पहली बार एक साथ निकाय और पंचायत चुनाव, क्या सरकार वन स्टेट-वन इलेक्शन की राह पर?
राजस्थान देश का ऐसा राज्य बनने जा रहा है, जहां भाजपा की वन स्टेट वन इलेक्शन पॉलिसी साकार रूप लेगी।
राजस्थान में पहली बार 309 निकायों और 14,403 पंचायतों के चुनाव एक साथ होंगे। इसके तहत 90 दिनों के भीतर चार चरणों में 15 नवंबर तक चुनावी प्रक्रिया पूरी होगी।
इसलिए ही नहीं करवाए थे चुनाव
राजस्थान में अनेक ग्राम पंचायतों का कार्यकाल जनवरी 2025 से पहले ही खत्म हो गया था। सरकार ने इनके चुनाव करवाने के स्थान पर पूर्व सरपंचों को ही प्रशासक लगा दिया। यही हाल नगर पालिका,नगर परिषद और नगर निगमों में रहा था।
सरकार ने मई 2025 में ओबीसी सीट तय करने के लिए राज्य ओबीसी आयोग (राजनीतिक प्रतिनिधित्व) गठित कर दिया था।
आयोग को तीन महीने में सर्वे पूरा करके रिपोर्ट देनी थी। लेकिन, आयोग ऐसा नहीं कर पाया। इसके लिए वह अनेक परेशानियां और कारण गिनाता रहा।
उधर राज्य चुनाव आयोग ने वार्डों के पुर्नसीमांकन के नाम पर भी चुनाव टालना जारी रखा। इसके बाद मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण के नाम पर चुनाव टाले जाते रहे।
नहीं माने हाई कोर्ट के आदेश भी
राजस्थान सरकार चुनाव नहीं करवाने के लिए इस हद तक अड़ी हुई थी कि उसने हाई कोर्ट के आदेश की भी परवाह नहीं की।
हाई कोर्ट ने 14 नवंबर के फैसले में 15 अप्रैल तक पंचायत व निकाय चुनाव करवाने के आदेश दिए। लेकिन, सरकार और राज्य चुनाव आयोग अपनी चाल पर टिके रहे।
स्थिति यह थी कि 15 अप्रैल तक तो चुनाव आयोग नगर पालिका चुनाव के लिए मतदाता सूचियां तैयार करवाने में लगा हुआ था।
अवमानना का भी नहीं था डर
15 अप्रैल तक चुनाव नहीं होने पर अवमानना याचिका दायर हुई। लेकिन, सरकार निश्चिंत रहीं। इस बार हाई कोर्ट ने 22 मई के आदेश से 31 जुलाई तक चुनाव करवाने की डेडलाइन बढ़ी दी।
इसके बावजूद राज्य सरकार, राज्य चुनाव आयोग और ओबीसी आयोग (राजनीतिक प्रतिनिधित्व) सुस्ती बरतता रहा।
सरकार को पता था कि अनेक पंचायत समितियों और नगर पालिकाओं का कार्यकाल अक्टूबर व नवंबर में समाप्त हो रहा है। ऐसे में उसने 31 जुलाई की समय सीमा को भी पार कर दिया।
सूत्रों का कहना है कि सरकार की मंशा एक साथ ही सभी पंचायतों व पालिकाओं के चुनाव करवाने की थी। इसलिए चुनाव आयोग ओर ओबीसी आयोग (राजनीतिक प्रतिनिधित्व) भी चुनाव टालने के लिए कोई न कोई बहाना बनाते रहे।
राज्य सरकार की ओर से राजस्थान हाई कोर्ट में जो चुनावी कार्यक्रम पेश किया गया। इसमें स्पष्ट रूप से बताया गया है कि प्रदेश की सभी नगर निकायों और पंचायतों के चुनाव एक साथ होंगे।
ओबीसी आयोग (राजनीतिक प्रतिनिधित्व) अब तक 20 अगस्त से पहले रिपोर्ट नहीं देने की बात कह रहा था। अप्रत्याशित रूप से वह अब 5 अगस्त तक रिपोर्ट देने को तैयार हो गया है। यही हाल सरकार और राज्य चुनाव आयोग का है।
हालांकि यह चुनाव अलग-अलग चरण में होंगे, लेकिन पहली बार एक साथ 90 दिन में प्रदेश की सभी निकायों और पंचायतों के चुनाव कराए जाएंगे।
हार का डर या कुछ और
एक अधिकारी का कहना है कि पंचायत चुनाव व शहरी स्थानीय निकायों में भाजपा सरकार हार के भय से चुनाव टाल रही थी। कुछ महीने पहले इस तथ्य की पुष्टि प्रदेश भाजपा के एक सीनियर लीडर भी कर चुके हैं।
भाजपा शहरी इलाकों में शुरु से ही मजबूत रही है। इसलिए सरकार ने योजना के अनुसार नगर पालिकाओं के चुनाव पहले करवाना तय किया है।
भाजपा का मानना है कि शहरों में भाजपा की जीत का संदेश ग्रामीण इलाको में भी होगा और पंचायतों में भी पार्टी जीत हासिल कर सकेगी।
09 निकाय और 14,403 पंचायतों के होंगे चुनाव
राजस्थान में कुल 309 नगर निकाय हैं। इनमें नगर निगम, नगर पालिकाएं और नगर परिषदें शामिल हैं। इन सभी निकायों के चुनाव पहली बार एक साथ होने जा रहे हैं।
प्रदेश में कुल 14,403 ग्राम पंचायतें और 457 पंचायत समितियां हैं। इन सभी के चुनाव भी एक साथ होने जा रहे हैं। कुल 4 चरण में ये चुनाव संपन्न होंगे।
राजस्थान ऐसा राज्य बनने जा रहा है, जहां शहरी निकाय व पंचायतों के चुनाव एक साथ होंगे। हालांकि दोनों संस्थाओं के चुनाव 90 दिन में 15 नवंबर तक पूरे होंगे।
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