राज्य ओबीसी आयोग ने CM को सौंपी 900 पेज की रिपोर्ट, 25 जातियां अधिक पिछड़ी
समझें क्या है पूरा मामला
- राजस्थान में 25 ओबीसी जातियां आज भी राजनीतिक हाशिए पर।
- राज्य ओबीसी आयोग ने CM को सौंपी 900 पेज की रिपोर्ट।
- 11 ओबीसी जातियों का दबदबा, ट्रांसजेंडरों की स्थिति भी कमजोर।
- पंचायत-निकाय चुनावों में ओबीसी आरक्षण के लिए तैयार हुई रिपोर्ट।
- 14 अगस्त तक लॉटरी का लक्ष्य, उसके बाद चुनाव की तैयारी।
राज्य ओबीसी आयोग की रिपोर्ट में बड़ा खुलासा हुआ है। प्रदेश की 90 ओबीसी जातियों में से 25 अब भी राजनीतिक रूप से हाशिए पर हैं। वहीं, सिर्फ 11 जातियों का ही राजनीतिक दबदबा है। आयोग ने यह रिपोर्ट बुधवार को मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को सौंपी।
रिपोर्ट में ट्रांसजेंडरों और अनाथ श्रेणी की स्थिति भी बेहद कमजोर बताई गई है। अब इस रिपोर्ट के आधार पर पंचायत और नगरीय निकाय चुनावों में ओबीसी आरक्षण तय होगा।
कितनी जातियां हैं किस स्थिति में?
आयोग ने 90 ओबीसी जातियों का अध्ययन किया और उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व का आंकलन किया। सिर्फ 10-11 जातियों को ही 1000 से अधिक जनप्रतिनिधि मिल पाए हैं।
50 से भी कम प्रतिनिधित्व वाली जातियां तमोली, ठठेरा, भड़भूजा, कुंजड़ा, चोबदार, बागरिया, मुल्तानी, सिकलीगर, कोतवाल, पटवा, खेरवा, शोरगर, मोगिया, कागजी और फारूकी हैं।
10 से भी कम प्रतिनिधित्व वाली जातियां मदारी-बाजीगर, चूनगर, मोची, नट, भोपा, जागरी, हेला, न्यारिया, सिरकीवाल और सपेरा हैं। ट्रांसजेंडरों का प्रतिनिधित्व महज 3 है, जबकि अनाथ श्रेणी का खाता भी नहीं खुला है।
कई जातियां बहुत पिछड़ी
ओबीसी आयोग के पूर्व अध्यक्ष भंवरू खान का कहना है कि कुछ जातियों का नौकरी, व्यवसाय और राजनीति सभी जगह दबदबा है, जबकि कई जातियां बहुत पिछड़ी हैं । इन पिछड़ी जातियों के पास न शिक्षा है और न आय के स्रोत हैं। आयोग ने सिफारिश की है कि इन पिछड़ी जातियों को आरक्षण के भीतर विशेष कोटा मिलना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने भी निर्देश दिया है कि ओबीसी की जातियों का हर 10 वर्ष में सर्वे होना चाहिए और जिन जातियों को पर्याप्त लाभ मिल चुका है, उन्हें ओबीसी से बाहर किया जाना चाहिए। आयोग ने अपनी रिपोर्ट 19 मापदंडों के आधार पर तैयार की है। सर्वे 74.85 लाख ओबीसी परिवारों पर किया गया है। रिपोर्ट दो भागों में 900 पन्नों की है।
क्या है ट्रिपल टेस्ट और क्यों है जरूरी?
ओबीसी आरक्षण सुप्रीम कोर्ट के ट्रिपल टेस्ट पर टिका है। यह तीन शर्तें हैं - एक समर्पित आयोग का गठन, स्थानीय निकायवार अध्ययन, और 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा। पूर्ववर्ती गहलोत सरकार में ट्रिपल टेस्ट लागू हुआ था, लेकिन तब चुनाव हो चुके थे। इस बार आयोग की रिपोर्ट आने के बाद ही चुनाव कराए जाएंगे।
आयोग अध्यक्ष मदनलाल भाटी ने कहा कि उन्होंने बंद कमरों में बैठकर रिपोर्ट नहीं बनाई, बल्कि जनता के बीच जाकर सर्वे किया। उन्होंने कहा कि ओबीसी आबादी करीब 20 प्रतिशत बढ़ी है और रिपोर्ट में नए सामाजिक-आर्थिक आंकड़े शामिल किए गए हैं।
निकाय-पंचायत चुनाव को कैसे प्रभावित करेगी रिपोर्ट?
यह रिपोर्ट लंबे समय से अटके पंचायत और निकाय चुनावों का रास्ता साफ करेगी । सरकार ने हाईकोर्ट को आश्वासन दिया था कि 5 अगस्त तक रिपोर्ट सौंप दी जाएगी। अब 14 अगस्त तक आरक्षण की लॉटरी पूरी करने का लक्ष्य है। 17 अगस्त को निकाय चुनावों की घोषणा हो सकती है।
रिपोर्ट में ओबीसी जनसंख्या के आधार पर 309 निकायों में 60 अध्यक्ष पद ओबीसी के लिए आरक्षित करने का प्रस्ताव है । पंचायती राज संस्थाओं में भी जिला प्रमुख, सदस्य, प्रधान, पंचायत समिति सदस्य और सरपंच पदों पर आरक्षण तय होगा।
सियासी हलचल और विरोध
इस रिपोर्ट ने सियासी हलचल मचा दी है। विपक्षी कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि सरकार ओबीसी जातियों में विभाजन पैदा करना चाहती है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने कहा कि रिपोर्ट को पढ़े बिना वह टिप्पणी नहीं करेंगे, लेकिन आशंका है कि इसमें जातियों को आपस में भिड़ाने की कोशिश की गई है।
वहीं, मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने कहा कि सरकार वन स्टेट वन इलेक्शन की दिशा में आगे बढ़ रही है । उनका कहना है कि एक साथ चुनाव से विकास कार्यों पर ध्यान केंद्रित होगा और समय व संसाधनों की बचत होगी।
नौकरियों में भी नाममात्र का प्रतिनिधित्व
आयोग ने 14 साल पहले भी ओबीसी जातियों के सार्वजनिक सेवाओं में प्रतिनिधित्व का अध्ययन किया था । तब भी 25 जातियों का नाममात्र का प्रतिनिधित्व सामने आया था। आयोग का कहना है कि राजनीतिक हाशिए पर जाने का सीधा असर नौकरियों और व्यवसाय पर भी पड़ता है।
FAQ
- राजस्थान में कितनी ओबीसी जातियां राजनीतिक रूप से हाशिए पर हैं?
ओबीसी आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश की 90 ओबीसी जातियों में से 25 जातियों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व नाममात्र का मिला है । - ओबीसी आरक्षण के लिए ट्रिपल टेस्ट क्या है?
सुप्रीम कोर्ट का ट्रिपल टेस्ट तीन शर्तों वाला फार्मूला है - समर्पित आयोग का गठन, स्थानीय निकायवार अध्ययन, और 50% आरक्षण सीमा । इसके बिना स्थानीय निकायों में ओबीसी आरक्षण संवैधानिक रूप से मान्य नहीं है। - ओबीसी आयोग की रिपोर्ट निकाय-पंचायत चुनावों को कैसे प्रभावित करेगी?
उइस रिपोर्ट के आधार पर पंचायतों और नगर निकायों में ओबीसी आरक्षण तय होगा।
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