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Photograph: (the sootr)
News in Short
- राजस्थान के 47 उत्पादों के जीआई आवेदन मंजूरी के लिए फांक रहे धूल
- इन फाइलों को मंजूरी मिले तो बदल सकती है मरुधरा की तकदीर
- अभी तक राजस्थान में सिर्फ 22 उत्पादों को ही मिला जीआई टैग
- जीआई टैग मिलने के बाद उन उत्पादों की नहीं हो सकती है नकल
- सरकार को जीआई टैग के लिए मिशन मोड पर काम करने की जरूरत
News in Detail
​जयपुर। राजस्थान अपनी कला, संस्कृति और बेमिसाल स्वाद के लिए दुनिया भर में मशहूर है। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि मरुधरा की कई ऐसी नायाब चीजें हैं, जो आज भी अपनी असली पहचान यानी जीआई टैग (Geographical Indication Tag) के लिए तरस रही हैं। ताज़ा आंकड़ों के अनुसार राजस्थान के 47 उत्पादों के जीआई आवेदन चेन्नई स्थित जीआई रजिस्ट्री कार्यालय में धूल फांक रहे हैं।
सिर्फ 22 उत्पादों को ही जीआई टैग
उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्य जीआई टैग की रेस में तेजी से आगे निकल रहे हैं। वहीं, राजस्थान अब तक केवल 22 उत्पादों पर ही 'सरकारी ठप्पा' लगवा पाया है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर 47 उत्पादों के लंबित जीआई आवेदनों को मंजूरी मिल जाती है तो वे प्रदेश की तकदीर बदलने में सक्षम होंगे। जीआई टैग मिलने के बाद इन वस्तुओं न केवल अंतरराष्ट्रीय पटल पर पहचान मिलेगी, बल्कि कोई उनकी नकल पर भी लगाम लग सकेगी।
​क्या है जीआई टैग और यह क्यों है 'सुपरपावर'
​जीआई टैग यानी भौगोलिक संकेत एक तरह का बौद्धिक संपदा अधिकार है। यह किसी उत्पाद को उसकी विशिष्ट भौगोलिक उत्पत्ति, गुणवत्ता और प्रतिष्ठा के आधार पर दिया जाता है।
नकल पर लगाम: एक बार जीआई टैग मिलने के बाद उस नाम का उपयोग कोई और नहीं कर सकता। उदाहरण के लिए, बीकानेरी भुजिया के नाम पर कोई और शहर अपनी नमकीन नहीं बेच सकता।
​अंतरराष्ट्रीय पहचान: यह टैग मिलते ही उत्पाद ग्लोबल मार्केट में 'ब्रांड' बन जाता है, जिससे निर्यात (Export) की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।
​आर्थिक समृद्धि: इससे सीधे तौर पर स्थानीय कारीगरों और किसानों की आय बढ़ती है क्योंकि उन्हें उत्पाद की सही कीमत मिलती है।
​चैन्नई में क्यों अटकी है फाइलें? (The Chennai Connection)​
देश में जीआई टैग देने का एकमात्र वैधानिक केंद्र चेन्नई में भौगोलिक संकेत रजिस्ट्री कार्यालय है। राजस्थान के 47 आवेदन यहाँ लंबित होने के पीछे कई तकनीकी और प्रशासनिक कारण हैं:
​दस्तावेजों की कमी: जीआई टैग के लिए उत्पाद का ऐतिहासिक प्रमाण (कम से कम 50-100 साल पुराना इतिहास) और उसकी विशिष्टता के वैज्ञानिक साक्ष्य देने होते हैं। कई बार आवेदनों में इन तथ्यों की कमी होती है।
​क्वेरी और आक्षेप: चेन्नई ऑफिस अक्सर आवेदनों पर आपत्तियां उठाता है। इन आपत्तियों का जवाब देने की जिम्मेदारी संबंधित विभागों या विश्वविद्यालयों (जैसे कृषि विश्वविद्यालय) की होती है। जवाब देने में देरी से प्रक्रिया लंबी खिंच जाती है।
​कम्युनिटी स्टेकहोल्डर्स की कमी: जीआई टैग किसी व्यक्ति को नहीं, बल्कि एक समुदाय या संस्था को मिलता है। राजस्थान में कई उत्पादों के लिए सशक्त 'प्रोड्यूसर एसोसिएशन' का अभाव है जो मजबूती से अपना पक्ष रख सके।
