राजस्थान में छात्रसंघ चुनाव बंद, फिर भी करोड़ों की फीस वसूली, निर्मल चौधरी बोले- पैसा कहां गया, हिसाब दे प्रशासन

Raghvendra Singh Rathore | Oct 15, 2026, 16:02 IST
राजस्थान छात्रसंघ चुनाव बंद, करोड़ों की फीस वसूली पर सवाल, निर्मल चौधरी ने मांगा हिसाब
राजस्थान में चार साल से छात्रसंघ चुनाव नहीं हो रहे, लेकिन छात्रों से चुनाव और छात्र कल्याण के नाम पर फीस ली जाती रही। अब कॉलेज शिक्षा आयुक्तालय ने सरकारी कॉलेजों में छात्रसंघ चुनाव मद की फीस बंद करने और पुरानी राशि दूसरे छात्रहित के कामों में खर्च करने के निर्देश दिए हैं। निर्मल चौधरी और शुभम रेवाड़ ने फीस वसूली पर सवाल उठाए हैं।

राजस्थान में छात्रसंघ चुनाव बंद हैं, लेकिन छात्रों से चुनाव के नाम पर ली गई फीस का हिसाब अब बड़ा मुद्दा बन गया है। पिछले चार साल से प्रदेश के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में छात्रसंघ चुनाव नहीं हुए। इसके बावजूद छात्रसंघ और छात्र कल्याण से जुड़े मदों में शुल्क लिया जाता रहा।



अब कॉलेज शिक्षा आयुक्तालय ने सरकारी कॉलेजों में छात्रसंघ चुनाव मद की फीस नहीं लेने का आदेश जारी किया है। साथ ही पहले से जमा रकम दूसरे छात्रहित के कामों में खर्च करने की अनुमति दी है। इस आदेश के बाद सवाल उठ रहा है कि जब चुनाव ही नहीं हुए तो छात्रों से वसूली गई राशि कहां गई? अब तक कितना पैसा खर्च हुआ और कितना बचा है?



राजस्थान विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष निर्मल चौधरी ने The Sootr से बातचीत में विश्वविद्यालय प्रशासन पर फीस का हिसाब नहीं देने और टालमटोल करने के आरोप लगाए हैं। छात्र नेता शुभम रेवाड़ ने भी चुनाव नहीं होने पर फीस वसूली का मुद्दा उठाया था।



निर्मल चौधरी बोले- चुनाव नहीं करा रहे तो फीस किस बात की?

राजस्थान विश्वविद्यालय के पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष निर्मल चौधरी ने The Sootr से बातचीत में कहा कि उन्होंने शुरू से ही छात्रसंघ चुनाव नहीं होने के बावजूद फीस वसूलने का विरोध किया था।



निर्मल चौधरी ने कहा, "हमने तो सीधा पूछा था कि जब आप चुनाव करवा ही नहीं रहे हैं तो फीस ले क्यों रहे हैं? यूनिवर्सिटी प्रशासन उस पैसे का हिसाब भी नहीं दे रहा है। अभी जो आदेश आया है, उसमें कहा गया है कि इस पैसे को अन्य मदों में खर्च कर सकते हैं। लेकिन पहले जो पैसा लिया गया, उसका हिसाब कौन देगा?"



उन्होंने आरोप लगाया कि कॉलेज और विश्वविद्यालय प्रशासन अब भी इस मामले में टालमटोल कर रहा है। केवल पैसा दूसरे कामों में खर्च करने का आदेश जारी करने से छात्रों के सवाल खत्म नहीं हो जाते।



घूमर जैसे कार्यक्रम भी बंद, छात्रों को मिल क्या रहा है?

निर्मल चौधरी ने विश्वविद्यालय की छात्र गतिविधियों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि पहले कॉलेज और विश्वविद्यालय में घूमर जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे, लेकिन प्रशासन ने उन्हें भी बंद कर दिया। छात्रसंघ चुनाव पहले से नहीं हो रहे हैं। उनका सवाल है कि जब छात्रों के हित में होने वाली गतिविधियां ही बंद हैं तो उनसे शुल्क क्यों लिया जा रहा है?



निर्मल चौधरी ने विश्वविद्यालय प्रशासन पर फीस वसूली के नाम पर लूट मचाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि छात्रों से जमा किए गए पैसे का पूरा हिसाब सामने आना चाहिए। वे इस मुद्दे पर आगे भी विरोध जारी रखेंगे।



शुभम रेवाड़ ने भी उठाई थी चुनाव शुल्क बंद करने की मांग

छात्र नेता शुभम रेवाड़ ने भी The Sootr से बातचीत में बताया कि उन्होंने चुनाव नहीं होने के बावजूद छात्रों से फीस लेने का मुद्दा उठाया था। उनका कहना है कि उन्होंने यह मांग की थी कि जब छात्रसंघ चुनाव नहीं कराए जा रहे हैं तो चुनाव और सदस्यता शुल्क क्यों लिया जा रहा है।



शुभम रेवाड़ इस मुद्दे को लेकर हाईकोर्ट भी पहुंचे थे। वर्ष 2024 में उन्होंने छात्रसंघ चुनाव नहीं होने पर चुनाव शुल्क और सदस्यता शुल्क की वसूली पर सवाल उठाए थे।



कॉलेज शिक्षा आयुक्तालय के नए आदेश में क्या है?

