न्याय केवल दंड का माध्यम नहीं, सुधार और अधिकारों पर दिखाया मानवीय नजरिया

Mukesh Sharma | Mar 29, 2026, 11:56 IST
Photograph: (the sootr)
इस हफ्ते राजस्थान हाई कोर्ट ने अपने फैसले से अलग ही संदेश दिया। कोर्ट ने अपने फैसलों के जरिए कहा कि न्याय सिर्फ दंड नहीं है। यह सुधार और पुनर्वास का सशक्त माध्यम भी है।

इस सप्ताह राजस्थान हाई कोर्ट ने कई अहम फैसलों के जरिए न्याय व्यवस्था को नई दिशा दी। कोर्ट ने झूठे मामलों को खारिज करने से लेकर पुलिस सुधार, कम्युनिटी सर्विस, निजता के अधिकार और मानवीय आधार पर राहत जैसे मुद्दों पर स्पष्ट संदेश दिया। कोर्ट का मानना है कि न्याय केवल दंड नहीं, बल्कि सुधार और संवेदनशीलता का माध्यम भी है।



मृत व्यक्ति पर हत्या का प्रयास असंभव

राजस्थान हाई कोर्ट ने जयपुर के श्री शंकर सेवा धाम से जुड़े मामले में अहम फैसला देते हुए कहा कि मृत व्यक्ति पर धारा 308 IPC (हत्या का प्रयास) लागू नहीं हो सकती। जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने इसे कानूनी रूप से असंभव बताते और ट्रायल कोर्ट प्रसंज्ञान आदेश और कार्यवाही रद्द कर दी। मामला एक व्यक्ति की मौत के बाद अंग निकालकर बेचने के आरोपों से जुड़ा था। कोर्ट ने कहा कि बिना पोस्टमार्टम या ठोस साक्ष्य के ऐसे आरोप कल्पना मात्र हैं। समाजसेवा करने वालों को हतोत्साहित करते हैं।



30 ​दिन तक 5-5 पौधे लगाने की शर्त पर जमानत

राजस्थान हाई कोर्ट ने कहा कि हर अपराधी का भविष्य होता है। जस्टिस चंद्रप्रकाश श्रीमाली ने एटीएम चोरी के दो आरोपियों को जमानत देते हुए 30 दिन तक रोज 5 पौधे लगाने और उनकी देखभाल करने का आदेश दिया। प्रत्येक आरोपी को 150 पौधे लगाने होंगे। कोर्ट ने कहा कि न्याय व्यवस्था का उद्देश्य केवल दंड नहीं बल्कि सुधार और पुनर्वास भी होना चाहिए। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 के तहत कम्युनिटी सर्विस को सजा के विकल्प के रूप में लागू करने पर जोर दिया है।


हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और राजस्थान विधिक सेवा प्राधिकरण को को कम्युनिटी सर्विस स्कीम बनाने के निर्देश दिए। साथ ही हर आरोपी की सोशल रिपोर्ट तैयार करने और डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम लागू करने को कहा है, जिससे ताकि अपराधियों का सुधार और पुनर्वास सुनिश्चित हो सके।



गरीबी जेल का कारण नहीं

राजस्थान हाई केार्ट ने चेक बाउंस मामले में अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि आर्थिक कमजोरी के आधार पर किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं छीनी जा सकती। उदयपुर के संतोष डांगी के मामले में समझौता होने के बावजूद 15 प्रतिशत राशि जमा न कर पाने पर ट्रायल कोर्ट ने उन्हें जेल भेज दिया था।



हाई कोर्ट ने इस पर सख्त नाराजगी जताते हुए कहा कि गरीबी को जेल भेजने का आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह लागत कोई सजा नहीं, बल्कि एक प्रक्रिया है, जिसे परिस्थितियों के अनुसार बदला जा सकता है। कोर्ट ने यह भी माना कि जब दोनों पक्षों में समझौता हो चुका है और शिकायतकर्ता को कोई आपत्ति नहीं है तो आरोपी को जेल में रखना अनुचित है। कोर्ट ने आरोपी को फौरन रिहा करने के आदेश दिए।



