वन विभाग का बड़ा खुलासा, बाघों के इलाके में खदानें, संरक्षण का पैसा फाइलों में अटका

Ashish Bhardwaj | Sept 25, 2026, 12:17 IST
संरक्षण का पैसा फाइलों में
राजस्थान में 2008 से एक भी वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन प्लान मंजूर नहीं हुआ। इससे वन्यजीवों के 300 करोड़ रुपए अटके हैं। सिया ने खदान मालिकों से एडवांस फंड लेने का आदेश भी वापस ले लिया।

समझें क्या है पूरा मामला

  • राजस्थान में 2008 से अटका है वन्यजीव संरक्षण प्लान।
  • 300 करोड़ रुपए अटके हैं फाइलों में, वन्यजीव संरक्षण के काम प्रभावित।
  • टाइगर इलाकों में खनन मंजूरी पर उठे सवाल।
  • 500 खदानें बिना उचित अनुमति चलने का दावा।
  • वन विभाग ने कहा- कंजर्वेशन प्लान में बदलाव जारी।

राजस्थान में 2008 से एक भी वाइल्डलाइफ कंजर्वेशन प्लान मंजूर नहीं हुआ। इससे वन्यजीवों के लिए तय करीब 300 करोड़ रुपए अटके हैं। सिया ने एडवांस फंड का आदेश वापस ले लिया। बाघ इलाकों और इको-सेंसिटिव जोन में 50 से 60 खदानों को मंजूरी मिली थी। सूत्रों के अनुसार, करीब 500 खदानें बिना उचित अनुमति के चल रही हैं।



2008 से एक भी प्लान पास नहीं

यह मामला कई साल पुराना है। चीफ वाइल्डलाइफ वार्डन कार्यालय ने 2008 से कोई प्लान अंतिम रूप से मंजूर नहीं किया। यह प्लान यानी डब्ल्यूसीपी खनन प्रोजेक्ट्स से जुड़ा अहम दस्तावेज है।



इसी प्लान के जरिए वन्यजीवों पर पैसा खर्च होना था। इसमें हैबिटेट सुधार, वाटर होल निर्माण और वन्यजीव विकास के काम शामिल थे। प्लान मंजूर नहीं हुए, तो ये काम भी शुरू नहीं हो सके।



300 करोड़ रुपए फाइलों में

इस देरी की कीमत जंगल चुका रहे हैं। करीब 300 करोड़ रुपए फाइलों में अटके पड़े हैं। यह पैसा जानवरों के रहने की जगह सुधारने में लगना था। सिया ही राज्य में प्रोजेक्ट्स को पर्यावरण मंजूरी देता है। उसने इस बारे में वन विभाग को कई पत्र लिखे। लेकिन वन विभाग से कोई ठोस जवाब नहीं आया।



पहले देना होता था एडवांस फंड

सिया ने 17 जुलाई 2025 को एक अहम आदेश जारी किया था। इसमें वन्यजीव संरक्षण की राशि पहले जमा कराना अनिवार्य था। लेकिन 3 नवंबर 2025 को यह आदेश वापस ले लिया गया। इसके लिए कार्यालय आदेश संख्या 1361 जारी हुआ। अब कंपनियों को सरकार के पास एडवांस पैसा जमा नहीं करना है। उन्हें सिर्फ ईएमपी में लिखकर देना है। इसमें बताना होता है कि वन्यजीवों के लिए बजट रखा गया है।



यहीं पर व्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी सामने आती है। अगर कंजर्वेशन प्लान मंजूर न हो, तो कंपनी पर खर्च की बाध्यता नहीं रहती। रिपोर्ट के मुताबिक, कंपनियां इसी स्थिति का फायदा उठाती हैं। यानी कागज पर बजट दिखता है, पर जमीन पर काम नहीं होता।



बाघ इलाकों में खनन की अनुमति

मामला सिर्फ फंड तक सीमित नहीं है। जिला स्तरीय कमेटियों की भूमिका भी सवालों में है। डीईआईएए ने शुरुआत में बड़ी चूक की। इन कमेटियों ने 50 से 60 खनन प्रोजेक्ट्स को अनुमति दे दी। ये प्रोजेक्ट्स इको-सेंसिटिव जोन और टाइगर टेरिटरी के दायरे में थे। सिया ने बाद में इन फाइलों की दोबारा समीक्षा की। तब जाकर यह गड़बड़ी पकड़ में आई। सूत्रों के अनुसार, करीब 500 खदानें अब भी बिना उचित अनुमति के चल रही हैं।



कैसे मिलती है पर्यावरण मंजूरी

राजस्थान में हर खनन प्रोजेक्ट को पर्यावरण मंजूरी लेनी होती है। इससे पहले केंद्र के पोर्टल से टीओआर जारी होता है। इसकी एक अहम शर्त वन्यजीवों का अध्ययन है। यह अध्ययन प्रोजेक्ट के 10 किलोमीटर दायरे में होना चाहिए। इस अध्ययन को संबंधित डीएफओ सत्यापित करता है। इसके बाद कंजर्वेशन प्लान तैयार किया जाता है। फिर इसे चीफ वाइल्डलाइफ वार्डन से मंजूर कराना होता है। मंजूरी के बाद ही कंपनी को राशि जमा करनी होती है।



ग्राउंड स्टडी की जगह रेडीमेड रिपोर्ट

कागजों में यह प्रक्रिया मजबूत दिखती है। लेकिन जमीन पर हालात अलग हैं। ज्यादातर मामलों में असली ग्राउंड रिपोर्ट नहीं बनती। इसकी जगह कंसल्टेंट से तैयार रिपोर्ट ले ली जाती है। दस्तावेजों के मुताबिक, फाइलें सत्यापन के लिए डीएफओ के पास जाती हैं। वहीं पर ये अटक जाती हैं। मुख्यालय स्तर पर इनका कोई फॉलो-अप नहीं होता।



वन विभाग का क्या कहना है

चीफ वाइल्डलाइफ वार्डन केसी अरुण प्रसाद ने विभाग का पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि सभी कंजर्वेशन प्लान्स को रिवाइज किया जा रहा है। उनके मुताबिक, इनमें जरूरी संशोधन लाए जा रहे हैं। मकसद प्रक्रिया को पारदर्शी और व्यावहारिक बनाना है।



जंगल और जानवरों पर असर

यह मामला सिर्फ फाइलों की देरी का नहीं है। बाघ अभयारण्य, कॉरिडोर और इको-सेंसिटिव जोन बेहद संवेदनशील इलाके हैं। कॉरिडोर से ही बाघ एक जंगल से दूसरे जंगल तक जाते हैं। ऐसे इलाकों में संरक्षण का पैसा रुकना दोहरी मार जैसा है। एक ओर खनन को मंजूरी, दूसरी ओर सुधार के काम ठप।



यह खबरें भी पढ़ें...



अशोक गहलोत का भाजपा पर आरोप, बोले- पुलिस के जरिए पार्षदों को डराया-धमकाया जा रहा



निकाय चुनाव पर गहलोत बोले- भजनलाल को भला आदमी समझा था, जीत के लिए क्या-क्या नहीं किया



गहलोत का हमला- भजनलाल जी, आपका नाम लोकतंत्र की हत्या करने वाले CM के रूप में दर्ज हुआ



निकाय चुनाव में जीत के बाद BJP मुख्यालय पहुंचे CM भजनलाल, कार्यकर्ताओं ने मनाया जश्न



Tags:
  • राजस्थान
  • वन विभाग
  • वाइल्डलाइफ
  • वन्यजीव संरक्षण