भाजपा जिलाध्यक्ष रहे सारस्वत अब संभालेंगे राजस्थान विश्वविद्यालय, सीकर और बीकानेर को भी नए कुलगुरु

Ashish Bhardwaj | Sept 25, 2026, 13:05 IST
राजस्थान विश्वविद्यालय
राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े ने राजस्थान के तीन विश्वविद्यालयों में नए कुलगुरु नियुक्त किए। भगवती प्रसाद सारस्वत राजस्थान विश्वविद्यालय, युद्धवीर सिंह सीकर और नरसी राम विश्नोई बीकानेर की कमान संभालेंगे।

समझें क्या है पूरा मामला

  • राजस्थान के तीन विश्वविद्यालयों को मिले नए वाइस चांसलर।
  • राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े ने देर रात जारी किए आदेश।
  • राजस्थान यूनिवर्सिटी की कमान डॉ. भगवती प्रसाद सारस्वत को।
  • सीकर और बीकानेर विश्वविद्यालयों को भी मिला नया नेतृत्व।
  • तीनों वाइस चांसलर का कार्यकाल 3 साल या 70 वर्ष तक रहेगा।

राजस्थान के तीन विश्वविद्यालयों को नए वाइस चांसलर मिल गए हैं। राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े ने गुरुवार देर रात आदेश जारी किए। डॉ. भगवती प्रसाद सारस्वत राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर के वाइस चांसलर बने हैं। डॉ. युद्धवीर सिंह सीकर और प्रो. नरसी राम विश्नोई बीकानेर की कमान संभालेंगे। तीनों का कार्यकाल 3 साल या 70 साल की उम्र तक रहेगा।



राजस्थान की उच्च शिक्षा से जुड़ी एक बड़ी खबर सामने आई है। प्रदेश के तीन प्रमुख विश्वविद्यालयों को नए वाइस चांसलर मिल गए हैं। राज्यपाल और कुलाधिपति हरिभाऊ बागड़े ने गुरुवार देर रात नियुक्ति आदेश जारी किए।



इनमें जयपुर का राजस्थान विश्वविद्यालय भी शामिल है। यहां डॉ. भगवती प्रसाद सारस्वत को वाइस चांसलर बनाया गया है। सारस्वत भाजपा अजमेर ग्रामीण के जिलाध्यक्ष रह चुके हैं। इसलिए उनकी नियुक्ति सबसे ज्यादा चर्चा में है।



किसे कहां मिली जिम्मेदारी

राज्यपाल सचिवालय ने तीनों नियुक्तियों के आदेश एक साथ जारी किए। आदेश के मुताबिक तीनों विश्वविद्यालयों को नया नेतृत्व मिला है।



राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर की कमान डॉ. भगवती प्रसाद सारस्वत को मिली है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय शेखावाटी विश्वविद्यालय, सीकर में डॉ. युद्धवीर सिंह वाइस चांसलर बने हैं। महाराजा गंगासिंह विश्वविद्यालय, बीकानेर में प्रो. नरसी राम विश्नोई जिम्मेदारी संभालेंगे।



ये तीनों विश्वविद्यालय प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में हैं। जयपुर, सीकर और बीकानेर के आसपास के छात्र इन्हीं संस्थानों से जुड़े हैं। ऐसे में यह फैसला बड़ी संख्या में विद्यार्थियों पर असर डालेगा।



सरकार की सलाह से फैसला

आदेश में साफ लिखा है कि नियुक्तियां राज्य सरकार के परामर्श से हुई हैं। राज्यपाल ही प्रदेश के सरकारी विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति होते हैं। वाइस चांसलर की नियुक्ति का अधिकार कुलाधिपति के पास होता है।



इन पदों को लेकर लंबे समय से प्रक्रिया चल रही थी। अब आदेश जारी होने से नियुक्ति का रास्ता साफ हो गया है। तीनों विश्वविद्यालयों में शीर्ष नेतृत्व को लेकर स्थिति भी स्पष्ट हो गई है।



कुलपति नहीं, अब कुलगुरु

राजस्थान में अब कुलपति को कुलगुरु कहा जाता है। राज्य सरकार ने साल 2025 में यह बदलाव किया था। इसके लिए विधानसभा में संशोधन विधेयक पारित हुआ था। पद का नाम बदला है, पर जिम्मेदारियां पहले जैसी ही हैं।



राजस्थान विश्वविद्यालय की कमान

राजस्थान विश्वविद्यालय प्रदेश के प्रमुख उच्च शिक्षण संस्थानों में गिना जाता है। इसलिए यहां की नियुक्ति को खास माना जा रहा है। नए वाइस चांसलर के सामने कई जिम्मेदारियां होंगी।



उन्हें शैक्षणिक गतिविधियों को रफ्तार देनी होगी। प्रशासनिक व्यवस्था को भी दुरुस्त रखना होगा। विद्यार्थियों से जुड़े मुद्दों पर भी उन्हें लगातार काम करना होगा।



सारस्वत का सियासी सफर

डॉ. भगवती प्रसाद सारस्वत का नाम राजनीति में भी जाना-पहचाना है। वे भाजपा अजमेर ग्रामीण के जिलाध्यक्ष रह चुके हैं। विधानसभा चुनाव में टिकट दावेदारों में उनका नाम प्रमुखता से चला था। लोकसभा चुनाव के समय भी उनकी दावेदारी की चर्चा रही। अब उन्हें शिक्षा जगत की एक अहम जिम्मेदारी सौंपी गई है। उनकी राजनीतिक पृष्ठभूमि के कारण यह नियुक्ति चर्चा का विषय बनी हुई है। शिक्षा जगत की नजर अब उनके कामकाज पर रहेगी।



सीकर और बीकानेर को नए मुखिया

सीकर का शेखावाटी विश्वविद्यालय पंडित दीनदयाल उपाध्याय के नाम पर है। यहां अब डॉ. युद्धवीर सिंह वाइस चांसलर की भूमिका निभाएंगे। शेखावाटी क्षेत्र के छात्रों के लिए यह अहम संस्थान है। बीकानेर का विश्वविद्यालय महाराजा गंगासिंह के नाम पर है। यहां प्रो. नरसी राम विश्नोई वाइस चांसलर पद के जिम्मेदारी संभालेंगे। दोनों वाइस चांसलर के सामने भी पढ़ाई और प्रशासन से जुड़ी वही चुनौतियां होंगी।



कितना होगा कार्यकाल

राज्यपाल के आदेश में कार्यकाल की अवधि भी तय की गई है। तीनों वाइस चांसलर का कार्यकाल कार्यभार संभालने की तारीख से गिना जाएगा। यह कार्यकाल 3 साल या 70 साल की उम्र पूरी होने तक रहेगा। दोनों में से जो अवधि पहले पूरी होगी, वही मान्य होगी।



इसे एक उदाहरण से समझिए। मान लीजिए कार्यभार संभालते समय किसी कुलगुरु की उम्र 68 साल है। तब उनका कार्यकाल 2 साल में ही खत्म हो जाएगा। वहीं कम उम्र वाले वाइस चांसलर पूरे 3 साल पद पर रहेंगे।



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