​इन 47 उत्पादों में छुपा है राजस्थान का भविष्य
​चैन्नई में लंबित इन आवेदनों में राजस्थान के कृषि उत्पाद, हस्तशिल्प और खाद्य सामग्री शामिल हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन्हें मंजूरी मिलती है, तो प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में रोजगार का सैलाब आ सकता है।
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कृषि उत्पाद: नागौरी मेथी, बारां का लहसुन, घग्गर साजी, कोटा धनिया, बीकानेर मैथी, सीकर का प्याज, राजस्थान का जीरा, मथानिया मिर्च, गंगानगर का किन्नू, मथानिया चिली, बाड़मेर का जीरा, कैर, बूंदी का बासमती चावल, खेजड़ी की सांगरी इस सूची में शामिल होने का इंतजार कर रही हैं।
​हस्तशिल्प: कुंदन मीना ज्वेलरी, जोधपुर आयरन क्राफ्ट, जयपुर मार्बल स्टोन क्राफ्ट, बाड़मेर कटाब (पेच वर्क), जोधपुर वुड क्राफ्ट, फाड़ पेंटिंग, उदयपुर थिकरी क्राफ्ट, उदयपुर डंका क्राफ्ट, जोधपुर चित्तर क्राफ्ट, जैसलमेर का पीला पत्थर, अकोला डाबू प्रिंटस, चित्तोड़गड़ बस्सी की कावड कला, सवाईमाधेपुर की ब्लैक पॉटरी, राजस्थानी लाख की चूडियां, जोधपुरी साफा, बीकानेरी चोखली वूलन कारपेट, बंशीपहाड़पुर का लाल पत्थर, किशनगढ़ पेंटिंग, सिंधी सारंगी अपनी बारी का इंतजार कर रही हैं।
​खाद्य सामग्री: अलवर का कलाकंद, बीकानेरी राठी गाय का घी, बीकानेरी उंट का घी, पुष्कर का गुलकंद, भुसावर आचार व मुरब्बा, गंगापुर का खीरमोहन आदि ऐसी कई चीजें हैं, जो दुनिया में कहीं और वैसी नहीं बन सकतीं।
टेक्सटाइल: खरक एम्ब्रायडरी, मुक्का एम्ब्रायडरी, खाम्बिरी एम्ब्रायडरी, एक्स्ट्रा वेफ्ट पट्टू वीविंग, सूफ एम्ब्रायडरी, पक्का एम्ब्रायडरी, एपलीक्यू वर्क, राजस्थानी लहरिया, जयपुरी रजाई जैसे उत्पाद भी सूची में लंबित हैं।
​अब तक किसके पास है 'राजसी' तमगा?​
राजस्थान को अब तक मिले 22 जीआई टैग में मुख्य रूप से शामिल हैं:
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हस्तशिल्प: जयपुर की ब्लू पॉटरी, सांगानेरी प्रिंट, बगरू प्रिंट, कोटा डोरिया, थेवा आर्ट (प्रतापगढ़), पोकरण पॉटरी और कठपुतली।
​कृषि/प्राकृतिक: सोजत की मेहंदी, मकराना मार्बल और हाल ही में चर्चा में आई 'अश्वगंधा'।
​खाद्य: बीकानेरी भुजिया (जो राजस्थान का पहला बड़ा खाद्य जीआई टैग था)।
करोड़ों का व्यापार और पहचान का संकट
​जब तक किसी उत्पाद को जीआई टैग नहीं मिलता, तब तक दूसरे राज्य या देश उसकी नकल कर 'नकली माल' असली बताकर बेचते रहते हैं। इससे राजस्थान के असली कारीगरों को आर्थिक नुकसान होता है। उदाहरण के तौर पर, 'कोटा डोरिया' की साड़ियां जब तक टैग नहीं मिला था, तब तक पावरलूम की नकली साड़ियां बाजार में हावी थीं।
द सूत्र व्यू
​राजस्थान सरकार और उद्योग विभाग को अब 'मिशन मोड' पर काम करने की जरूरत है। चेन्नई ऑफिस द्वारा उठाए गए आक्षेपों का तुरंत निपटारा करने के लिए विशेष टास्क फोर्स की आवश्यकता है। अगर इन 47 उत्पादों को समय रहते पहचान मिल गई, तो 'पधारो म्हारे देश' का नारा केवल पर्यटन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राजस्थान के उत्पाद भी सात समंदर पार अपनी धाक जमाएंगे।
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