सरिस्का में सफारी के नाम पर विनाश, हजारों पेड़ कटे, बाला किला की दीवार ढहाई
News In Short
- राजस्थान के सरिस्का टाइगर रिजर्वसरिस्का टाइगर रिजर्व में नई जंगल सफारी के लिए बनाया गया रास्ता।
- सफारी मार्ग बनाने के लिए हजारों हरे-भरे पेड़ों की गई कटाई।
- 400 साल पुराने ऐतिहासिक बाला किले की सुरक्षा दीवार (परकोटा) को तोड़ा गया।
- पर्यावरण प्रेमियों ने इसे प्रशासनिक आतंकवाद करार देते हुए कार्रवाई की मांग की है।
- अधिकारियों की अनभिज्ञता पर उठे सवाल, जांच की मांग।
News In Detail
सुनील जैन@अलवर
राजस्थान का प्रसिद्ध सरिस्का बाघ अभ्यारण्य एक बार फिर गलत कारणों से चर्चा में है। सरिस्का के बफर ज़ोन में नई जंगल सफारी शुरू करने के नाम पर वन विभाग ने ऐसी मनमानी की है, जिसने पर्यावरणविदों और इतिहास प्रेमियों को भी आंदोलित कर दिया है।
सफारी के लिए नया रास्ता बनाने की होड़ में न केवल हजारों हरे-भरे पेड़ों की बलि चढ़ा दी गई, बल्कि 400 साल पुराने ऐतिहासिक बाला किला की अभेद्य दीवार को भी आधुनिक मशीनों से छलनी कर दिया गया।
नियमों को ताक पर रखकर बनाया नया मार्ग
वन विभाग ने आड़ा पाड़ा से अंधेरी होते हुए सूरजकुंड से सीधे बाला किला क्षेत्र तक एक नए सफारी मार्ग का निर्माण किया है। इस मार्ग को तैयार करने के लिए विभाग ने बेहद गोपनीय तरीके से काम किया। आरोप है कि इस रास्ते को चौड़ा और सुगम बनाने के लिए जंगल के हजारों पेड़ काट दिए गए। बफर ज़ोन वन्यजीवों के लिए एक सुरक्षा कवच का काम करता है, लेकिन वहां पर पेड़ों की कटाई ने पारिस्थितिक तंत्र को अपूरणीय क्षति पहुंचाई है।
400 साल पुराना परकोटा तोड़ा
इस पूरे प्रकरण में सबसे विवादास्पद पहलू बाला किला की सुरक्षा दीवार (परकोटा) को तोड़ना है। लगभग 400 वर्ष पुराने इस किले का ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व अद्वितीय है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि जहां वन विभाग की चौकी स्थित है, ठीक उसी के नाक के नीचे किले की दीवार को ढहा दिया गया और किसी को भनक तक नहीं लगी।
यह सीधे तौर पर संरक्षित स्मारकों से जुड़े कानूनों का उल्लंघन है। जानकारों का मानना है कि इस तरह के कृत्य में विभाग के निचले स्तर से लेकर उच्च स्तर तक के अधिकारियों की संलिप्तता या मौन स्वीकृति के बिना संभव नहीं है।
पर्यावरण प्रेमियों में भारी आक्रोश
जैसे ही नए रास्ते और टूटी दीवार की खबर सार्वजनिक हुई, अलवर के नागरिकों और पर्यावरण प्रेमियों का गुस्सा फूट पड़ा। सुबह की सैर पर निकलने वाले स्थानीय लोगों ने सवाल उठाया कि जब पहले से ही सफारी के लिए मार्ग उपलब्ध थे, तो फिर करोड़ों साल पुराने पहाड़ों और सैकड़ों साल पुरानी धरोहरों को नुकसान पहुंचाकर नया रास्ता बनाने की क्या आवश्यकता थी?
प्रसिद्ध पर्यावरण प्रेमी डॉ. कांति प्रसाद शर्मा ने इस मामले पर कड़ा रुख अख्तियार किया है। उन्होंने इसे प्रशासनिक आतंकवाद करार देते हुए कहा, यह केवल पेड़ों की कटाई नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की हत्या है। ऐतिहासिक धरोहर और प्रकृति के साथ ऐसा खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ तुरंत कार्रवाई नहीं हुई और इस अवैध निर्माण को नहीं रोका गया, तो वे माननीय राजस्थान उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर करेंगे।
अधिकारियों की अनभिज्ञता पर उठे सवाल
हैरानी की बात यह है कि इतना बड़ा निर्माण कार्य हो गया और उच्चाधिकारी अनभिज्ञता का ढोंग कर रहे हैं। इस संबंध में जब सीसीएफ संग्राम सिंह से बात की गई, तो उनका जवाब बेहद औपचारिक रहा। उन्होंने कहा कि मामला फिलहाल उनके संज्ञान में नहीं है और जांच के बाद ही कुछ कहा जा सकेगा।
हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि बफर ज़ोन में बिना उच्च स्तरीय स्वीकृति के एक पत्थर भी नहीं हिलाया जा सकता, ऐसे में हजारों पेड़ों की कटाई और किले की दीवार का टूटना अधिकारियों के दावों पर सवालिया निशान लगाता है।
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