दाग मिटाने में लगे 32 साल, हाई कोर्ट ने किया बरी, गेहूं पिसाई को लेकर हुई थी मामूली कहासुनी
News In Short
- राजस्थान हाई कोर्ट ने 32 साल बाद लालसिंह को एससी/एसटी एक्ट के मुकदमे में बरी किया।
- मामले में पैसे के लेन-देन को लेकर झगड़ा था, जिसे जातिसूचक शब्दों से जोड़ा गया।
- निचली अदालत ने निचली अदालत ने इस मामले में लालसिंह को सजा सुनाई थी
- लालसिंह ने अपने खिलाफ मुकदमे को झूठा बताते हुए हाई कोर्ट में चुनौती दी थी
- हाई कोर्ट ने माना कि निजी विवाद में जातिवाद का आरोप पूरी तरह गलत था।
News In Detail
राजस्थान में जोधपुर जिले के लालसिंह को 32 साल बाद एससी/एसटी एक्ट में दर्ज मुकदमे से छुटकारा मिल गया है। हाई कोर्ट ने इस मामले में उसे बरी कर दिया। कोर्ट ने फैसला दिया कि लालसिंह को लेन-देन से जुड़े विवाद में फंसाया गया था, न कि किसी जातिवाद के कारण। यह मामला एक आटा चक्की पर गेहूं पिसवाने को लेकर हुआ था। इसे मामले में गलत तरीके से जातिसूचक शब्दों को जोड़ दिया गया।
32 साल लड़ी कानूनी लड़ाई
लालसिंह के लिए यह मामला न केवल कानूनी तौर पर चुनौतीपूर्ण था, बल्कि इसके सामाजिक और मानसिक प्रभाव भी थे। उसका 25 जुलाई 1993 को गेहूं पिसाई के पैसों को लेकर झगड़ा हुआ था। शिकायतकर्ता ने पूरी प्लानिंग के तहत एससी/एसटी एक्ट के तहत मुकदमा कराया। इस मामले में एफआईआर 13 दिन बाद 7 अगस्त 1993 को दर्ज हुई।
मामला कैसे शुरू हुआ
वर्ष 1993 में जब लालसिंह आटा चक्की पर गेहूं पिसवाने गए, तो पैसे को लेकर झगड़ा हुआ था। इस मामूली विवाद को बाद आटा चक्की मालिक ने जातिसूचक शब्दों से जोड़ते हुए पुलिस में शिकायत दर्ज करवा दी। इसके आधार पर पुलिस ने एससी/एसटी एक्ट के तहत केस दर्ज किया। लालसिंह को छह महीने की सजा सुनाई गई। हालांकि, बाद में उसको जमानत मिल गई।
हाई कोर्ट में किस तरह से मामला आया?
लालसिंह ने इस मामले को हाई कोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ में चुनौती दी। उसने यह तर्क दिया कि यह मामला पूरी तरह से झूठा है। यह एक व्यक्तिगत विवाद था, जो पैसे के लेन-देन से जुड़ा था। कोर्ट ने यह पाया कि अभियोजन साक्ष्य में भारी विरोधाभास था। गवाहों के बयान भी झूठे थे।
कोर्ट का फैसला
हाई कोर्ट ने कहा कि एससी/एसटी एक्ट में किसी आरोपी को दोषी ठहराने के लिए यह साबित होना जरूरी है। अपमान या धमकी जानबूझकर दी गई। यदि विवाद का कारण निजी या आर्थिक हो, तो केवल जातिसूचक शब्दों का आरोप लगाना एससी/एसटी एक्ट के तहत अपराध नहीं हो सकता। कोर्ट ने माना कि इस मामले में यह आरोप पूरी तरह से मनगढ़ंत था और लालसिंह को निर्दोष करार दिया।
न्यायिक व्यवस्था की भूमिका
हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि एससी/एसटी एक्ट का उद्देश्य कमजोर वर्गों की सुरक्षा करना है, लेकिन इसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। इस मामले में अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी निजी या आर्थिक कारण से विवाद उत्पन्न हुआ है, तो जातिसूचक शब्दों को आधार बनाकर एससी/एसटी एक्ट के तहत अपराध सिद्ध नहीं हो सकता।
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