अपील के अधिकार से वंचित करना न्याय के खिलाफ

राजस्थान हाई कोर्ट ने राजस्व मामले से संबंधित एक मामले में कहा है कि किसी भी पक्षकार को उसके अपील के कानूनी अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। जस्टिस अनुरुप सिंघी ने रेवेन्यू बोर्ड के फैसले को रद्ध कर दिया है। मामला सीकर जिले की भूमि विवाद से जुड़ा था। जहां राजस्व अपीलीय अधिकारी ने केवल प्रकरण वापस भेजा लेकिन तथ्यों पर फैसला नहीं दिया। इसके बावजूद राजस्व मंडल ने सीधे मूल निर्णय बहाल कर दिया।



हाई कोर्ट ने इसे न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध बताते हुए कहा कि अपील की निर्धारित व्यवस्था का पालन जरूरी है। यदि उच्च प्राधिकरण सीधे निर्णय दे देता है तो पक्षकार पहली अपील के अधिकार से वंचित हो जाता है। अदालत ने मामला पुनः सीकर के राजस्व अपीलीय अधिकारी को भेजते हुए चार माह में निष्पक्ष निर्णय करने के निर्देश दिए।



गर्भवती महिला को अंतरिम जमानत

हाई कोर्ट ने संवेदनशील मामले में गर्भावस्था के अंतिम चरण में पहुंची आरोपी महिला को तीन माह की अंतरिम जमानत दी। जस्टिस समीर जैन ने कहा कि जहां तक संभव हो प्रसव जेल के बाहर होना चाहिए और मां व शिशु की गरिमा सर्वोपरि है।


अदालत ने अनुच्छेद 21 के हवाला देते हुए कहा कि सुरक्षित प्रसव का अधिकार जीवन और गरिमा से जुड़ा है। मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार महिला गर्भावस्था के अंतिम चरण में है। कोर्ट ने माना कि जेल का वातावरण प्रसव और नवजात के लिए उपयुक्त नहीं है। अदालत ने शर्त रखी है कि महिला 26 जून तक आत्मसमर्पण करेगी और जांच में सहयोग देगी।



पुलिस में अनुसंधान व कानून व्यवस्था की विंग अलग-अलग बने

राजस्थान हाई कोर्ट ने 2014 की एक एफआईआर में 11 साल बाद भी आरोप-पत्र दाखिल न होने पर कड़ी नाराजगी जताई। जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने कहा कि यह केवल लापरवाही नहीं बल्कि न्याय व्यवस्था को कमजोर करने वाला मामला है। कोर्ट के सामने आया कि एक ही मामले में 20 से अधिक जांच अधिकारी बदले गए, फिर भी जांच पूरी नहीं हुई। देरी का कारण त्योहार, खेल प्रतियोगिता और विशेष ड्यूटी बताने पर कोर्ट ने फटकार लगाई।



कोर्ट ने कहा कि जांच में देरी से न्याय प्रभावित होता है और जनता का भरोसा टूटता है। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को पुलिस में अनुसंधान और कानून-व्यवस्था को अलग-अलग विंग बनाने के निर्देश दिए हैं।



निजी फोटो वायरल करना निजता का उल्लंघन

राजस्थान हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में सोशल मीडिया पर बिना अनुमति निजी और आपत्तिजनक तस्वीरें साझा करने को निजता का उल्लंघन बताया। जस्टिस फरजंद अली ने इंस्टाग्राम को ऐसे सभी कंटेंट तुरंत हटाने और दोषी अकाउंट बंद करने के निर्देश दिए।



मामला जोधपुर के एक युवक की वायरल तस्वीरों से जुड़ा था। कोर्ट ने कहा कि संविधान के तहत हर नागरिक को गरिमा और निजता का अधिकार है। अदालत ने कहा है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को ऐसे मामलों में तुरंत कार्रवाई करनी होगी।



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