कॉलेज शिक्षा आयुक्तालय ने 13 अक्टूबर 2026 को छात्रसंघ मद में ली जाने वाली फीस को लेकर आदेश जारी किया। अतिरिक्त आयुक्त कैलाश चंद यादव की ओर से जारी आदेश में सरकारी कॉलेजों को छात्रसंघ चुनाव मद में आगे फीस नहीं लेने के निर्देश दिए गए हैं।



आदेश के अनुसार, पहले से जमा रकम छात्रहित के दूसरे कामों में इस्तेमाल की जा सकेगी। इनमें परीक्षाओं का आयोजन, रीडिंग रूम, लाइब्रेरी, किताबों की खरीद और बाइंडिंग, अखबार-पत्रिकाओं की खरीद तथा खेल गतिविधियां शामिल हैं।



सरकार ने आगे चुनाव मद में फीस लेने से मना किया है, लेकिन पहले से जमा राशि छात्रों को लौटाने के बजाय निर्धारित छात्रहित कार्यों में खर्च करने की व्यवस्था की है।यह आदेश सरकारी कॉलेजों से संबंधित है। राजस्थान विश्वविद्यालय की शुल्क व्यवस्था और उसके फंड पर इस आदेश के लागू होने की स्थिति अलग से स्पष्ट करना जरूरी है।



राजस्थान विश्वविद्यालय में 2.75 करोड़, कॉलेजों में 22 करोड़ जुटने का अनुमान

राजस्थान विश्वविद्यालय में पिछले चार वर्षों के दौरान छात्रसंघ से जुड़े शुल्क के रूप में करीब 2.75 करोड़ रुपए जुटने की जानकारी सामने आई है। वहीं, प्रदेश के सरकारी कॉलेजों में करीब 22 करोड़ रुपए जुटने का अनुमान लगाया गया है।



सरकारी कॉलेजों में वर्ष 2023-24 में 5 लाख 14 हजार 649, वर्ष 2024-25 में 5 लाख 33 हजार 787 और वर्ष 2025-26 में 5 लाख 42 हजार 195 विद्यार्थी दर्ज थे। इतनी बड़ी छात्र संख्या के कारण मामूली शुल्क भी कुल मिलाकर बड़ी राशि बन सकता है।




राजस्थान विश्वविद्यालय ने शुल्क का नाम बदला

राजस्थान विश्वविद्यालय में इस सत्र में छात्रसंघ चुनाव शुल्क की जगह छात्र कल्याण शुल्क के नाम से 280 रुपए लिए जाने की जानकारी सामने आई है।



यहां एक महत्वपूर्ण अंतर है। छात्रसंघ चुनाव शुल्क और छात्र कल्याण शुल्क का उद्देश्य तथा नियम एक जैसे हों, यह जरूरी नहीं है। इसलिए विश्वविद्यालय प्रशासन से यह स्पष्ट होना चाहिए कि 280 रुपए किन-किन कामों के लिए लिए जा रहे हैं और पिछले वर्षों में इन मदों में कितना खर्च हुआ।



विश्वविद्यालय प्रशासन का पहले क्या पक्ष रहा है?



राजस्थान विश्वविद्यालय के तत्कालीन छात्र कल्याण अधिष्ठाता रामावतार शर्मा ने शुल्क को लेकर पहले दिए गए अपने पक्ष में बताया था कि छात्रों से ली जाने वाली राशि केवल चुनाव के लिए नहीं होती। इसका इस्तेमाल छात्र कल्याण से जुड़ी अन्य गतिविधियों में भी किया जाता है।



उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि विश्वविद्यालय में शुल्क निर्धारित करने का फैसला सिंडिकेट के स्तर पर होता है, जबकि छात्रसंघ चुनाव कराने का निर्णय सरकार के स्तर पर लिया जाता है।



सबसे बड़ा सवाल- चार साल की वसूली का हिसाब कौन देगा?



नए आदेश से सरकारी कॉलेजों में आगे छात्रसंघ चुनाव शुल्क लेने की व्यवस्था बदल गई है। लेकिन पिछले वर्षों में छात्रों से ली गई रकम को लेकर सवाल अब भी बाकी हैं।



छात्र नेताओं की मांग है कि प्रशासन यह बताए कि कितनी फीस जमा हुई, किन गतिविधियों पर खर्च हुई और कितनी राशि बची है। निर्मल चौधरी ने साफ कर दिया है कि पुराने पैसे का हिसाब मिलने तक उनका विरोध जारी रहेगा।



अब कॉलेज शिक्षा विभाग और विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने चुनौती केवल फीस का नया नियम लागू करने की नहीं, बल्कि छात्रों से ली गई राशि के इस्तेमाल की पूरी जानकारी सामने रखने की भी है।



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