क्षेत्राधिकार का उल्लंघन किया, बल्कि 42 साल पुराने नामांतरण को बिना किसी ठोस कानूनी आधार के खारिज कर दिया। इस मामले में एक कंपनी ने 1979 के एक नामांतरण को चुनौती दी थी, जिसे एसडीएम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया।



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प्रशासनिक लापरवाही

कलेक्टर ने इस मामले को प्रशासनिक लापरवाही का बड़ा उदाहरण बताया और इसे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत करार दिया। कलेक्टर ने यह भी कहा कि जिस नामांतरण (सं. 411) को चुनौती दी गई, वह 1978-80 के दौरान दर्ज हुआ था। हालांकि, कंपनी के पास खनन लीज का हस्तांतरण काफी बाद में (1987, 2006 और 2015 में) हुआ। कलेक्टर ने यह भी बताया कि कंपनी को उस पुराने नामांतरण को चुनौती देने का कोई विधिक अधिकार नहीं था, क्योंकि उस समय भूमि 'गोचर' के रूप में पहले ही दर्ज हो चुकी थी।



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तहसीलदार को निर्देश

कलेक्टर ने कहा कि एसडीएम ने महत्वपूर्ण दस्तावेजों और तथ्यों को दरकिनार करते हुए निर्णय लिया, जिससे राज्य सरकार के पक्ष को कमजोर करने की कोशिश की गई।



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भूमि का वर्गीकरण

मगरा में वो भूमि आती हैं। जो आमतौर पर रेगिस्तानी या कठोर भूमि होती है, जो खेती के लिए उपयुक्त नहीं होती और अक्सर पशुओं के लिए चारागाह (गोचर भूमि) के रूप में उपयोग की जाती है। पहाड़ वह भूमि होती हैं। जो पर्वतीय क्षेत्रों में स्थित होती है, जो आमतौर पर खनन, निर्माण, या कृषि के लिए उपयुक्त नहीं मानी जाती।



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क्या हैं नियम

अगर कोई जमीन 'मगरा' या 'पहाड़' के रूप में दर्ज की गई है और उसे कृषि या अन्य उद्देश्य के लिए उपयोग में लाना है, तो इसके लिए एक विधिक प्रक्रिया और राजस्व अधिकारियों की मंजूरी आवश्यक होती है। भूमि का वर्गीकरण बदलने के लिए राजस्व अधिकारी, कलेक्टर या एसडीएम को आवेदन देना होता है। आवेदन में यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि जमीन को किस उद्देश्य के लिए परिवर्तित किया जा रहा है और इसके लिए किस प्रकार के कानूनी दस्तावेज़ या साक्ष्य हैं।



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मामले में आगे क्या

अब इस पूरे मामले में अनदेखी या लापरवाही की सच्चाई अदालत में सामने आएगी, जब ऊपरी अदालत में इस मामले की सुनवाई की जाएगी। कलेक्टर ने इस मामले में विधिक प्रक्रिया का पालन करने के निर्देश दिए हैं ताकि सही फैसला लिया जा सके और प्रशासनिक व्यवस्थाओं को सही तरीके से लागू किया जा सके।



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मुख्य बिंदू:

  • कलेक्टर ने मेड़ता एसडीएम पूनम चोयल द्वारा गोचर भूमि के वर्गीकरण में किए गए अवैध निर्णय पर कड़ा संज्ञान लिया और तत्काल अपील दायर करने के आदेश दिए।
  • एसडीएम ने बिना विधिक अधिकार के गोचर भूमि के वर्गीकरण को बदला, जो कि राजस्थान भू-राजस्व अधिनियम के खिलाफ था।
  • कलेक्टर ने एसडीएम के फैसले को गलत मानते हुए तहसीलदार को अपील दायर करने और 'स्थगन आदेश' प्राप्त करने के निर्देश दिए।
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